बुधवार, 17 दिसंबर 2014

पत्रिकाओं से जन्मजात सरोकार की बात पर..........

पत्रिकाओं को लेकर बचपन से ही बड़ी ललक रही है। छोटे थे तब पापा-मम्मी ने अखबार वाले हॉकर करीम चाचा से तीन पत्रिकाएँ बँधवा दी थीं, चम्पक, नंदन और पराग। प्राय: ये पत्रिकाएँ साप्ताहिक ही हुआ करती थीं। आगे चलकर हमें जब लोटपोट और चन्दामामा के बारे में जानकारी हुई तो हमने मम्मी-पापा की आफत करके ये दोनों पत्रिकाएँ भी करीम चाचा से लगवा लीं। इन पत्रिकाओं की प्रतीक्षा जागते ही करने लगते। 

करीम चाचा बड़े दिलचस्प आदमी थे। सायकिल में अखबार सजाये जब वे मोहल्ले में दाखिल होते थे तो हर घर के लोगों को जानने और नाम-सरनेम से बुलाने, बच्चों को उनके नाम से बुलाने के कारण, जोर से बोलने की वजह से पता चल जाया करता था कि वे आ रहे हैं। मैं अक्सर व्यग्रता में दूर उनके पास पहुँच जाता था अखबार और अपनी पत्रिकाओं के लालच में पर वे मुझे तंग करते थे, कहकर कि भाग जा, घर पहुँच, वहीं मिलेगा अखबार। मैं ठुनकने लगता तो और चिढ़ाते। मैं घर में उनकी शिकायत करता तो शिकायत को तवज्जो न मिलती। करीम चाचा कई बार अचानक बिन आहट आकर आवाज लगा देते और जो पत्रिका नयी आयी होती उसका नाम लेकर बुलाते। कई बार वे पास बुलाते और न देकर आँगन में अखबार और पत्रिकाएँ उछालकर फेंक देते तब भी मैं उन पर बहुत चिढ़ता। 

जो पत्रिकाएँ बचपन में पढ़ने को मिलतीं उनकी आदत सी बन गयी थी। पढ़ लिए अंक व्यवस्थित जमाकर रखता था। मोहल्ले में किसी को पत्रिका नहीं देता था। पड़ोस में सहाय मौसी मम्मी से अक्कसर कहतीं, सुशीला तुम्हारा लड़का बड़े छोटे जी का है। मैं चम्पक के चीकू, नंदन के तेनालीराम और विशेषकर दो चित्रों में दस गल्तियाँ ढूँढ़ने वाले पन्ने पहले खोलता। मुझे चन्दामामा में बेताल कथाएँ बहुत सिहरा देतीं, हठी विक्रमार्क पेड़ के पास फिर लौट आया, पेड़ से शव को उतार कर कंधे पर लादकर चलने लगा, यहाँ से शुरूआत होती और आखिर में बेताल का प्रश्न जिसका उत्तर यदि विक्रमार्क जानते हुए न देगा तो सिर टुकड़े-टुकड़े हो जायेगा और देगा तो बेताल उड़कर फिर पेड़ पर जा बैठेगा। इसको पढ़ने का रोमांच होता। इसी तरह पराग का भी अपना आकर्षण था। उसमें के पी सक्सेना जी का धारावाहिक खलीफा तरबूजी आज भी याद है, उनकी बेगम, पिंजरे में तोता और रेल की लम्बी यात्रा के किस्से, पढ़ा करते। 

जब लोटपोट पढ़ना शुरू किया तो उसमें चाचा चौधरी, मोटू पतलू खूब सुहाते। मोटू पतलू की कहानी के चित्रमयी पन्नों में उनके साथी घसीटाराम, चेलाराम, डॉक्टर झटका, सिस्टर मधुबाला के कारनामे हँसा-हँसाकर वाकई लोटपोट कर दिया करते। बचपन से बाहर आये तो जैसे इस संसार से भी बाहर आ गये या यों कह लीजिए कि यह संसार भी छूट गया। अब चम्पक, नंदन का रूप ही बदल गया है, चन्दामामा कभी-कभार पत्रिकाओं की दुकान पर दिखायी देता है। लोटपोट दुर्लभ है। पराग तो बन्द ही हो गयी।  आज के बचपन को इन पत्रिकाओं का पता भी न होगा और उनकी जिज्ञासाओं में शामिल भी शायद न होती हो। बचपन भी पढ़ने के धीरज और धैर्य से बाहर हो गया प्रतीत होता है। अब नानियों, दादियों के पास भी शायद कहानियाँ नहीं हैं, माँ के पास तो और भी दुर्लभ। 

