रविवार, भारतीय सिनेमा की एक महत्वपूर्ण फिल्म पर चर्चा करने की परम्परा में मृणाल सेन की 1969 में आयी एक महत्वपूर्ण फिल्म भुवनशोम बड़ी प्रासंगिक लगती है। इकतालीस साल पहले यह श्वेत-श्याम फिल्म प्रदर्शित हुई थी। मृणाल सेन बंगला सिनेमा के एक उत्कृष्ट फिल्मकार हैं। इस फिल्म के माध्यम से हिन्दी में नये सिनेमा के आन्दोलन की एक तरह से शुरूआत हुई।
मृणाल सेन ने बहुत सी किताबें भी लिखीं, अपने अनुभवों को लिखकर बाँटने का उनका गहरा शौक रहा है। एक जगह उन्होंने यह बात लिखी है कि एक बार वे मुम्बई में टैक्सी करके एक स्थान से दूसरे स्थान पर गये तो उतरते वक्त टैक्सी ड्रायवर ने उनसे पैसे नहीं लिए, यह कहते हुए कि सर, मैं आपको जानता हूँ, आप भुवनशोम फिल्म के निर्देशक हैं।
भुवनशोम, फिल्म के मुख्य किरदार का नाम है जो विधुर है और एकाकी। वह ब्यूरोक्रेट है, एक अधिकारी। जीवन में अकेलेपन ने उसको जिद्दी, अख्खड़ और झक्की बना दिया है। वह अपने स्वभाव को संवेदनारहित व्यवहार के साथ जीता है। गल्तियाँ, बुराइयाँ, भ्रष्ट आचरण उसे बर्दाश्त नहीं। तुरन्त दण्डित करने में देर नहीं करता। मगर आसपास के परिवेश को सुधारना इतनी सख्ती के बावजूद उसके बस का नहीं। अपने अधीनस्थ को मुअत्तिल करने में वो देर नहीं करता। एक अजीब सी दुनिया उसके आसपास है जिसमें उसकी उपस्थिति झुंझलाहट से भरी है, हर वक्त।
एक दिन वो इस सारे माहौल से त्रस्त होकर कुछ दिनों के लिए अपनी बन्दूक लेकर शिकार के लिए सुदूर रेतीले स्थान की तरफ निकल जाता है। वहाँ उसे एक युवती गौरी मिलती है जिस पर भुवन शोम का कोई डर या आतंक नहीं। जिद्दी भुवन अपने समय को शान्ति और सहज बनाने के लिए भटकता है, गौरी से उसका बार-बार सामना होता है। गौरी, इस आदमी की झक्क और वृत्ति में अपनी सहज चंचलता और निस्पृह उपस्थिति से जगह बनाती है। आखिर, छुट्टियाँ खत्म हो गयीं और भुवन शोम की वापसी है। उनको लगता है कि कुछ छूट रहा है। व्यंग्य से हँसकर वो सूचित करते हैं कि बड़े स्टेशन पर उनका तबादला हो गया है। बड़ा स्टेशन यानी कमाई की जगह।
भुवनशोम निर्देशक और नायक की फिल्म है जिसमें नायिका की उपस्थिति लगभग ऐसे कन्ट्रास्ट की तरह है जो कहानी को दिलचस्प गति देने का काम करती है। सुहासिनी मुले ने गौरी के इस किरदार को आंचलिक सहजता के साथ निभाया है। साधु मेहर, एक बेईमान अधीनस्थ के किरदार में हैं, छोटा रोल है मगर रोचक है। दरअसल यह फिल्म बड़ी व्यापकता के साथ उत्पल दत्त की क्षमताओं को गहरे प्रभावों के साथ स्थापित करती है। एक श्रेष्ठ निर्देशक और एक श्रेष्ठ अभिनेता मिलकर परदे पर क्या सर्वश्रेष्ठ सृजित करते हैं, यह भुवनशोम देखकर ज्ञान होता है।
के.के. महाजन की सिनेमेटोग्राफी कच्छ के रेतीले सौन्दर्य को बखूबी चित्रित करती है। भुवनशोम के निशाना लगाने, चूकने और गौरी के निश्छल उपहास के दृश्य संवाद याद रह जाते हैं। कहा जाता है कि इस फिल्म में अपने स्वर से प्रस्तुतिकरण करते हुए अमिताभ बच्चन को तीन सौ रुपए का पारिश्रमिक मिला था।
शनिवार, 27 नवंबर 2010
शुक्रवार, 26 नवंबर 2010
विवाद और फिल्म समारोह की एकचाल
फिल्म समारोहों के साथ विवादों का गहरा रिश्ता है। शायद ही कोई साल ऐसा जाता हो जब सरकारी फिल्म समारोह को किसी न किसी प्रकार की आलोचना का सामना न करना पड़ता हो। दरअसल सरकारी समारोहों में अब फिल्म से जुड़े सक्रिय लोगों ने रुचि लेना बन्द कर दिया है इसीलिए आयोजक खाली बैठे बीते कल के कुछ सामान्य से परिचित किस्म के चेहरों के साथ अपनी गतिविधियों की खानापूर्ति करते हैं और जैसे-तैसे समारोह को एक मुलम्मा देकर समाज के सामने पेश कर देते हैं। समारोहों में चयन किया हुआ ही दिखाया जाता है, चयन किस आधार पर किया गया, किस आधार पर श्रेष्ठ का आकलन किया गया, किस पूर्वाग्रह-दुराग्रह पर श्रेष्ठ होते हुए भी श्रेष्ठ को दरकिनार कर दिया गया, इस बात का कोई आधारभूत तर्क भी नजर नहीं आता।
किसी समय फिल्म समारोहों में श्रेष्ठता का चयन, उसका मानक और आकलन का अपना स्तर हुआ करता था। हालाँकि और जैसा कि जिक्र शुरू में हुआ, विवाद तब भी हुआ करते थे मगर बहुत से लोग चयनित सिनेमा को परदे पर देखते हुए उसकी श्रेष्ठता से सहमत भी होते थे। शीर्ष फिल्मकारों की भागीदारी लगभग कर साल होती थी। दक्षिण के चारों राज्यों, उड़ीसा, असम, पश्चिम बंगाल से अच्छी फिल्में देखने वालों तक पहुँचा करती थीं। उन फिल्मों के प्रदर्शन वक्त-वक्त पर दूरदर्शन भी करने में रुचि लेता था मगर बाद में यह सब होना बन्द हो गया।
