शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

हिन्दी में सिनेमा का एनसायक्लोपीडिया


सिनेमा का संसार हिन्द महासागर की तरह है जिसकी अन्तहीनता की सिर्फ कल्पना की जा सकती है। दर्शक को उसका छोर भी बहुत मुश्किल से ढूँढ़े मिलेगा, वह भी अगर उसमें बहुत जतन करने की जिज्ञासा या कौतुहल हो अन्यथा सभी के लिए सिनेमा परदे का मनोरंजन है, चन्द घण्टे बैठकर सपनों की दुनिया की सैर कर आओ, लौटो तो खाली हाथ, कुछ आधे-अधूरे ख्वाबों के संग।

बहरहाल भारत में हिन्दी में एनसायक्लोपीडिया का तैयार होना एक बड़ी घटना है जिसे खासतौर पर ऐसे अवसर पर लोगों के बीच घोषित होना चाहिए जो वास्तव में सिनेमा से गहरे सरोकार रखते हैं। सिने रसिकों के लिए यह अथाह परिश्रम, क्षमताओं और जूझने वाली लगन से भरा काम वरिष्ठ फिल्म आलोचक, सम्पादक, लेखक श्रीराम ताम्रकर ने किया है जो इन्दौर में निवास करते हैं। उनको सिनेमा के संसार का अध्ययन और अनुभव का पाँच दशक से भी अधिक समय का ऐसा तजुर्बा है जिसमें निरन्तर सक्रियता उनका अपने ही से प्रमुख आग्रह रहा है। ऐसे व्यक्तित्व से ही इस तरह के बड़े काम की अपेक्षा की जा सकती है।

हिन्दी सिनेमा: एनसायक्लोपीडिया, श्रीराम ताम्रकर के अनुभवों, पढ़े-लिखे-देखे का जीता-जागता साक्ष्य है। अपने मार्गदर्शन में अनुभवी और दक्ष सम्पादन मण्डल के साथ जिनमें वरिष्ठ पत्रकार विनोद तिवारी, मनमोहन चड्ढा, सुरेश उनियाल, डाॅ. राजीव श्रीवास्तव, गोविन्द आचार्य आदि शामिल थे, यह दुर्लभ काम उन्होंने दो वर्ष के दिन-रात परिश्रम से पूरा किया है। इसमें 1500 प्रविष्टियाँ, 5000 से अधिक सन्दर्भ एवं सूचनाप्रधान प्रामाणिक जानकारी शामिल की गयी है।

इस एनसायक्लोपीडिया में स्टिल कैमरे के 1839 में आविष्कार के साथ ही सिनेमा के जन्म की दिलचस्प दास्तान, ल्यूमिएर ब्रदर्स, सावे दादा, दादा साहब फाल्के, सिनेमा से पहले का सिनेमा और सौ साल की यात्रा पर बहुत ही परिमार्जक ढंग से सावधानी के साथ आलेख, सूचनाएँ और जानकारियाँ संयोजित की गयी हैं। इस एनसायक्लोपीडिया में निर्माण, निर्देशन, अभिनय, कोरियोग्राफी, छायांकन, गीत, संगीतकार, एक्शन, संगीत संयोजन आदि पर बड़े उत्तरदायी ढंग से बात की गयी है। एनसायक्लोपीडिया तैयार करते हुए भारतीय सिनेमा की उन सब श्रेष्ठ और अमर विभूतियों का व्यक्तित्वपरक स्मरण किया गया है जिनकी अहम और आसाधारण भूमिका से ही सिनेमा ने अपने विराटपन को स्थापित किया है। 

इसी एनसायक्लोपीडिया में पहली बार फिल्मों की पारिभाषिक शब्दावली के बारे में समझा और जाना जा सकेगा जैसे क्लोज अप, लांग शाॅट, आॅन स्क्रीन साउण्ड, फ्लैश बैक, मोंताज, मीडियम शाॅट, आॅफ स्क्रीन साउण्ड, मिक्सिंग, डिजाल्व, अन-मेरिड प्रिंट आदि। समग्रता में सिने-व्यक्तित्वों के परिचय एवं योगदान के साथ ही फिल्म संस्थानों के साथ उनकी कार्यप्रणाली, उपयोगिता पर जानकारियाँ इसका हिस्सा हैं। एनसायक्लोपीडिया में सिनेमा से जुड़े सभी प्रमुख पुरस्कारों पर भी विस्तार से जानकारी है।

श्रीराम ताम्रकर इस प्रकल्प के मुख्य रचनात्मक सूत्रधार हैं जो लगभग पिछले दो वर्ष से लक्ष्य लेकर इस काम को पूरा करने में पिछले माह सफल हुए जब सम्पूर्णता में हिन्दी सिनेमा का भारत का यह पहला एनसायक्लोपीडिया उन्होंने पूर्ण किया। इस बीच स्वास्थ्य सम्बन्धी गहन समस्याएँ जिनमें हृदय की शल्य चिकित्सा भी शामिल है, से जूझते-लड़ते, चिकित्सकों द्वारा आराम और विश्राम के अनुशासन को भंग करते हुए उन्होंने इस कार्य को इति तक पहुँचाया। 