पत्रिकाओं का अपना चस्का लेकिन आज भी बरकरार है। दो-तीन दिन में यदि भोपाल में घर से कुछ दूर न्यूमार्केट के गुरु तेग बहादुर कॉम्पलेक्स में वैरायटी बुक हाउस न जाओ तो बड़ी बेचैनी महसूस होती है। अब इण्डिया टुडे, तहलका, अहा जिन्दगी, कथादेश, नया ज्ञानोदय, हंस, समास के अंकों को लेकर जिज्ञासा बनी रहती है। मन के अंक खरीदा करता हूँ। मुझे लगता है कि वाकई महँगाई के इस दौर में अखबार और पत्रिकाएँ आज भी जिस मूल्य पर मिला करते हैं वह बहुत कम है। अपने समय, दृश्य और दुनिया में छोटी मोटी पैठ बनाये रखने के लिए, थोड़ा बहुत जाने रहने के लिए पत्रिकाएँ बड़े काम की हुआ करती हैं। पढ़ना आज के कठिन समय को सहने और समझने की अहम प्रक्रिया है। यह ऐसी पगडण्डी है जो दुर्लभ हो चली है, दुरूह भी। क्षमताभर फिर भी मैं उसमें आवाजाही के जतन कर लिया करता हूँ भले ही पढ़ते-पढ़ते सो जाऊँ।

रविवार, 14 दिसंबर 2014

जिन्दगी के कर्टन रेजर

श्रीराम ताम्रकर का नहीं रहना, बहुत सारी स्मृतियों और बातों के पुनर्स्मरण का सबब बन गया है। वे सिनेमा के थे, उनसे सिनेमा को जानने का सौभाग्य मिला था, सब कुछ सिनेमा की रील की तरह ही चल रहा है। ऐसा लगता है इस हृदयविदारक घटना ने अपने आप एक बड़ा सा कर्टन रेजर तैयार कर दिया है, छोटे-छोटे दृश्य उपजते हैं, प्रसंग सामने फिर से घटित होने लगते हैं, संवाद होने लगता है, कहकहे लगते हैं, बात होने लगती है, अपनापन दिखायी देता है, टेलीफोन सुनायी देने लगता है। 

उनका मोबाइल नम्बर बार-बार देखता हूँ। आँखें भीग जाती हैं। अब वे उधर से दो अक्षरों के हैलो का जरा विस्तीर्ण कर थोड़े ही बोलेंगे, हैल्ल्लो....! भोपाल में स्कूटर की यात्राएँ याद आती हैं, शुरू शुरू की जब बैठते ही कहते थे, पेट्रोल पंप ले चलो, जिद माननी होती थी, इकट्ठा पाँच लीटर भरवा दिया करते थे। जितने दिन भोपाल में रहें, साथ खाना खाया, काम किया। त्रिवेन्द्रम गये, मुम्बई गये, दिल्ली गये, पुणे गये और भी कहाँ कहाँ। 

धरम जी से पहली बार मिले तो साथ मिले। उन्होंने ही धरम जी से कहा था कि आप शोले फिल्म का वो सिक्का जो जिसके दोनो ओर हेड है, तिस पर धरम जी ने खड़े होकर उन्हें गले लगा लिया था, कहते हुए, वाह यार क्या बात कही है। वे नईदुनिया के फिल्म सम्पादक रहे तो उन्होंने लिखने की समझ दी, सिखाया, प्रोत्साहित किया। नाना पाटेकर, सुधांशु मिश्र, हृतिक रोशन, राकेश रोशन आदि के बड़े इण्टरव्यू छापे।