गोवा में समारोह भेजकर एक अच्छे उपक्रम को एक तरह से काला पानी दे दिया गया है। पिछले चार-पाँच सालों से मुम्बई फिल्म जगत में आज के अपने फुरसत के वक्त हो अपनी बीते कल की पहचान से लाभ लेते हुए सरकारी समर्थन और अवसरों को तलाश करते हुए पर्सनैलिटियाँ इन समारोह में हैलो-हाय करती दिखायी देने लगी हैं।
अब इस बात की उत्सुकता नहीं रह जाती कि फिल्म समारोह का शुभारम्भ किस बड़ी फिल्म हस्ती की उपस्थिति में होगा, इस बात का आकर्षण भी नहीं रह गया कि मुख्य अतिथि को दीप जलाने में कौन सी बड़ी और गरिमामयी अभिनेत्री सहयोग करेगी। यश चोपड़ा ने व्यथित होकर इस बार के फिल्म समारोह में यह बात कह दी है कि गोवा अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह के लायक नहीं है।
यहाँ एक अच्छा कन्वेन्शन हॉल नहीं है, जिस तरह से आज के समय की मांग है, बारह स्क्रीन का सिनेमाघर आज तक गोवा में बन नहीं पाया जबकि लगभग एक दशक होता आ रहा है, समारोह यहाँ आये हुए। इसके विपरीत पुणे और मुम्बई में संस्थाएँ अपने संसाधनों से ज्यादा उत्कृष्ट और अच्छे फिल्म समारोह आयोजित कर पाती हैं। पण्डित जवाहरलाल नेहरु की रुचि पर जो फिल्म समारोह लगभग छ: दशक पहले 1952 में प्रारम्भ हुआ था, वह जितनी आलोचनात्मक प्रतिक्रि याओं का शिकार हो रहा है, वह दुखद है।
किसी समय फिल्म समारोहों में श्रेष्ठता का चयन, उसका मानक और आकलन का अपना स्तर हुआ करता था। हालाँकि और जैसा कि जिक्र शुरू में हुआ, विवाद तब भी हुआ करते थे मगर बहुत से लोग चयनित सिनेमा को परदे पर देखते हुए उसकी श्रेष्ठता से सहमत भी होते थे। शीर्ष फिल्मकारों की भागीदारी लगभग कर साल होती थी। दक्षिण के चारों राज्यों, उड़ीसा, असम, पश्चिम बंगाल से अच्छी फिल्में देखने वालों तक पहुँचा करती थीं। उन फिल्मों के प्रदर्शन वक्त-वक्त पर दूरदर्शन भी करने में रुचि लेता था मगर बाद में यह सब होना बन्द हो गया।
गोवा में समारोह भेजकर एक अच्छे उपक्रम को एक तरह से काला पानी दे दिया गया है। पिछले चार-पाँच सालों से मुम्बई फिल्म जगत में आज के अपने फुरसत के वक्त हो अपनी बीते कल की पहचान से लाभ लेते हुए सरकारी समर्थन और अवसरों को तलाश करते हुए पर्सनैलिटियाँ इन समारोह में हैलो-हाय करती दिखायी देने लगी हैं।
अब इस बात की उत्सुकता नहीं रह जाती कि फिल्म समारोह का शुभारम्भ किस बड़ी फिल्म हस्ती की उपस्थिति में होगा, इस बात का आकर्षण भी नहीं रह गया कि मुख्य अतिथि को दीप जलाने में कौन सी बड़ी और गरिमामयी अभिनेत्री सहयोग करेगी। यश चोपड़ा ने व्यथित होकर इस बार के फिल्म समारोह में यह बात कह दी है कि गोवा अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह के लायक नहीं है।
यहाँ एक अच्छा कन्वेन्शन हॉल नहीं है, जिस तरह से आज के समय की मांग है, बारह स्क्रीन का सिनेमाघर आज तक गोवा में बन नहीं पाया जबकि लगभग एक दशक होता आ रहा है, समारोह यहाँ आये हुए। इसके विपरीत पुणे और मुम्बई में संस्थाएँ अपने संसाधनों से ज्यादा उत्कृष्ट और अच्छे फिल्म समारोह आयोजित कर पाती हैं। पण्डित जवाहरलाल नेहरु की रुचि पर जो फिल्म समारोह लगभग छ: दशक पहले 1952 में प्रारम्भ हुआ था, वह जितनी आलोचनात्मक प्रतिक्रि याओं का शिकार हो रहा है, वह दुखद है।
फाल्के अवार्ड सम्मानितों की दुर्लभ प्रदर्शनी
सरकारी संस्थाएँ कई बार अपनी सार्थकता को भूलकर बड़ी दूर उद्देश्यों के स्मृति-लोप में अक्सर चली जाया करती हैं। जिन कामों को लेकर उनकी स्थापना हुई है, वह किस तरह से कितना किया गया इसको लेकर अक्सर आलोचनाएँ और बहसें चला करती हैं। कान में बाजा चाहे जितना बजाओ, कई बार फर्क नहीं पड़ता मगर कई बार कुछ ऐसा काम भी दिखायी दे जाता है, जो एक अलग पहचान स्थापित करता है। भारत सरकार के पुणे स्थित राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार ने एक बहुत महत्वपूर्ण प्रदर्शनी उन फिल्मकारों पर तैयार की है जिन्हें अब तक दादा साहब फाल्के पुरस्कारों से नवाजा गया है।