श्रीराम ताम्रकर का कहना है कि मेरे लिए यह सपना बहुत बड़ा नहीं था। नईदुनिया अखबार के लिए परदे की परियाँ, सरगम का सफर, नायक-महानायक, दूरदर्शन सिनेमा, फिल्म और फिल्म, विश्व सिनेमा और भारत में सिनेमा जैसे वार्षिक विशेषांकों का सम्पादन करते हुए, भारत के अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों का प्रेक्षक बने रहते हुए और नईदुनिया अखबार के लिए ही प्रतिमाह फिल्म संस्कृति जैसी लोकप्रिय लघु पत्रिका निकालते हुए मेरे लिए अब यही एक काम शेष था कि मैं हिन्दी के पाठकों के लिए उनकी भाषा और सुरुचि में सिनेमा का महाकोष तैयार करूँ। यह काम मेरे चालीस साल के तजुर्बे और सिनेमा माध्यम के प्रति अथाह अनुराग और निष्ठा का सुपरिणाम है। मैं ठहरकर, अपनी रचनात्मक तृप्ति की गहरी साँस लेता हूँ और अपने आपको खुशकिस्मत महसूस करता हूँ कि मायानगरी से बड़ी दूर इन्दौर शहर में रहते हुए मायानगरी के लिए ही यह बड़ा और अहम काम कर सका। 

बुधवार, 3 दिसंबर 2014

भोपाल दो-तीन दिसम्बर उन्नीस सौ चौरासी

बीसवीं सदी की एक बड़ी दुर्घटना जिससे बड़ी मानवीय क्षति हुई, शेष जीवन मानसिक अवसाद, प्रताड़ना, अन्देशों और डर भय से भरे हो गये, उसे आज तीस बरस हो गये हैं पर जी इतना कड़ा नहीं हो पाता कि सब भुलाया जा सके। मन को बहलाने और समझाने के लिए कहा जाता है कि वक्त से बड़ा कोई मरहम नहीं है, सब जख्म धीरे-धीरे भर जाते हैं लेकिन सच्चाई यह है कि जख्मों के धुंधले निशान भी छुओ तो हरे हो जाते हैं। उस समय का स्मरण एक साथ कई बातों का स्मरण कराता है, सहसा उस उम्र का स्मरण हो आता है और तब के मानस का भी।

तब की याद आती है, पढ़ाई-लिखाई मन न लगने के कारण अपनी पूरक चाल से आगे बढ़ रही थी लेकिन लेखन में रुचि हो गयी थी। अखबार श्वेत-श्याम निकला करते थे। उन दिनों रवीन्द्र भवन के खुले मंच पर राष्ट्रीय रामलीला मेला, मध्यप्रदेश आदिवासी लोककला अकादमी ने आयोजित किया था। उस मेले में प्रतिदिन होने वाली रामलीला की समीक्षा बड़े भाई तुल्य अनिल माथुर कर रहे थे जो तब जनसम्पर्क विभाग में अधिकारी थे पर अपनी पूर्ववर्ती संस्था नवभारत समाचार पत्र का युवा जगत पेज देख्‍ाा करते थे। उनको पारिवारिक काम से आगरा जाना हुआ तो मुझे कह गये कि अन्तिम दो दिनों की रामलीला तुम कवर कर के नवभारत को दे आना, तुम्हारे नाम से आयेगी। इस तरह दो दिन 1 और 2 दिसम्बर को रामलीला देखने और लिखने का काम किया था। 2 दिसम्बर को इधर रामलीला देख रहा था, उधर यूनियन कार्बाइड में दुर्घटना हो गयी थी। अगले दिन सुबह के सारे अखबार पहले पेज पर उस बड़ी दुर्घटना का समाचार दे रहे थे।

3 दिसम्बर सुबह से ही खबरें फैल रही थीं। नये भोपाल में किसी को पता न चला कि शहर में बीती रात क्या हो गया है? अगला दिन सच्ची झूठी खबरों का था। घटना इतनी भयानक थी हर बात पर विश्वास करते हुए भोपालवासी भीतर ही भीतर बहुत कमजोर होते जा रहे थे। ऐसा लगता था कि सबका अपना विवेक हार गया है। हर बात पर भरोसा करने को जी चाहता था और हर बात डराने वाली थी। याद है, उम्र तब इक्कीस वर्ष थी, 3 दिसम्बर को साढ़े ग्यारह बजे सुबह अफवाह उड़ी कि यूनियन कार्बाइड से फिर गैस रिस पड़ी है, तब पूरे शहर में बदहवास भगदड़ मच गयी। नये भोपाल के स्थान भी अछूते न रहे। हमारे मोहल्ले के लोग घर से जहाँ रस्ता मिले, भागने लगे, ताला डालने का की होश किसी को न था। एक तरफ मानवीय पहलू यह कि पीड़ितों को सब हर तरह की मदद करने आगे आये वहीं यह भी कि अगले दिन गैस रिसते हुए अपनी जान की परवाह करते भाग रहे लोग पड़ोसी की फिक्र भी नहीं कर रहे थे। एक परिवार तो अपने घर के अति बुजुर्ग की शिथिलता और लाचारी पर भी उनसे झुँझला रहे थे, सब तरह के तजुर्बे।