भोपाल में वे जब भी आते थे तो यही लगता था कि पास ही रुकें। हमेशा किसी निमंत्रण पर भी वे आये तो यही चाहा कि ऐसी जगह रुकें जहाँ मैं तत्काल पहुँच सकूँ। वे भोपाल में होते थे तो उनको अकेला बिल्कुल नहीं छोड़ता था। भोपाल में वे हमारे प्राय: सभी आत्मीय मित्रों से जुड़ गये थे। सबके साथ समरस। सिनेमा पर उनका बोलना सम्मोहित करता था हमेशा। निरन्तर बिना किसी दोहराव के तथ्यपरक बातें वे करते थे। कई बार वे फिल्म पत्रकारिता सीख रहे छात्रों को शुरू में ही कह देते थे कि मैं आपके लिए ही बताने वाली बात की पूरी तैयारी से आया हूँ, यदि आप गम्भीर न हुए, आपका मन न लगा तो मेरा आना बेकार, आपका सुनना बेकार, आपकी संस्था का यह सारा का सारा उपक्रम बेकार। इसलिए  पहले बता दीजिए, आपकी रुचि है या नहीं तिस पर सभी छात्र नतमस्तक, सर आप बताइये, हम सुनेंगे, बैठेंगे।

आज सुबह जूनी इन्दौर के मुक्तिधाम में उनकी निष्प्राण देह को देखकर सब्र छूट गया। वही सब कर्टन रेजर की तरह, इस तरह तो उनको कभी नहीं देखा था। वे अपनी आँखें, सिनेमा प्रेम में दान कर गये, उनके जाने के बाद भी उनकी आँखें सिनेमा देखती रहें इसलिए। प्रभु जोशी, सरोज कुमार, राकेश मित्तल, मानसिंह परमार वहाँ पर बोल रहे थे, ताम्रकर जी के बारे में, सच-सच। प्रभु जी ने कहा मेरे अविभावक थे, सरोज जी ने कहा कि श्रेय से दूर रहते थे, बहुत सी बातें। 

अक्सर, इन्दौर में उनसे मिलकर भोपाल रवाना होते हुए उनका एक आदेश सुनता था, भोपाल पहुँचते ही खबर करूँ। अब नहीं कहेगा कोई और खबर भी किसे करूँ......?

देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इन्दौर में बीस वर्षों से निरन्तर फिल्म पत्रकारिता पढ़ाते रहने वाले ताम्रकर जी के नाम पर वहाँ इस विषय की एक पीठ स्थापित कर दी जाये तो शायद किसी तरह की कठिनाई न होगी। परमार जी, मित्तल जी, कुलपति इस अहम काम को सहजतापूर्वक ही कर सकते हैं।

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

हिन्दी में सिनेमा का एनसायक्लोपीडिया


सिनेमा का संसार हिन्द महासागर की तरह है जिसकी अन्तहीनता की सिर्फ कल्पना की जा सकती है। दर्शक को उसका छोर भी बहुत मुश्किल से ढूँढ़े मिलेगा, वह भी अगर उसमें बहुत जतन करने की जिज्ञासा या कौतुहल हो अन्यथा सभी के लिए सिनेमा परदे का मनोरंजन है, चन्द घण्टे बैठकर सपनों की दुनिया की सैर कर आओ, लौटो तो खाली हाथ, कुछ आधे-अधूरे ख्वाबों के संग।

बहरहाल भारत में हिन्दी में एनसायक्लोपीडिया का तैयार होना एक बड़ी घटना है जिसे खासतौर पर ऐसे अवसर पर लोगों के बीच घोषित होना चाहिए जो वास्तव में सिनेमा से गहरे सरोकार रखते हैं। सिने रसिकों के लिए यह अथाह परिश्रम, क्षमताओं और जूझने वाली लगन से भरा काम वरिष्ठ फिल्म आलोचक, सम्पादक, लेखक श्रीराम ताम्रकर ने किया है जो इन्दौर में निवास करते हैं। उनको सिनेमा के संसार का अध्ययन और अनुभव का पाँच दशक से भी अधिक समय का ऐसा तजुर्बा है जिसमें निरन्तर सक्रियता उनका अपने ही से प्रमुख आग्रह रहा है। ऐसे व्यक्तित्व से ही इस तरह के बड़े काम की अपेक्षा की जा सकती है।