दादा साहब फाल्के भारतीय सिनेमा के पितामह थे जिन्होंने अपनी असाधारण जिजीविषा और संघर्ष के साथ सिनेमा का स्वप्र केवल देखा ही नहीं था बल्कि साकार भी किया था। उन्होंने ही भारत की पहली फिल्म राजा हरिश्चन्द्र 1913 में बनायी थी। सिनेमा का जन्म ही उनके सिनेमा से हुआ था इसीलिए आने वाला 2013 का साल सिनेमा की शताब्दी का साल होगा। यह महत्वपूर्ण है कि फिल्म जगत आज भी तमाम भटकाव के बावजूद अपने पितामह को भूला नहीं है, वक्त-वक्त पर रस्मी तौर पर ही सही उनको याद कर लिया करता है। भारत सरकार ने एक बड़ी पहल दादा साहब फाल्के के नाम पर एक बड़ा पुरस्कार स्थापित करके की थी। यह पुरस्कार फिल्मकार को उनके जीवनपर्यन्त असाधारण और उत्कृष्ट सृजन के लिए प्रदान किया जाता है।
पुरस्कार की स्थापना 1969 में की गयी थी और पहला पुरस्कार फस्र्ट लेडी ऑव सिल्वर स्क्रीन देविका रानी को प्रदान किया गया था। तब से अब तक यह पुरस्कार पृथ्वीराज कपूर, कानन देवी, नितिन बोस, रायचन्द बोराल, सोहराब मोदी, जयराज, नौशाद, दुर्गा खोटे, सत्यजित रे, व्ही. शान्ताराम, राजकपूर, अशोक कुमार, लता मंगेशकर, भालजी पेंढारकर, दिलीप कुमार, शिवाजी गणेशन, कवि प्रदीप, बी.आर. चोपड़ा, हृषिकेश मुखर्जी, आशा भोसले, यश चोपड़ा, देव आनंद, मृणाल सेन, अडूर गोपालकृष्णन, श्याम बेनेगल, तपन सिन्हा, व्ही.के. मूर्ति, मन्नाडे और डी. रामानायडू आदि को प्रदान किया जा चुका है।
इस सम्मान से अब तक सम्मानित होने वाले सभी फिल्मकार, कलाकार और खासतौर पर स्वर्गीय गुरुदत्त की फिल्मों का छायांकन करने वाले व्ही.के. मूर्ति जैसे लोग भारतीय सिनेमा के आधार स्तम्भ हैं। सौ साल के सिनेमा का जब भी मूल्याँकन और आकलन होगा, ऐसी विभूतियों के नाम सर्वोपरि होंगे। ऐसे सम्मानितों की एक प्रदर्शनी की परिकल्पना वास्तव में एक सराहनीय आयाम है जिसके लिए राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार को बधाई दी जाना चाहिए।
अभिलेखागार ने यह प्रदर्शनी गोवा में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में प्रदर्शित की है जिसे काफी सराहा गया है। राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार को चाहिए कि यह प्रदर्शनी उसके गोदाम में ही सिमटकर न रह जाये। बेहतर होगा कि इसे वे देश के अनेक स्थानों तक ले जाएँ। अभिलेखागार इस प्रदर्शनी को अलबम स्वरूप में भी प्रकाशित कर व्यापक कर सकता है।
दादा साहब फाल्के भारतीय सिनेमा के पितामह थे जिन्होंने अपनी असाधारण जिजीविषा और संघर्ष के साथ सिनेमा का स्वप्र केवल देखा ही नहीं था बल्कि साकार भी किया था। उन्होंने ही भारत की पहली फिल्म राजा हरिश्चन्द्र 1913 में बनायी थी। सिनेमा का जन्म ही उनके सिनेमा से हुआ था इसीलिए आने वाला 2013 का साल सिनेमा की शताब्दी का साल होगा। यह महत्वपूर्ण है कि फिल्म जगत आज भी तमाम भटकाव के बावजूद अपने पितामह को भूला नहीं है, वक्त-वक्त पर रस्मी तौर पर ही सही उनको याद कर लिया करता है। भारत सरकार ने एक बड़ी पहल दादा साहब फाल्के के नाम पर एक बड़ा पुरस्कार स्थापित करके की थी। यह पुरस्कार फिल्मकार को उनके जीवनपर्यन्त असाधारण और उत्कृष्ट सृजन के लिए प्रदान किया जाता है।
पुरस्कार की स्थापना 1969 में की गयी थी और पहला पुरस्कार फस्र्ट लेडी ऑव सिल्वर स्क्रीन देविका रानी को प्रदान किया गया था। तब से अब तक यह पुरस्कार पृथ्वीराज कपूर, कानन देवी, नितिन बोस, रायचन्द बोराल, सोहराब मोदी, जयराज, नौशाद, दुर्गा खोटे, सत्यजित रे, व्ही. शान्ताराम, राजकपूर, अशोक कुमार, लता मंगेशकर, भालजी पेंढारकर, दिलीप कुमार, शिवाजी गणेशन, कवि प्रदीप, बी.आर. चोपड़ा, हृषिकेश मुखर्जी, आशा भोसले, यश चोपड़ा, देव आनंद, मृणाल सेन, अडूर गोपालकृष्णन, श्याम बेनेगल, तपन सिन्हा, व्ही.के. मूर्ति, मन्नाडे और डी. रामानायडू आदि को प्रदान किया जा चुका है।
इस सम्मान से अब तक सम्मानित होने वाले सभी फिल्मकार, कलाकार और खासतौर पर स्वर्गीय गुरुदत्त की फिल्मों का छायांकन करने वाले व्ही.के. मूर्ति जैसे लोग भारतीय सिनेमा के आधार स्तम्भ हैं। सौ साल के सिनेमा का जब भी मूल्याँकन और आकलन होगा, ऐसी विभूतियों के नाम सर्वोपरि होंगे। ऐसे सम्मानितों की एक प्रदर्शनी की परिकल्पना वास्तव में एक सराहनीय आयाम है जिसके लिए राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार को बधाई दी जाना चाहिए।