घण्टे भर बाद यह ऐलान हुआ कि दोबारा गैस नहीं रिसी है, सब घर में रहें, भागें न, कहीं न जायें। लोग बमुश्किल माने पर अगले पन्द्रह दिनों तक हर आदमी रह-रहकर जागता था, कितना सोता था पता नहीं। अगले पन्द्रह दिनों में से ही एक दिन यूनियन कार्बाइड में बचे रसायन से सेविन गोलियों का निर्माण कर रसायन खत्म कर दिया जाना था, वह रसायन जिससे यह भयानक हादसा हुआ। उसके बाद भी बरसों बल्कि कल तक यह खबरें आती रहती हैं कि अभी भी वहाँ जहरीला अपशिष्ट बचा है, पड़ा है, वगैरह वगैरह। सच तो यही था कि दुर्घटना वाली रात जहरीली गैस ने जमकर विनाशलीला की। चपेट में आये बुजुर्ग, बीमार, महिलाएँ, बच्चे, युवा हजारों की संख्या में असमय काल कवलित हो गये। 

हम लोग अपने मुहल्ले से पाँच सात साथी सायकिलों पर हमीदिया अस्पताल जाया करते थे, दूध, डबलरोटी और खाने की दूसरी सामग्रियों के साथ लेकिन वहाँ इस आपदा के शिकार निर्दोषों को भूख की नहीं जीवन और साँसों की जरूरत थी, हम लोग असहाय से उनको तड़पते, विलाप करते, रोते देखते थे और भीतर तक सिहरन तथा दुख से भर जाते थे। हम सबके पास इसकी दवा नहीं थी। हर रोज अस्पताल के दृश्य रुलाया करते थे, हौसले को कमजोर किया करते थे। सालों साल हमने अपनी मानसिकता को कमजोर होते देखा है। मुझे अपनी भी याद है, बहुत डरा करता था। उस समय आकाशवाणी में विनोद तिवारी, गजलकार समाचार पढ़ा करते थे। मैं प्राय: उनके पास बिना जान पहचान के कभी रेडियो स्टेशन तो कभी उनके घर पहुँच जाया करता था, पूछने कि अब तो कुछ नहीं होगा, अब तो कोई खतरा नहीं है। कई बार इस बात पर वे झुँझला जाया करते थे। बाद में एक-दो बार उन्होंने मुझे भगा भी दिया था। कहने का अर्थ यह कि कैसे एक भयावह घटना मनोबल को कमजोर करती है, विश्वास को डिगा देती है, जवाबदारियों के लायक नहीं रहने देती। कैसे हम केवल अपने बारे में सोचने लगते हैं, कैसे मानसिक भरम हर पर डगमगाये रखते हैं। अनुभवों का जखीरा लम्बा है, राजीव गांधी आये थे पीड़ितों को देखने, याद है बहुत कुछ। 

यूनियन कार्बाइड की दुर्घटना का समय देर रात से सतत सुबह तक का है, आगे भी कई दिनों तक जब तक आसमान में गैस मण्डराती रही लेकिन किस तरह इस काल-आक्रमण से सर्वथा बेखबर लोग इस दुनिया से चले गये। भोपाल इस घटना के बाद अनेक वर्षों तक अनेक मुश्किलों से जूझता रहा है। घटना हो जाने के बाद घातक रसायन के उन लोगों और पीढ़ियों में प्रभाव बने हुए हैं जिनके प्राण किसी तरह बच गये। सोच कर मन काँप उठता है कि हम कारखाने से पन्द्रह किलोमीटर दूर होकर महीनों-सालों भयमुक्त नहीं हो पाये, उनका क्या होता रहा होगा, जो जद और हद में रहे होंगे!!

गुरुवार, 27 नवंबर 2014

माँ निगरानी में खाना खिलाती है

मम्मी के साथ खाना खाने की बात तय कर आओ तो वे व्यग्रता से प्रतीक्षा करती हैं। उन्होंने साफ-साफ कह दिया है कि समय पर आ जाया करो, देर होगी तो फिर हम सो जायेंगे। अपनी मसरूफियत उनका समय न बिगाड़े इसकी फिक्र रहती है। दस-पन्द्रह दिनों में जब कभी उनके साथ खाने का वक्त आता है तो लगता है बरसों की भूख से अब निजात मिल रही है। 

मम्मी हमेशा की तरह बहन-बेटी से थाली परोसे जाने के पहले मेरे लिए सलाद काट देने की याद दिलाना नहीं भूलतीं। मुझे बचपन से ही प्याज, टमाटर, हरी धनिया, हरी मिर्च और उस पर नमक डालकर खूब मिलाकर बनने वाला सलाद बहुत पसन्द है। वह फैंसी, आकल्पन वाला, सजा-सजाया सलाद मुझे कभी स्वादिष्ट नहीं लगा। जब तक अपनी मरजी का काटकर अच्छे से मिलाया नहीं तब तक नमक टमाटर-प्याज में नहीं मिला और उसने रस नहीं छोड़ा, वैसा।