हिन्दी सिनेमा: एनसायक्लोपीडिया, श्रीराम ताम्रकर के अनुभवों, पढ़े-लिखे-देखे का जीता-जागता साक्ष्य है। अपने मार्गदर्शन में अनुभवी और दक्ष सम्पादन मण्डल के साथ जिनमें वरिष्ठ पत्रकार विनोद तिवारी, मनमोहन चड्ढा, सुरेश उनियाल, डाॅ. राजीव श्रीवास्तव, गोविन्द आचार्य आदि शामिल थे, यह दुर्लभ काम उन्होंने दो वर्ष के दिन-रात परिश्रम से पूरा किया है। इसमें 1500 प्रविष्टियाँ, 5000 से अधिक सन्दर्भ एवं सूचनाप्रधान प्रामाणिक जानकारी शामिल की गयी है।

इस एनसायक्लोपीडिया में स्टिल कैमरे के 1839 में आविष्कार के साथ ही सिनेमा के जन्म की दिलचस्प दास्तान, ल्यूमिएर ब्रदर्स, सावे दादा, दादा साहब फाल्के, सिनेमा से पहले का सिनेमा और सौ साल की यात्रा पर बहुत ही परिमार्जक ढंग से सावधानी के साथ आलेख, सूचनाएँ और जानकारियाँ संयोजित की गयी हैं। इस एनसायक्लोपीडिया में निर्माण, निर्देशन, अभिनय, कोरियोग्राफी, छायांकन, गीत, संगीतकार, एक्शन, संगीत संयोजन आदि पर बड़े उत्तरदायी ढंग से बात की गयी है। एनसायक्लोपीडिया तैयार करते हुए भारतीय सिनेमा की उन सब श्रेष्ठ और अमर विभूतियों का व्यक्तित्वपरक स्मरण किया गया है जिनकी अहम और आसाधारण भूमिका से ही सिनेमा ने अपने विराटपन को स्थापित किया है। 

इसी एनसायक्लोपीडिया में पहली बार फिल्मों की पारिभाषिक शब्दावली के बारे में समझा और जाना जा सकेगा जैसे क्लोज अप, लांग शाॅट, आॅन स्क्रीन साउण्ड, फ्लैश बैक, मोंताज, मीडियम शाॅट, आॅफ स्क्रीन साउण्ड, मिक्सिंग, डिजाल्व, अन-मेरिड प्रिंट आदि। समग्रता में सिने-व्यक्तित्वों के परिचय एवं योगदान के साथ ही फिल्म संस्थानों के साथ उनकी कार्यप्रणाली, उपयोगिता पर जानकारियाँ इसका हिस्सा हैं। एनसायक्लोपीडिया में सिनेमा से जुड़े सभी प्रमुख पुरस्कारों पर भी विस्तार से जानकारी है।

श्रीराम ताम्रकर इस प्रकल्प के मुख्य रचनात्मक सूत्रधार हैं जो लगभग पिछले दो वर्ष से लक्ष्य लेकर इस काम को पूरा करने में पिछले माह सफल हुए जब सम्पूर्णता में हिन्दी सिनेमा का भारत का यह पहला एनसायक्लोपीडिया उन्होंने पूर्ण किया। इस बीच स्वास्थ्य सम्बन्धी गहन समस्याएँ जिनमें हृदय की शल्य चिकित्सा भी शामिल है, से जूझते-लड़ते, चिकित्सकों द्वारा आराम और विश्राम के अनुशासन को भंग करते हुए उन्होंने इस कार्य को इति तक पहुँचाया। 