अभिलेखागार ने यह प्रदर्शनी गोवा में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में प्रदर्शित की है जिसे काफी सराहा गया है। राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार को चाहिए कि यह प्रदर्शनी उसके गोदाम में ही सिमटकर न रह जाये। बेहतर होगा कि इसे वे देश के अनेक स्थानों तक ले जाएँ। अभिलेखागार इस प्रदर्शनी को अलबम स्वरूप में भी प्रकाशित कर व्यापक कर सकता है।
मंगलवार, 23 नवंबर 2010
दया, हमदर्दी और लाचारी के कथानक
संजय लीला भंसाली की फिल्म गुजारिश को लेकर अब मिश्रित प्रतिक्रियाएँ सामने आने लगी हैं। फौरी तौर पर तत्काल समीक्षा लिखने में माहिर आलोचकों में से कुछ ने इसे दो-ढाई सितारों तक सीमित रखा तो कुछ ने अपनी जेब का क्या जाता है, सोचकर तीन से चार सितारे भी दिए मगर संजीदगी से सिनेमा की परख करने वालों को अन्तत: लगा कि यह अधिकतम तीन सितारा पाने वाली फिल्म है जिसमें खूबियों और खामियों का अनुपात साठ-चालीस का है। एक प्रबुद्ध निर्देशक कुछ विदेशी फिल्मों से प्रेरणा लेकर यथासम्भव अच्छी फिल्म बनाने में सफल हो पाता है। संजय लीला भंसाली के साथ भी ऐसा ही है।
हमारे यहाँ अंग्रेजी में इन्स्पाइरेशन जैसा शब्द पकड़े जाने पर हाथ से आँख मूँदकर समर्पण की मुद्रा में आने का सबसे अच्छा हथियार है। बहुत से फिल्मकार जो मौलिकता पर दिमाग लगाना नहीं चाहते, बहुत सारे अच्छे विषय विदेशी फिल्मों से हासिल कर लेते हैं। गुजारिश भी विदेशी फिल्म द सी इनसाइड और प्रेस्टीज की खूबियों को खींचने वाली फिल्म है। इस टिप्पणी के साथ प्रकाशित चित्र स्पेनिश फिल्म द सी इनसाइड का है। वास्तव में जो फिल्में निर्देशक को प्रेरणा देती हैं, जिनके दृश्यों को सीधे-सीधे इस्तेमाल कर लिया जाता है, उनको बहादुरी से स्वीकार कर फिल्मकार अपनी जगह और बेहतर कर सकता है मगर हिन्दुस्तान में ऐसा कम होता है।
गुजारिश जैसे विषय हिन्दी सिनेमा में कई बार विभिन्न तरह से उठाये गये हैं। भंसाली खुद ब्लैक भी बना चुके हैं जो एक विदेशी फिल्म की बहुधा नकल थी। वक्त-वक्त पर कोशिश, शोर, राव साहेब, आनंद, मिली, तारे जमीं पर, माय नेम इज खान आदि बहुत सी फिल्में बनी हैं मगर तकलीफें अपने नितान्त समस्यावादी दृष्टिकोण से बढ़ते हुए एक चरम विषाद तक पहुँचकर दर्शकों की सिनेमाघर में एक बार आँखें नम कर सकती हैं, जेब और पर्स से पुरुष-स्त्री अपने रूमाल निकालकर आँसू पोछ सकते हैं मगर जिस तरह का अवसाद लेकर घर जाते हैं वह फिल्म के पक्ष में कोई भी वातावरण बनाने में कामयाब नहीं होता।
गुजारिश एक ऐसी फिल्म है जिसके अन्त में आप अपने-अपने हिस्से और समझ का अन्त लेकर घर जाते हैं। भारतीय सिनेमा में हितिक रोशन की जो नायक छबि है, वो ऐसे लाचार और असमर्थ किरदारों में कोई बेहतर सफलता हासिल नहीं कर सकती लिहाजा, काम की भरपूर सराहना के बावजूद, कई बड़े पुरस्कारों की दावेदारी और हासिली की सम्भावना के बावजूद नायक के लिए गुजारिश का बहुत महत्व नहीं रह जाता। दर्शकों को हमारे फिल्मकार बहुत सारे ट्रेक पर ले जाने का विफल प्रयास करते हैं।
हमारे देश में अच्छे और निर्बाध सफर के लिए फोर लेन से लेकर और आगे तक की सडक़ें बन गयी हैं मगर सिनेमा में मनोरंजन और सार्थकता के लिहाज से अभी भी ऐसा कोई मार्ग नहीं खोजा जा सका है, जहाँ से दर्शक अपनी जेब के खर्च किए पैसे से मनोरंजन के नाम पर परम सन्तोष प्राप्त कर सके। वो अभी भी कई बार ठगा सा खड़ा रह जाता है।
हमारे यहाँ अंग्रेजी में इन्स्पाइरेशन जैसा शब्द पकड़े जाने पर हाथ से आँख मूँदकर समर्पण की मुद्रा में आने का सबसे अच्छा हथियार है। बहुत से फिल्मकार जो मौलिकता पर दिमाग लगाना नहीं चाहते, बहुत सारे अच्छे विषय विदेशी फिल्मों से हासिल कर लेते हैं। गुजारिश भी विदेशी फिल्म द सी इनसाइड और प्रेस्टीज की खूबियों को खींचने वाली फिल्म है। इस टिप्पणी के साथ प्रकाशित चित्र स्पेनिश फिल्म द सी इनसाइड का है। वास्तव में जो फिल्में निर्देशक को प्रेरणा देती हैं, जिनके दृश्यों को सीधे-सीधे इस्तेमाल कर लिया जाता है, उनको बहादुरी से स्वीकार कर फिल्मकार अपनी जगह और बेहतर कर सकता है मगर हिन्दुस्तान में ऐसा कम होता है।