मैं मम्मी को देखकर मुस्कुरा उठता हूँ। कहता हूँ कि मम्मी सबको पता है कि यह मेरी पसन्द है, आप भी आदेशित करेंगी ही फिर तो मिलेगा ही पर मम्मी का काम ध्यान दिलाना है, बिटिया, भैया के लिए सलाद जरूर काट देना।

इस तरह का सलाद बचपन की पसन्द है। पाँच-सात साल की उम्र में ही एक बार शायद शाम चार बजे स्कूल से आकर खाने की जिद करने लगा। घर में रोटी रखी थी, सब्जी और दाल सुबह खत्म हो गयी थी। मम्मी कहने लगीं, जरा रुक जाओ, अभी सब्जी बनाये देते हैं पर उस समय ठुनकने लगा, अभी खाना चाहिए। तब मम्मी ने प्याज, टमाटर, धनिया, मिर्च का यह सलाद काटकर बनाया और दो रोटी के साथ खाने को दिया। सच कहूँ खुशी-खुशी खा गया। मजेदार लगा। फिर हर दो-चार दिन में अपनी यही फरमाइश, सलाद बना दो।

तभी से यह सलाद जुबाँ पर चढ़ गया। आज तक जब कभी घर की मेहरबानी से थाली में मिल जाये तो मन मजे का हो जाता है लेकिन मम्मी-पापा के घर में खाना खाया तो सलाद खाने के साथ पक्का ही समझो। यह सलाद आज भी अपने हाथ से बनाकर बड़ा मजा आता है। आखिर में जब दाल-चावल-सब्जी में इसका टमाटर और नमक छूटा रस मिला लो तो स्वाद और भी बढ़ जाता है। इधर मम्मी हमेशा की तरह सरदी में कुछ ताजे टेम्परेरी अचार भी डलवाती हैं बहनों से गाजर का, नींबू का, आँवले का, सेम-मटर का, मूली का और सबका मिलाजुला भी। इसके साथ ज्वार, बाजरे और मक्का तथा बिर्रा (गेहूँ, जौ, चना) की रोटी का बड़ा मजा है। इसके साथ आखिर में एक टुकड़ा गुड़ भी।

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

॥ स्वीटी के बच्चे ॥


उसका नाम स्वीटी था नहीं लेकिन उसके नियमित आते रहने से किसी न किसी नाम से पुकारना ही था सो सब यह कहने लगे। दरअसल किसी तीसरे मुहल्ले की वह पालतू है पर जाने वो अपना घर खाली करते समय उसे नहीं ले गये या कुछ और वह एक दिन घर आ गयी। उसे कुछ खाने को दिया जिससे यह हुआ कि प्राय: आने लगी लेकिन सफेद रंग की यह साफ सुथरी स्वीटी देखते हुए इतना आल्हाद व्यक्त करती थी कि मन खुश हो जाता था। मेरे पास का वह सब खा लिया करती थी, बिस्कुट, मूँगफली, चने कुछ भी।

कुछ दिन में उसकी आदत ऐसी बन गयी कि वो घर में ज्यादातर समय बैठी रहती, आँगन में। आते-जाते सब पर मुफ्त का रुआब, भौंकने पर सब डरते, अन्दर आने से। घर से बाहर जाओ तो वह ऐसे देखती है जैसे उसकी जवाबदारी है सब। लौट कर आने तक आँगन में ही रहती। जब आओ तो मुँह ऊपर करके एक लम्बा सुर भी निकालती, जैसे वेलकम कर रही हो।बहरहाल इसी स्वीटी ने कुछ समय पहले तीन सन्तानों को हमारे ही आँगन के एक कोने में जन्म दिया। तीनो ही जेण्ट्स। अच्छे अच्छे रंगों वाले, सफेद में कुछ खाकी चित्ते-चकत्ते के साथ। इस समय पन्द्रह-बीस दिन के हो गये हैं, पहले पाँच सात दिन पड़े रहे, आँखें नहीं खुली थीं, जब आँखें खुल गयीं तब से सयाने हो गये हैं, अपनी उम्र के मुताबिक।

इन दिनों खूब कूदते-फाँदते और मस्ताते हैं, छोटा मुँह बड़ी बात टाइप पुक-पुक करके भूँकते भी हैं आपस में कुश्ती लड़ते हुए। इनमें सबसे छोटा गब्दू टाइप है और शेष दो जरा स्मार्ट फिटनेस का ख्याल रखने वाले। सुबह और शाम, कई बार रात में भी इनकी मस्तियाँ देखने को मिलती हैं। कई बार लिखते-पढ़ते पैरों के पास आ जाते हैं और जीभ से उंगलियाँ-छुँगलिया चाटने लगते हैं, ओह याद करके गुदगुदी महसूस होती है। मैं उन्हें ज्यादा लड़ियाता नहीं पर वे उसके लिए निमंत्रण की परवाह भी नहीं करते।

जीवन की आपाधापी में कई बार आपको अनुभूत करने वाली खुशी और सुख किस तरह मिलता है, इस पर मैं सोचने लगता हूँ। अनेक जगहों से खिजे-पिटे और बुझे लौटकर आने के बाद ये प्राणी, निश्छल और आत्मीय कैसे आपको एक अलग ही संसार में ले जाने आ जाते हैं। ये अबोले केवल प्रेम की भाषा जानते हैं, जो बोलते हैं वो कई भाषाओं के धनी होते हैं, उस दुनिया से इस दुनिया में कितना अन्तर है, थोड़ी देर इस दुनिया में रहकर लगता है बहुत सारी तकलीफें कम हुई हैं............................