श्रीराम ताम्रकर का कहना है कि मेरे लिए यह सपना बहुत बड़ा नहीं था। नईदुनिया अखबार के लिए परदे की परियाँ, सरगम का सफर, नायक-महानायक, दूरदर्शन सिनेमा, फिल्म और फिल्म, विश्व सिनेमा और भारत में सिनेमा जैसे वार्षिक विशेषांकों का सम्पादन करते हुए, भारत के अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों का प्रेक्षक बने रहते हुए और नईदुनिया अखबार के लिए ही प्रतिमाह फिल्म संस्कृति जैसी लोकप्रिय लघु पत्रिका निकालते हुए मेरे लिए अब यही एक काम शेष था कि मैं हिन्दी के पाठकों के लिए उनकी भाषा और सुरुचि में सिनेमा का महाकोष तैयार करूँ। यह काम मेरे चालीस साल के तजुर्बे और सिनेमा माध्यम के प्रति अथाह अनुराग और निष्ठा का सुपरिणाम है। मैं ठहरकर, अपनी रचनात्मक तृप्ति की गहरी साँस लेता हूँ और अपने आपको खुशकिस्मत महसूस करता हूँ कि मायानगरी से बड़ी दूर इन्दौर शहर में रहते हुए मायानगरी के लिए ही यह बड़ा और अहम काम कर सका। 

बुधवार, 3 दिसंबर 2014

भोपाल दो-तीन दिसम्बर उन्नीस सौ चौरासी

बीसवीं सदी की एक बड़ी दुर्घटना जिससे बड़ी मानवीय क्षति हुई, शेष जीवन मानसिक अवसाद, प्रताड़ना, अन्देशों और डर भय से भरे हो गये, उसे आज तीस बरस हो गये हैं पर जी इतना कड़ा नहीं हो पाता कि सब भुलाया जा सके। मन को बहलाने और समझाने के लिए कहा जाता है कि वक्त से बड़ा कोई मरहम नहीं है, सब जख्म धीरे-धीरे भर जाते हैं लेकिन सच्चाई यह है कि जख्मों के धुंधले निशान भी छुओ तो हरे हो जाते हैं। उस समय का स्मरण एक साथ कई बातों का स्मरण कराता है, सहसा उस उम्र का स्मरण हो आता है और तब के मानस का भी।

तब की याद आती है, पढ़ाई-लिखाई मन न लगने के कारण अपनी पूरक चाल से आगे बढ़ रही थी लेकिन लेखन में रुचि हो गयी थी। अखबार श्वेत-श्याम निकला करते थे। उन दिनों रवीन्द्र भवन के खुले मंच पर राष्ट्रीय रामलीला मेला, मध्यप्रदेश आदिवासी लोककला अकादमी ने आयोजित किया था। उस मेले में प्रतिदिन होने वाली रामलीला की समीक्षा बड़े भाई तुल्य अनिल माथुर कर रहे थे जो तब जनसम्पर्क विभाग में अधिकारी थे पर अपनी पूर्ववर्ती संस्था नवभारत समाचार पत्र का युवा जगत पेज देख्‍ाा करते थे। उनको पारिवारिक काम से आगरा जाना हुआ तो मुझे कह गये कि अन्तिम दो दिनों की रामलीला तुम कवर कर के नवभारत को दे आना, तुम्हारे नाम से आयेगी। इस तरह दो दिन 1 और 2 दिसम्बर को रामलीला देखने और लिखने का काम किया था। 2 दिसम्बर को इधर रामलीला देख रहा था, उधर यूनियन कार्बाइड में दुर्घटना हो गयी थी। अगले दिन सुबह के सारे अखबार पहले पेज पर उस बड़ी दुर्घटना का समाचार दे रहे थे।

3 दिसम्बर सुबह से ही खबरें फैल रही थीं। नये भोपाल में किसी को पता न चला कि शहर में बीती रात क्या हो गया है? अगला दिन सच्ची झूठी खबरों का था। घटना इतनी भयानक थी हर बात पर विश्वास करते हुए भोपालवासी भीतर ही भीतर बहुत कमजोर होते जा रहे थे। ऐसा लगता था कि सबका अपना विवेक हार गया है। हर बात पर भरोसा करने को जी चाहता था और हर बात डराने वाली थी। याद है, उम्र तब इक्कीस वर्ष थी, 3 दिसम्बर को साढ़े ग्यारह बजे सुबह अफवाह उड़ी कि यूनियन कार्बाइड से फिर गैस रिस पड़ी है, तब पूरे शहर में बदहवास भगदड़ मच गयी। नये भोपाल के स्थान भी अछूते न रहे। हमारे मोहल्ले के लोग घर से जहाँ रस्ता मिले, भागने लगे, ताला डालने का की होश किसी को न था। एक तरफ मानवीय पहलू यह कि पीड़ितों को सब हर तरह की मदद करने आगे आये वहीं यह भी कि अगले दिन गैस रिसते हुए अपनी जान की परवाह करते भाग रहे लोग पड़ोसी की फिक्र भी नहीं कर रहे थे। एक परिवार तो अपने घर के अति बुजुर्ग की शिथिलता और लाचारी पर भी उनसे झुँझला रहे थे, सब तरह के तजुर्बे।