गुजारिश जैसे विषय हिन्दी सिनेमा में कई बार विभिन्न तरह से उठाये गये हैं। भंसाली खुद ब्लैक भी बना चुके हैं जो एक विदेशी फिल्म की बहुधा नकल थी। वक्त-वक्त पर कोशिश, शोर, राव साहेब, आनंद, मिली, तारे जमीं पर, माय नेम इज खान आदि बहुत सी फिल्में बनी हैं मगर तकलीफें अपने नितान्त समस्यावादी दृष्टिकोण से बढ़ते हुए एक चरम विषाद तक पहुँचकर दर्शकों की सिनेमाघर में एक बार आँखें नम कर सकती हैं, जेब और पर्स से पुरुष-स्त्री अपने रूमाल निकालकर आँसू पोछ सकते हैं मगर जिस तरह का अवसाद लेकर घर जाते हैं वह फिल्म के पक्ष में कोई भी वातावरण बनाने में कामयाब नहीं होता।
गुजारिश एक ऐसी फिल्म है जिसके अन्त में आप अपने-अपने हिस्से और समझ का अन्त लेकर घर जाते हैं। भारतीय सिनेमा में हितिक रोशन की जो नायक छबि है, वो ऐसे लाचार और असमर्थ किरदारों में कोई बेहतर सफलता हासिल नहीं कर सकती लिहाजा, काम की भरपूर सराहना के बावजूद, कई बड़े पुरस्कारों की दावेदारी और हासिली की सम्भावना के बावजूद नायक के लिए गुजारिश का बहुत महत्व नहीं रह जाता। दर्शकों को हमारे फिल्मकार बहुत सारे ट्रेक पर ले जाने का विफल प्रयास करते हैं।
हमारे देश में अच्छे और निर्बाध सफर के लिए फोर लेन से लेकर और आगे तक की सडक़ें बन गयी हैं मगर सिनेमा में मनोरंजन और सार्थकता के लिहाज से अभी भी ऐसा कोई मार्ग नहीं खोजा जा सका है, जहाँ से दर्शक अपनी जेब के खर्च किए पैसे से मनोरंजन के नाम पर परम सन्तोष प्राप्त कर सके। वो अभी भी कई बार ठगा सा खड़ा रह जाता है।
सोमवार, 22 नवंबर 2010
गोवा में बिना ध्वनि का फिल्म समारोह
अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह का रस्मी आगाज हर साल की तरह इस साल भी 22 नवम्बर से हो गया है। गोवा में पिछले कई वर्षों से सिमट कर रह गये इस फिल्म समारोह में बॉलीवुड की गहरी छाया भी कुछ सालों से व्याप्त हो गयी है। एक वक्त वो भी था जब इस समारोह को व्यापक रूप से आकर्षण हासिल था। एक साल यह समारोह दिल्ली में हुआ करता था, उसके अगले साल देश के किसी मेजबान राज्य में। इस तरह से हर दूसरे साल दिल्ली में यह समारोह लौटता था। इस श्रृंखला के कारण इस समारोह को लोकप्रियता और भागीदारी दोनों स्तर पर महत्वपूर्ण माना जाता था।
हालाँकि एक दशक पहले से भी पहले के इस समय में प्राय: हर साल यह समारोह किसी न किसी कारण से विवाद का हिस्सा भी बनता था। फिल्मकार समारोह से नाराज रहने के बावजूद इसमें शामिल होते थे। अपर्णा सेन और अमोल पालेकर जैसे कलाकार-निर्देशक तो आयोजन स्थल पर ही समारोह के स्तर, व्यवस्था और चयन को लेकर प्रतिवाद किया करते थे। लेकिन धीरे-धीरे ऐसे विरोध भी थम गये और आयोजक फिल्म समारोह निदेशालय ने भी उन उम्मीदों और अपेक्षाओं को पूरा करने पर कभी गम्भीरता से विचार नहीं किया, जो लाजमी भी हुआ करती थीं।
प्रतिक्रियाहीन यह उपक्रम एक बार गोवा चले जाने और वहीं नींव खोदकर स्थापित कर दिए जाने के बाद और भी बैठ सा गया। बाद के सालों में ऐसी स्थिति आयी कि यह समारोह आम चर्चाओं के दायरे से भी बाहर चला गया। फिल्मों के चयन को लेकर सार्थक मापदण्डों का निर्धारण सही तरीके से नहीं हो पाता रहा।
जूरी सर्वोपरि होती है मगर उस जूरी में वे फिल्मकार शामिल होने लगे जिनका खुद का सार्थक काम कभी चर्चा का विषय नहीं रहा। खाली बैठे निर्देशक और कलाकारों की समितियाँ फिल्में चयन करने लगीं और धीरे-धीरे इस समारोह में जिनकी भी रुचि पहले हुआ करती थी, वो भी समाप्त हो गयी। इस बार भी 22 नवम्बर से यह समारोह शुरू हो रहा है जो 2 दिसम्बर तक चलेगा।
इण्डियन पैनोरमा की फिल्मों को दिखाये जाने की शुरूआत 23 नवम्बर से होगी। इस बार एन. चन्द्रा की अध्यक्षता वाली फीचर फिल्मों की दस सदस्यीय जूरी ने बीस दिनों में एक सौ चालीस फिल्में देखकर भारतीय पैनोरमा के लिए छब्बीस फिल्मों का चयन किया वहीं सिद्धार्थ काक की नॉन-फीचर फिल्मों की पाँच सदस्यीय जूरी ने पाँच दिनों में सन्त्यावने फिल्में देखकर उन्नीस फिल्में चुनीं जो इस बार के समारोह में दिखायी जायेंगी।
फीचर फिल्मों में एक तरफ थ्र्री ईडियट्स, रावण, तेरे बिन लादेन, आय एम कलाम और वकअप सिड जैसी हिन्दी फिल्में शामिल हैं वहीं भारतीय भाषाओं की फिल्मों में रितुपर्णाे घोष, गौतम घोष, गिरीश कासरवल्ली, सुधांशु मोहन साहू निर्देशित फिल्में चयनित हैं। अचरज है, बाजार से में आकर चैनलों पर जिन फिल्मों का प्रीमियर हो चुका, वे फिल्में समारोह का हिस्सा हैं। हैरत है कि राष्ट्रीय स्तर का फिल्म समारोह अब इस दशा पर आ पहुँचा है और औपचारिकता की पराकाष्ठा पर है।