गुरुवार, 6 नवंबर 2014

केतन मेहता और रंगरसिया


कला और मनोरंजन का संसार अनूठा है। इस संसार में उत्कृष्टता और श्रेष्ठता की चुनौतियाँ सर्जक और सृजन दोनों ही स्तरों पर निरन्तर बनी रहती हैं। किसी समय यह मापदण्ड दोनों ही स्तरों पर लीक से अलग हटकर और आकृष्ट किए जाने की स्थिति तक प्रायः उदाहरण बना करता था। एक लम्बा समय लगा इस यथार्थ को स्थापित हुए और एक चरम या शीर्ष पर पहुँचकर वैकल्पिक धरातलों पर या सरलतम सृजनमार्ग पर फिर एक लोकप्रिय जगत को सिरजना उस मूल भाव के विपरीत व्यापक हुआ जिसकी साधना या सरोकार अक्षुण्ण रहे थे। हमारे सामने दूसरी परम्परा का आना और उसमें एक बड़े जिज्ञासु समाज का समरस होना एक दूसरी घटना थी जिसने अच्छे मिथकों को भी चुनौतियाँ दीं। सर्जना के मूलभूत तत्व ही दूसरी परम्परा का माध्यम बने, वे औजार जिन्हें मनुष्यता ने खुद गढ़ा था, आगे चलकर मनुष्य के ही गढ़े दूसरे औजारों से पिछड़ गये। सर्जना श्रेष्ठता के अपने मानक धरातल पर ही विभाजित होने लगी। देखते ही देखते एक समानान्तर स्थान विकसित हो गया, प्रतिष्ठापनाएँ यहाँ की ज्यादा चकाचैंधभरी नजर आने लगीं। हमारे सामने श्रेष्ठजनों को आदरणीयों का स्थान प्राप्त हो गया और उनका चरण स्पर्श भर करके हमने उनको उतने ही तक सीमित कर दिया।

यह एक लम्बी बहस का विषय हो सकता है कि जो ऊष्मा समूचे परिवेश को ताम्बई आभा दिया करती थी, जो ताप हमने बड़ी दूर रहकर भी अपने व्यक्तित्व में अनुभूत किया उसी के बरक्स हमने आधुनिक धारा का एक और दौर अस्तित्व में आते देखा जिसकी सीमाओं ने यद्यपि स्वर्णिम दौर को स्वर्णिम बने रहने दिया लेकिन उसको सीमित भी कर दिया। 

केतन मेहता की रंगरसिया प्रदर्शन के परिणाम तक पहुँच सकती थी इसका अनुमान नहीं रह गया था क्योंकि वे इसे पाँच साल से बनाये बैठे थे। केतन मेहता पिछली सदी में आठवें दशक के एक महत्वपूर्ण फिल्मकार हैं जिनकी दृष्टि पर भरोसा किया ही जा सकता है क्योंकि बाद के भटकाव को छोड़कर प्रारम्भ में उनके सभी काम अच्छे थे, अच्छे थे अर्थात स्पर्धी दौर में श्याम बेनेगल, गोविन्द निहलानी, सईद मिर्जा, प्रकाश झा और सुधीर मिश्रा के कामों के बीच चर्चा में आते थे। पहले पैराग्राफ में जो बात आयी, केतन मेहता उसी तरह के समय के मारे कहे जायेंगे। जी चैनल पर उनका एक धारावाहिक प्रधानमंत्री ध्यान में आता है जो शायद चाचा चौधरी धारावाहिक के बाद उनका आखिरी अच्छा प्रयोग था। मंगल पाण्डे को लेकर कुछ ठीक से कहते नहीं बन रहा है लेकिन जब राजा रवि वर्मा जैसे व्यक्तित्व के साथ उन्होंने अपनी नयी फिल्म की कल्पना प्रस्तुत की तब लगा कि वे हताशा के बड़े समय में भी अपनी रचनाधर्मिता में थोड़ा ताप बचाये हुए हैं।

रंगरसिया को बना चुकने के बाद केतन को इतने बड़े समय में कई बार यह लगा होगा कि शायद इसका प्रदर्शन न हो पाये। बहरहाल उस निर्माण संस्था को जरूर धन्यवाद देना चाहिए जिसकी वजह से यह फिल्म सिनेमाघरों तक आ रही है। सैकड़ों करोड़ों के क्लब में दौड़-फांदकर जा पहुँचने के इस अजीबो गरीब समय में रंगरसिया को कुछ हजार संजीदा दर्शक देखते हैं तो यह बड़ी बात होगी। भारतीय कला परम्परा में राजा रवि वर्मा का व्यक्तित्व और कृतित्व अपनी जगह महान हैं। महान व्यक्तियों पर अथवा उनसे जुड़ी प्रतिभासम्पन्नता पर काम करना उत्साह और चुनौती के साथ संवेदनशील भी होता है। 