घण्टे भर बाद यह ऐलान हुआ कि दोबारा गैस नहीं रिसी है, सब घर में रहें, भागें न, कहीं न जायें। लोग बमुश्किल माने पर अगले पन्द्रह दिनों तक हर आदमी रह-रहकर जागता था, कितना सोता था पता नहीं। अगले पन्द्रह दिनों में से ही एक दिन यूनियन कार्बाइड में बचे रसायन से सेविन गोलियों का निर्माण कर रसायन खत्म कर दिया जाना था, वह रसायन जिससे यह भयानक हादसा हुआ। उसके बाद भी बरसों बल्कि कल तक यह खबरें आती रहती हैं कि अभी भी वहाँ जहरीला अपशिष्ट बचा है, पड़ा है, वगैरह वगैरह। सच तो यही था कि दुर्घटना वाली रात जहरीली गैस ने जमकर विनाशलीला की। चपेट में आये बुजुर्ग, बीमार, महिलाएँ, बच्चे, युवा हजारों की संख्या में असमय काल कवलित हो गये। 

हम लोग अपने मुहल्ले से पाँच सात साथी सायकिलों पर हमीदिया अस्पताल जाया करते थे, दूध, डबलरोटी और खाने की दूसरी सामग्रियों के साथ लेकिन वहाँ इस आपदा के शिकार निर्दोषों को भूख की नहीं जीवन और साँसों की जरूरत थी, हम लोग असहाय से उनको तड़पते, विलाप करते, रोते देखते थे और भीतर तक सिहरन तथा दुख से भर जाते थे। हम सबके पास इसकी दवा नहीं थी। हर रोज अस्पताल के दृश्य रुलाया करते थे, हौसले को कमजोर किया करते थे। सालों साल हमने अपनी मानसिकता को कमजोर होते देखा है। मुझे अपनी भी याद है, बहुत डरा करता था। उस समय आकाशवाणी में विनोद तिवारी, गजलकार समाचार पढ़ा करते थे। मैं प्राय: उनके पास बिना जान पहचान के कभी रेडियो स्टेशन तो कभी उनके घर पहुँच जाया करता था, पूछने कि अब तो कुछ नहीं होगा, अब तो कोई खतरा नहीं है। कई बार इस बात पर वे झुँझला जाया करते थे। बाद में एक-दो बार उन्होंने मुझे भगा भी दिया था। कहने का अर्थ यह कि कैसे एक भयावह घटना मनोबल को कमजोर करती है, विश्वास को डिगा देती है, जवाबदारियों के लायक नहीं रहने देती। कैसे हम केवल अपने बारे में सोचने लगते हैं, कैसे मानसिक भरम हर पर डगमगाये रखते हैं। अनुभवों का जखीरा लम्बा है, राजीव गांधी आये थे पीड़ितों को देखने, याद है बहुत कुछ। 

यूनियन कार्बाइड की दुर्घटना का समय देर रात से सतत सुबह तक का है, आगे भी कई दिनों तक जब तक आसमान में गैस मण्डराती रही लेकिन किस तरह इस काल-आक्रमण से सर्वथा बेखबर लोग इस दुनिया से चले गये। भोपाल इस घटना के बाद अनेक वर्षों तक अनेक मुश्किलों से जूझता रहा है। घटना हो जाने के बाद घातक रसायन के उन लोगों और पीढ़ियों में प्रभाव बने हुए हैं जिनके प्राण किसी तरह बच गये। सोच कर मन काँप उठता है कि हम कारखाने से पन्द्रह किलोमीटर दूर होकर महीनों-सालों भयमुक्त नहीं हो पाये, उनका क्या होता रहा होगा, जो जद और हद में रहे होंगे!!