हालाँकि एक दशक पहले से भी पहले के इस समय में प्राय: हर साल यह समारोह किसी न किसी कारण से विवाद का हिस्सा भी बनता था। फिल्मकार समारोह से नाराज रहने के बावजूद इसमें शामिल होते थे। अपर्णा सेन और अमोल पालेकर जैसे कलाकार-निर्देशक तो आयोजन स्थल पर ही समारोह के स्तर, व्यवस्था और चयन को लेकर प्रतिवाद किया करते थे। लेकिन धीरे-धीरे ऐसे विरोध भी थम गये और आयोजक फिल्म समारोह निदेशालय ने भी उन उम्मीदों और अपेक्षाओं को पूरा करने पर कभी गम्भीरता से विचार नहीं किया, जो लाजमी भी हुआ करती थीं।
प्रतिक्रियाहीन यह उपक्रम एक बार गोवा चले जाने और वहीं नींव खोदकर स्थापित कर दिए जाने के बाद और भी बैठ सा गया। बाद के सालों में ऐसी स्थिति आयी कि यह समारोह आम चर्चाओं के दायरे से भी बाहर चला गया। फिल्मों के चयन को लेकर सार्थक मापदण्डों का निर्धारण सही तरीके से नहीं हो पाता रहा।
जूरी सर्वोपरि होती है मगर उस जूरी में वे फिल्मकार शामिल होने लगे जिनका खुद का सार्थक काम कभी चर्चा का विषय नहीं रहा। खाली बैठे निर्देशक और कलाकारों की समितियाँ फिल्में चयन करने लगीं और धीरे-धीरे इस समारोह में जिनकी भी रुचि पहले हुआ करती थी, वो भी समाप्त हो गयी। इस बार भी 22 नवम्बर से यह समारोह शुरू हो रहा है जो 2 दिसम्बर तक चलेगा।
इण्डियन पैनोरमा की फिल्मों को दिखाये जाने की शुरूआत 23 नवम्बर से होगी। इस बार एन. चन्द्रा की अध्यक्षता वाली फीचर फिल्मों की दस सदस्यीय जूरी ने बीस दिनों में एक सौ चालीस फिल्में देखकर भारतीय पैनोरमा के लिए छब्बीस फिल्मों का चयन किया वहीं सिद्धार्थ काक की नॉन-फीचर फिल्मों की पाँच सदस्यीय जूरी ने पाँच दिनों में सन्त्यावने फिल्में देखकर उन्नीस फिल्में चुनीं जो इस बार के समारोह में दिखायी जायेंगी।
फीचर फिल्मों में एक तरफ थ्र्री ईडियट्स, रावण, तेरे बिन लादेन, आय एम कलाम और वकअप सिड जैसी हिन्दी फिल्में शामिल हैं वहीं भारतीय भाषाओं की फिल्मों में रितुपर्णाे घोष, गौतम घोष, गिरीश कासरवल्ली, सुधांशु मोहन साहू निर्देशित फिल्में चयनित हैं। अचरज है, बाजार से में आकर चैनलों पर जिन फिल्मों का प्रीमियर हो चुका, वे फिल्में समारोह का हिस्सा हैं। हैरत है कि राष्ट्रीय स्तर का फिल्म समारोह अब इस दशा पर आ पहुँचा है और औपचारिकता की पराकाष्ठा पर है।
रविवार, 21 नवंबर 2010
दहेज, साठ साल पहले
व्ही. शान्ताराम बीसवीं सदी के ऐसे महत्वपूर्ण फिल्मकार थे जिन्होंने सामाजिक प्रतिबद्धतापूर्ण फिल्मों का निर्माण अपने समय में बड़े साहस के साथ किया। दो आँखें बारह हाथ, पड़ोसी, डॉ. कोटनीस की अमर कहानी और दहेज जैसी श्रेष्ठ फिल्में उनके सरोकारों का सशक्त प्रमाण हैं। रविवार के दिन हम आज उनकी एक उल्लेखनीय फिल्म दहेज पर चर्चा करते हैं। भारतीय समाज की सबसे बड़ी सामाजिक बुराई दहेज को लेकर बाद में तो ड्रामा वेल्यू के हिसाब से बहुत सारी नाटकीय फिल्में बनीं मगर साठ साल पहले की दहेज नाम से ही शान्ताराम द्वारा बनायी गयी फिल्म इन सब तमाम फिल्मों में श्रेष्ठ और समय से कहीं ज्यादा आगे है।
दहेज फिल्म में पृथ्वीराज कपूर की मुख्य भूमिका थी। करण दीवान, जयश्री, उल्हास, केशवराव दाते, ललिता पवार फिल्म के दूसरे प्रमुख कलाकार थे। यह फिल्म एक युवती चन्दा और युवक सूरज की कहानी है जिनका विवाह, सूरज की लालची माँ और कुटिल रिश्तेदारों की वजह से जिन्दगी का सबसे बड़ा अभिशाप बन जाता है। सूरज की माँ दहेज में बहुत सारे सामान की अपेक्षा करती है और उसकी अन्तहीन मांग को पूरा कर पाना पिता के लिए असम्भव हो जाता है। चन्दा अपने कायर पति की वजह से सास के बड़े जुल्म सहती है और हर वक्त उसे इस बात के लिए साँसत में रहना होता है कि न जाने कब सास घर से तिरस्कार करके उसे बाहर कर दे और अपने बेटे का दूसरा विवाह कर दे।
चन्दा के आदर्शवादी पिता अपनी बेटी को मिलने वाली प्रताडऩा से भयभीत और चिन्तित, उसकी सास की इच्छा पूरी करने का भरसक प्रयत्न करते हैं। एक दिन वे बहुत बुरी तरह अपमानित और बेइज्जत होकर बेटी के ससुराल से लौटते हैं और अपना घर बेचकर बेटी के लिए तमाम सामान जुटाकर जब बेटी के ससुराल पहुँचते हैं तो वहाँ त्रासद घटना से सामना होता है। सास की मार से भयभीत बेटी ने अपने को एक कमरे में बन्द कर लिया है। सास दरवाजा तोडक़र बहू को मारने जाती है। दरवाजा टूटकर उस पर घिर जाता है और वह अपने पिता की गोद में दम तोड़ देती है।