यह जरूर अचरज से भरा है कि इस फिल्म का प्रचार-प्रसार जन-आकर्षण की दूसरी जिज्ञासाओं के साथ हो रहा है। रचनात्मक रूप से एक बड़े कलाकार पर फिल्म बनाते हुए पूरे विषय को किस तरह बरता गया है, कैसे राजा रवि वर्मा के सृजनात्मक जीवन और जगत में सजगता और दक्षता के साथ प्रवेश किया गया है, यह केतन मेहता की ओर से इस बीच प्रदर्शन के इन पाँच-सात दिनों में सामने आना था। बहरहाल शुक्रवार को फिल्म प्रदर्शित हो रही है, देखना महत्वपूर्ण होगा कि भवनी भवई और मिर्च मसाला वाले केतन मेहता सिने-सर्जक के मूलभूत कलाकौशल पर अभी भी कितना स्थिर हैं, कितना डिग चले हैं..........?

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सोमवार, 20 अक्टूबर 2014

माँ युद्ध से डरती है... नहीं माँ युद्ध करती है............



इस बार मैं सातवीं मंजिल से बाहर देख रहा था। बाहर देखते हुए मेरी जिज्ञासा उसी मन्दिर को देखने की हुई जिसे शायद पाँच-छः वर्ष पहले कुछ दिन रोज सुबह उठ कर देखा करता था और मन ही मन उस पूरे दिन के लिए प्रार्थना किया करता था। उस समय माँ श्वास की गम्भीर बीमारी के कारण इसी भवन के अस्पताल में दाखिल हुईं थीं। तब अस्पताल का नाम कुछ और था। दस-बारह दिन साँस थामे ही बीते थे जिसमें हर दिन अनिश्चय से भरा था। याद आता है, उस समय वह कागज साइन किया था जिसमें माँ को वेण्टिलेटर पर लेने से पहले का वचन पत्र था, यही कि अपने जोखिम पर उनकी चिकित्सा या प्राण रक्षा के लिए हम उन्हें इसके लिए सौंप रहे हैं। अपनी सबसे छोटी बहन की तरफ देखते हुए उस पर अपने साइन कर दिए थे। माँ की तबीयत का रोज ही तब कुछ अन्दाजा नहीं हो पाता था। तीसरे दिन की बात होगी जब अचानक उनकी तबीयत में गिरावट आयी और उनको देखने वाले डाॅक्टर यह कहते हुए लिफ्ट के अन्दर चले गये थे, कोई भी केजुअलिटी हो सकती है..............

मित्रों, शुभचिन्तकों का आना होता था अस्पताल में। वेण्टिलेटर पर हैं यह सुनकर सभी के चेहरे क्षण भर को स्थिर हो जाते। याद है, एक मित्र ने जरूर कहा था कि वेण्टिलेटर का मतलब बुरा ही नहीं है, इससे भी लोग ठीक होकर आते हैं। उन्होंने अपने किसी का उदाहरण भी दिया था। उन्हीं मित्र का अकेला विश्वास मुझे जरा-जरा सम्बल दिया करता। वास्तव में चमत्कार ही था जब छठवें-सातवें दिन उनकी तबीयत में सुधार हुआ और दस दिन बाद उन्हें अस्पताल से घर जाने दिया गया।

इस अवधि में मेरी रात गहन चिकित्सा इकाई के बाहर बारामदे में कुर्सी पर जागते-सोते बीतती। छोटी डाॅक्टर बहन मम्मी के पलंग के पास कुर्सी पर आँखें खोले रात भर बैठी रहा करती। उस वक्त सुबह का उजास और खिड़की के बाहर उस मन्दिर को दूर पहाड़ी पर देखना, भरी आँखों से अपना आवेदन करना सब कुछ ज्यों का त्यों याद रहा.................अस्पताल से मम्मी को छुट्टी मिलने के बाद फिर उस मन्दिर का रास्ता तलाशते हुए ऊपर पहाड़ी पर गया भी था।

इन कुछ वर्षों के बाद अभी फिर उसी दिशा के प्रायवेट रूम में मम्मी को लेकर आते हुए खिड़की के बाहर आँखों ने उसी मन्दिर को ढूँढ़ना शुरू किया। इस बार मम्मी की एक सर्जरी होना थी। यह तकलीफ मम्मी को साल भर से थी लेकिन किसी को उन्होंने बताया नहीं। बाद में जब दर्द असहनीय हुआ तो घर में बहनों को मालूम हुआ मगर इस हिदायत के साथ कि मुझे न मालूम पड़े। लेकिन ज्यादा दिनों तक उनकी तरफ से यह छुपा नहीं रहा। जब बताया गया तो मैं हतप्रभ था। गम्भीर बीमारी थी और सर्जरी तत्काल निदान के लिए की जानी थी। अनेक परीक्षणों के बाद सर्जरी की जाना सुनिश्चित हुआ। यही भवन अस्पताल का लेकिन इस बार अस्पताल का नाम बदला हुआ था और अस्पताल भी अत्यन्त आधुनिक और आज की जरूरतों के मुताबिक।