फिल्म का अन्त अत्यन्त मार्मिक है। देखते हुए आँखें भीग जाती हैं। गोद में दम तोड़ती बेटी से पिता बिलखते हुए कहता है कि बेटी यह गरीब बाप तेरे लिए सब लेकर आया है। इस पर बेटी कहती है, पिताजी एक चीज देना भूल गये। पिता पूछता है, क्या बेटी? मरती हुई बेटी के आखिरी शब्द होते हैं, कफन। पिता के रूप में पृथ्वीराज कपूर ने मन को छू जाने वाला अभिनय किया है वहीं ललिता पवार ने निर्मम सास के रोल को अपने तेवर से सार्थक बनाया। जयश्री की भूमिका ही इस फिल्म को गहरी संवेदना प्रदान करती है।
दहेज, फिल्म का प्रभाव ऐसा हुआ था कि बिहार के विधायकों ने फिल्म के प्रदर्शनकाल में बड़ी प्रेरणा ग्रहण की थी और दहेजविरोधी बिल पास होने में भी इसका बड़ा योगदान माना जाता है। ऐसी सार्थक और झकझोरकर रख देने वाली फिल्मों को आज याद करना भी रोम सिहरा देता है।
दहेज फिल्म में पृथ्वीराज कपूर की मुख्य भूमिका थी। करण दीवान, जयश्री, उल्हास, केशवराव दाते, ललिता पवार फिल्म के दूसरे प्रमुख कलाकार थे। यह फिल्म एक युवती चन्दा और युवक सूरज की कहानी है जिनका विवाह, सूरज की लालची माँ और कुटिल रिश्तेदारों की वजह से जिन्दगी का सबसे बड़ा अभिशाप बन जाता है। सूरज की माँ दहेज में बहुत सारे सामान की अपेक्षा करती है और उसकी अन्तहीन मांग को पूरा कर पाना पिता के लिए असम्भव हो जाता है। चन्दा अपने कायर पति की वजह से सास के बड़े जुल्म सहती है और हर वक्त उसे इस बात के लिए साँसत में रहना होता है कि न जाने कब सास घर से तिरस्कार करके उसे बाहर कर दे और अपने बेटे का दूसरा विवाह कर दे।
चन्दा के आदर्शवादी पिता अपनी बेटी को मिलने वाली प्रताडऩा से भयभीत और चिन्तित, उसकी सास की इच्छा पूरी करने का भरसक प्रयत्न करते हैं। एक दिन वे बहुत बुरी तरह अपमानित और बेइज्जत होकर बेटी के ससुराल से लौटते हैं और अपना घर बेचकर बेटी के लिए तमाम सामान जुटाकर जब बेटी के ससुराल पहुँचते हैं तो वहाँ त्रासद घटना से सामना होता है। सास की मार से भयभीत बेटी ने अपने को एक कमरे में बन्द कर लिया है। सास दरवाजा तोडक़र बहू को मारने जाती है। दरवाजा टूटकर उस पर घिर जाता है और वह अपने पिता की गोद में दम तोड़ देती है।
फिल्म का अन्त अत्यन्त मार्मिक है। देखते हुए आँखें भीग जाती हैं। गोद में दम तोड़ती बेटी से पिता बिलखते हुए कहता है कि बेटी यह गरीब बाप तेरे लिए सब लेकर आया है। इस पर बेटी कहती है, पिताजी एक चीज देना भूल गये। पिता पूछता है, क्या बेटी? मरती हुई बेटी के आखिरी शब्द होते हैं, कफन। पिता के रूप में पृथ्वीराज कपूर ने मन को छू जाने वाला अभिनय किया है वहीं ललिता पवार ने निर्मम सास के रोल को अपने तेवर से सार्थक बनाया। जयश्री की भूमिका ही इस फिल्म को गहरी संवेदना प्रदान करती है।
दहेज, फिल्म का प्रभाव ऐसा हुआ था कि बिहार के विधायकों ने फिल्म के प्रदर्शनकाल में बड़ी प्रेरणा ग्रहण की थी और दहेजविरोधी बिल पास होने में भी इसका बड़ा योगदान माना जाता है। ऐसी सार्थक और झकझोरकर रख देने वाली फिल्मों को आज याद करना भी रोम सिहरा देता है।
शुक्रवार, 19 नवंबर 2010
बैण्ड, बाजा, बारात
देवोत्थान एकादशी से शादी-ब्याह के प्रतिबन्ध समाप्त हो गये हैं। एक बार फिर हमारे आसपास चारों तरफ सुबह एवं रातों को बैण्ड-बाजे पर बजती फिल्मी धुनें, नाच-गाना और मस्ती का आलम नजर आने वाला है। सर्दी का मौसम अच्छे खानपान का मौसम भी होता है लिहाजा उस दृष्टि से समय की अनुकूल है। शादी-ब्याह में खिलाए जाने वाले खाने की विविधाताएँ और समृद्ध झाँकी के भी नये-नये मौलिक आकल्पन और पेश करने के ढंग हर बार की तरह इस बार भी बदले होंगे। यह कम दिलचस्प नहीं है कि मनुष्य जीवन के प्रत्येक हिस्से से सिनेमा और खासकर सिनेमा का गीत-संगीत कितना गहरे जुड़ा रहता है। इसके बगैर जीवन में भला कहा रस या रंग दिखायी देता है।
दिसम्बर माह के पहले पखवाड़े में यश चोपड़ा के बैनर की एक फिल्म, बैण्ड बाजा बारात प्रदर्शित होने जा रही है। यह एक खूबसूरत कहानी है जिसमें आजकल के बदले चलन में जहाँ पैसा खर्च करके हर मुसीबत, औपचारिकता, जतन-प्रयत्न और जहमत से बचकर इन्स्टेन्ट अपेक्षाओं के बन चुके रिवाज को दिलचस्प ढंग से दर्शाया गया है। अनुष्का शर्मा, यश चोपड़ा कैम्प की फिल्म रब ने बना दी जोड़ी से परदे पर परिचित हुई थीं। इस बीच उनकी और कोई उल्लेखनीय फिल्म दिखायी नहीं दी। उनको परिचित कराने वाले कैम्प ने एक बार फिर उनको इस फिल्म के माध्यम से मौका दिया है। बैण्ड बाजा बारात में एक युवती और एक युवक शादी-ब्याह के काम को असाइनमेंट की तरह लेते हैं, हर काम आसान करके देते हैं और उसका पैसा लेते हैं।
अब हमारे संस्कारों में जिस तरह की व्यावसायिकता हावी हो गयी है, सारा का सारा फिल्मीकरण हो गया है, ऐसे में जो शेष चीजें खतरें में थीं वे सब भी नयी पीढ़ी ने अपनी तरह से लगभग रेडीमेड सी कर ली हैं। हालाँकि विवाह संस्कारों में भी ऐसे प्रोफेशनलिज्म का आना दूसरी तरह से अच्छा इसलिए लगता है कि इसके बहाने मांग पर ही सही व्यवस्था करने वाले पारम्परिक गीत-संगीत, पुराने जानकारों और पीढिय़ों-परम्पराओं से सीखकर आने वाले लोगों की तरफ जा रहे हैं। राजश्री और यशराज की फिल्मों की कहानी में विवाह अपने व्यापक और विस्तारित आयामों में एक घटनाक्रम, एक प्रसंग की तरह मुकम्मल भव्यता से घटित होने वाला दृश्य बनता है। गीत गाता चल, कभी-कभी, चांदनी, हम आपके हैं कौन आदि बहुत सी फिल्मों के नाम ऐसे वक्त में याद किए जा सकते हैं।
हम एक पूरा बड़ा समय बिसरा गये हैं जिसमें नानी, मौसी, बुआ और भाभियाँ तीज-त्यौहार की कथाएँ कहा करती थीं, बन्ना-बन्नी गाने में परिवार की महिलाओं को दक्षता हासिल होती थी, इसलिए क्योंकि उनको सिखाया जाता था। किस्म-किस्म के पकवानों की वे विशेषज्ञ होती थीं, उनके हाथों में स्वाद बसता था। अब तो सब कुछ बाजार से ले आया जाता है। हिन्दी फिल्मों में कभी-कभार जब ऐसे दृश्य लौटते हैं तो उन फिल्मों की याद दिलाते हैं। बैण्ड बाजा बारात आज के समय की फिल्म हो सकती है जो हमें सिनेमा और हमारी परम्पराओं में बहुत सारे छूटे और बिसरे वक्त को तरोताजा करने में पुनरावलोकन की तरह हो, देखना होगा।
दिसम्बर माह के पहले पखवाड़े में यश चोपड़ा के बैनर की एक फिल्म, बैण्ड बाजा बारात प्रदर्शित होने जा रही है। यह एक खूबसूरत कहानी है जिसमें आजकल के बदले चलन में जहाँ पैसा खर्च करके हर मुसीबत, औपचारिकता, जतन-प्रयत्न और जहमत से बचकर इन्स्टेन्ट अपेक्षाओं के बन चुके रिवाज को दिलचस्प ढंग से दर्शाया गया है। अनुष्का शर्मा, यश चोपड़ा कैम्प की फिल्म रब ने बना दी जोड़ी से परदे पर परिचित हुई थीं। इस बीच उनकी और कोई उल्लेखनीय फिल्म दिखायी नहीं दी। उनको परिचित कराने वाले कैम्प ने एक बार फिर उनको इस फिल्म के माध्यम से मौका दिया है। बैण्ड बाजा बारात में एक युवती और एक युवक शादी-ब्याह के काम को असाइनमेंट की तरह लेते हैं, हर काम आसान करके देते हैं और उसका पैसा लेते हैं।
अब हमारे संस्कारों में जिस तरह की व्यावसायिकता हावी हो गयी है, सारा का सारा फिल्मीकरण हो गया है, ऐसे में जो शेष चीजें खतरें में थीं वे सब भी नयी पीढ़ी ने अपनी तरह से लगभग रेडीमेड सी कर ली हैं। हालाँकि विवाह संस्कारों में भी ऐसे प्रोफेशनलिज्म का आना दूसरी तरह से अच्छा इसलिए लगता है कि इसके बहाने मांग पर ही सही व्यवस्था करने वाले पारम्परिक गीत-संगीत, पुराने जानकारों और पीढिय़ों-परम्पराओं से सीखकर आने वाले लोगों की तरफ जा रहे हैं। राजश्री और यशराज की फिल्मों की कहानी में विवाह अपने व्यापक और विस्तारित आयामों में एक घटनाक्रम, एक प्रसंग की तरह मुकम्मल भव्यता से घटित होने वाला दृश्य बनता है। गीत गाता चल, कभी-कभी, चांदनी, हम आपके हैं कौन आदि बहुत सी फिल्मों के नाम ऐसे वक्त में याद किए जा सकते हैं।
हम एक पूरा बड़ा समय बिसरा गये हैं जिसमें नानी, मौसी, बुआ और भाभियाँ तीज-त्यौहार की कथाएँ कहा करती थीं, बन्ना-बन्नी गाने में परिवार की महिलाओं को दक्षता हासिल होती थी, इसलिए क्योंकि उनको सिखाया जाता था। किस्म-किस्म के पकवानों की वे विशेषज्ञ होती थीं, उनके हाथों में स्वाद बसता था। अब तो सब कुछ बाजार से ले आया जाता है। हिन्दी फिल्मों में कभी-कभार जब ऐसे दृश्य लौटते हैं तो उन फिल्मों की याद दिलाते हैं। बैण्ड बाजा बारात आज के समय की फिल्म हो सकती है जो हमें सिनेमा और हमारी परम्पराओं में बहुत सारे छूटे और बिसरे वक्त को तरोताजा करने में पुनरावलोकन की तरह हो, देखना होगा।
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