मम्मी, मुझ जैसे पचास वर्षीय व्यक्ति की, समझ लो उम्र, अपने समय की सख्त टीचर। छात्रों से लेकर हम बच्चों को भी एक ही तरह के थप्पड़ से मारने वालीं। सर्जरी के लिए बमुश्किल राजी हुईं, अनेक बहानों और असहयोग की दृष्टि से डराने वाली बातों के बाद। माँ तो माँ है, हम सबकी माँ की तरह। उनका अपना जीवन, परिवेश, स्वभाव और भी तमाम चीजें, किसी से क्या डर! मम्मी भी, सबसे खूब बातचीत। नर्स से लेकर डाॅक्टर तक सभी से न जाने कितनी बातें। डाॅक्टर भी भले और सहिष्णु जो अम्मा जी की सब बातों पर हाँ करते। बाद में पता चला कि लोकल एनेस्थीसिया के प्रभाव में भी खूब बतकहाव करते हुए अपनी सर्जरी करवायी। हम लोग बाहर सहमे खड़े रहे। एक के बजाय चार घण्टा लगा लेकिन अन्दर से मुस्कुराती हुई आयीं। उनकी मुस्कुराहट हम तक आते-आते हमारी आँखों के आँसू बन गयी।

उन्हें छुट्टी अगले दिन मिल जाती लेकिन श्वास की आदर्श गणितीय संख्या अपेक्षा से ज्यादा कम थी इसलिए दो दिन ज्यादा लगे। बहरहाल पाँचवें दिन उन्हंे घर ला सके। अस्पताल के दरवाजे से प्रायवेट रूम तक जाना, अस्पताल के भीतर अनेक कमरों में जाँच के लिए ले जाना और फिर बाहर आने का काम व्हील चेयर पर ही होता था। माँ इस प्रक्रिया में अस्पाताल के सहायकों को मना कर देतीं, बेटा तुम रहने दो, ये काम हमारा लड़का ही कर पायेगा। उनकी बीमारी को लेकर घोर चिन्ता के बावजूद उनका यह विश्वास मुझे थोड़ा हँसा देता। मेरे बैठाने, पैर को फुट रेस्ट पर व्यवस्थित जमाने और व्हील चेयर लेकर चलने पर उनकी आश्वस्ति मुझे भी आश्वस्त करती....................माँ घर में हैं, फिर से अपनी क्षमताओं को जुटाती हुईं, धीरे-धीरे और ठीक होती हुईं।

अपने मित्रों की हर पल मेरे साथ बनी रहने वाली फिक्र का क्या कहूँ क्योंकि औपचारिक शब्द ऐसी आत्मीयता के आगे एक तोला बराबर भी नहीं हैं लेकिन इस पूरे समय में अपने सारे मित्रों को हर पल मैंने अपने पास, अपने साथ महसूस किया। अपने दायित्व बोध में उनकी चिन्ता भी हिम्मत बनकर मेरे साथ थी। माँ की कुशलक्षेम उनको बतलाते हुए उनके इतने जुड़ाव और अपनेपन से जो क्षमताएँ मैंने पायीं, उनको कहकर व्यक्त कर पाना मेरे वश का नहीं है..............

शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

मेरा स्कूल, मेरे गुरु



मैं सम्राट अशोक माध्यमिक शाला भवन के सामने जाकर खड़ा होता हूँ। अन्दर कुछ हलचल हो रही है। सभी कक्षाएँ लगी होंगी। विद्यार्थी आये होंगे, शिक्षक पढ़ा रहे होंगे। आज स्कूल की छुट्टी नहीं है। बाहर से दोनों ओर देखता हूँ एक तरफ शीशम का पेड़ लगा है बड़ा सा जिस पर हम मित्र अक्सर चढ़ जाया करते थे और ऊपर से कूदने का खेल किया करते थे। वहीं एक बार फिसलकर नीचे आते हुए तने पर लगे काँटेदार तार से पेट लम्बा खरुँच गया था, खून भी निकला था, कई दिन चोट-दर्द बनी रही। अगले दिन नहलाने के लिए मम्मी ने बनियान उतारी तो उस बदमाशी के एवज में चार थप्पड़ भी लगाये थे। उसी पेड़ ने नीचे एक बूढ़ी अम्माँ बैठा करती थी जो हरी इमली, गुड़ की गजक, बेर और बेर का चूरन, चने और मूँगफली बेचा करती थी। वहीं से थोड़ा नीचे मदन का ठेला लगता था, वह खीरे-ककडि़याँ पानी में भिगोकर बीच से दो काटकर उनमें नमक-लाल मिर्च लगाकर बेचता था। 

पेड़ के नीचे अब दूसरे बिचवैया बैठते हैं। बूढ़ी अम्माँ के तो कई जनम हो गये होंगे, मदन का भी क्या पता कहाँ होगा? बाहर थोड़ी देर खड़े रहकर जैसे मैं अपने आपको ही भीतर भेजता हूँ खुद अपने को पाँचवीं कक्षा में बैठा देखने के लिए। टाटपट्टी पर अल्यूमीनियम का बक्सानुमा, पेटी कहा करते थे, वही लेकर जाया करता था। उसे खरीदवाने के लिए नाक में दम कर दिया था, मम्मी-पापा की। वे कहते भी थे कि ये बड़ी क्लास के बच्चों के लिए है पर अपने को चाहिए थी बस। पढ़ाई-लिखाई में जितना लद्धड़, बाकी नौटंकी में उतना ही आगे। समय पर सब चाहिए बस्ता, पेन-पेंसिल, कम्पाॅस, फुटा, कटर, रबर सब। 

हसन सर को यहीं पर जाना। नये आये थे, जैन सर कक्षा में उनको लेकर आये थे, कहते हुए कि ये हसन खान सर हैं, नये आये हैं। अब ये आपको गणित पढ़ायेंगे। जैन सर स्वयं हिन्दी और विज्ञान पढ़ाते थे। जैन सर और हसन सर दोनों के पास सायकिलें थीं। जैन सर पास में रहते थे और हसन सर दूर पुराने शहर में। हसन सर को पढ़ाने मेें बहुत रुचि थी। वे बड़े समदर्शी थे। सभी विद्यार्थियों पर बराबर निगाह रखते। प्रतिभाशालियों को प्रोत्साहित करते और हम जैसे गँवारों को ठोंक-बजाकर अपने हिसाब का बना लिया करते। उनका अजीब काम था, नहीं आये छात्रों को घर से बुलवा लिया करते, दूसरे छात्रों को भेजकर और डाँट-फटकार कर कक्षा में बैठा लिया करते। मारते तो थे खैर लेकिन उस मार में कोई दुर्भावना नहीं केवल एक ही भावना बच्चा पढ़ने में मन लगाये। उनका पढ़ाना घण्टे के हिसाब से नहीं बल्कि समझायी जाने वाली बात पूरी हो जाने तक रहता, भले ही वे जैन सर के पीरियड भी इसमें शामिल कर लिया करते।

हमारे कुछ दोस्त, मैं भी प्रायः उनसे मार खाया ही करते। मैं कुछ अधिक इसलिए क्योंकि हमारी माँ भी उसी स्कूल में पढ़ाती थीं। कई बार उन्होंने माँ के सामने भी तमाचे लगाकर अपना प्रभाव दिखाया। हाँ, तो हमारे कुछ दोस्त बाद में इसका बदला भी लिया करते। कई बार यह हुआ कि हसन सर और जैन सर की सायकिलों की हवा निकाल दिया करते। फिर दूर कहीं से उनको पैदल सायकिल घसीटकर जाते देख मजा लेते। एक दोस्त जो अभी साथ नौकरी पर भी है, याद करके हँसता है कि उसने न केवल हसन सर की सायकिल की हवा निकाली बल्कि उसका वालट्यूब, ढिबरी कहीं दूर फेंक दी। उस दिन सर समझ गये थे कि लड़के ये भी करने लगे हैं पर उनकी शिक्षा जिसमें निष्ठा प्रबल थी, उसमें कमी नहीं आयी।

याद आता है, हसन सर की पढ़ाई का ही कमाल था कि उस साल हमारी पाँचवीं क्लास में तीन छात्र प्रावीण्य सूची में आये थे और कक्षा के शत-प्रतिशत छात्र प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए थे। सम्राट अशोक माध्यमिक शाला के इतिहास में ऐसा परिणाम न पहले आया था और न ही अब तक आया होगा। याद है दृश्य जब परीक्षा परिणाम कार्ड बाँटते हुए हसन सर खूब खुश थे और नाम बुला-बुलाकर, कुछ छात्रों को जिनको वे बोझा ढोने वाले प्राणियों के नाम से सम्बोधित करते थे, प्यार से घूँसा और धौल जमाकर कार्ड पकड़ा रहे थे।

मैं हसन खान सर को हमेशा याद रखता हूँ क्याेंकि उस निष्ठा का मुझे कभी पर्याय नजर नहीं आया अपनी आगे की पढ़ाई पढ़ते हुए भी। मैं अक्सर सोचता था कि हसन सर को इतने सालों में कभी भी शिक्षक दिवस के दिन श्रेष्ठ शिक्षक का पुरस्कार क्यों नहीं मिला? हसन सर कभी इसके लिए लालायित नहीं रहते थे, वे अपना कर्म निष्काम और निस्वार्थ भाव से ही करते थे। हसन सर बाद में भी मिला करते थे, हम सब बड़े हो गये थे, किसी न किसी काम से जुड़ गये थे, सर कहा करते थे, तुमने हमारी बड़ी नाक कटायी। हमारे पढ़ाये बच्चे बड़ी-बड़ी जगहों पर हैं कोई डाॅक्टर है, कोई इंजीनियर है, कोई प्रोफेसर है, कोई पुलिस अधिकारी है। एक तुम हो जो फिसड्डी ही रहे। सर की बात सुनकर हँसी ही आ जाती रही लेकिन कभी ऐसा नहीं लगा कि उनमें कोई पक्षपात की भावना है। हसन सर के बारे में सुना है कि वे सेवानिवृत्त होने के बाद शायद अपने बेटों के पास मुम्बई में रहने लगे हैं। मैं अपने जहन में लेकिन उनको अपने बड़े पास ही मानता हूँ। जब कभी तन्हा होता हूँ, उस उम्र में जाता हूँ, सम्राट अशोक स्कूल दिखायी देता है तो हसन सर याद आते हैं, वाकई हमारे हीरो।