गुरुवार, 27 नवंबर 2014

माँ निगरानी में खाना खिलाती है

मम्मी के साथ खाना खाने की बात तय कर आओ तो वे व्यग्रता से प्रतीक्षा करती हैं। उन्होंने साफ-साफ कह दिया है कि समय पर आ जाया करो, देर होगी तो फिर हम सो जायेंगे। अपनी मसरूफियत उनका समय न बिगाड़े इसकी फिक्र रहती है। दस-पन्द्रह दिनों में जब कभी उनके साथ खाने का वक्त आता है तो लगता है बरसों की भूख से अब निजात मिल रही है। 

मम्मी हमेशा की तरह बहन-बेटी से थाली परोसे जाने के पहले मेरे लिए सलाद काट देने की याद दिलाना नहीं भूलतीं। मुझे बचपन से ही प्याज, टमाटर, हरी धनिया, हरी मिर्च और उस पर नमक डालकर खूब मिलाकर बनने वाला सलाद बहुत पसन्द है। वह फैंसी, आकल्पन वाला, सजा-सजाया सलाद मुझे कभी स्वादिष्ट नहीं लगा। जब तक अपनी मरजी का काटकर अच्छे से मिलाया नहीं तब तक नमक टमाटर-प्याज में नहीं मिला और उसने रस नहीं छोड़ा, वैसा।

मैं मम्मी को देखकर मुस्कुरा उठता हूँ। कहता हूँ कि मम्मी सबको पता है कि यह मेरी पसन्द है, आप भी आदेशित करेंगी ही फिर तो मिलेगा ही पर मम्मी का काम ध्यान दिलाना है, बिटिया, भैया के लिए सलाद जरूर काट देना।

इस तरह का सलाद बचपन की पसन्द है। पाँच-सात साल की उम्र में ही एक बार शायद शाम चार बजे स्कूल से आकर खाने की जिद करने लगा। घर में रोटी रखी थी, सब्जी और दाल सुबह खत्म हो गयी थी। मम्मी कहने लगीं, जरा रुक जाओ, अभी सब्जी बनाये देते हैं पर उस समय ठुनकने लगा, अभी खाना चाहिए। तब मम्मी ने प्याज, टमाटर, धनिया, मिर्च का यह सलाद काटकर बनाया और दो रोटी के साथ खाने को दिया। सच कहूँ खुशी-खुशी खा गया। मजेदार लगा। फिर हर दो-चार दिन में अपनी यही फरमाइश, सलाद बना दो।

तभी से यह सलाद जुबाँ पर चढ़ गया। आज तक जब कभी घर की मेहरबानी से थाली में मिल जाये तो मन मजे का हो जाता है लेकिन मम्मी-पापा के घर में खाना खाया तो सलाद खाने के साथ पक्का ही समझो। यह सलाद आज भी अपने हाथ से बनाकर बड़ा मजा आता है। आखिर में जब दाल-चावल-सब्जी में इसका टमाटर और नमक छूटा रस मिला लो तो स्वाद और भी बढ़ जाता है। इधर मम्मी हमेशा की तरह सरदी में कुछ ताजे टेम्परेरी अचार भी डलवाती हैं बहनों से गाजर का, नींबू का, आँवले का, सेम-मटर का, मूली का और सबका मिलाजुला भी। इसके साथ ज्वार, बाजरे और मक्का तथा बिर्रा (गेहूँ, जौ, चना) की रोटी का बड़ा मजा है। इसके साथ आखिर में एक टुकड़ा गुड़ भी।

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

॥ स्वीटी के बच्चे ॥


उसका नाम स्वीटी था नहीं लेकिन उसके नियमित आते रहने से किसी न किसी नाम से पुकारना ही था सो सब यह कहने लगे। दरअसल किसी तीसरे मुहल्ले की वह पालतू है पर जाने वो अपना घर खाली करते समय उसे नहीं ले गये या कुछ और वह एक दिन घर आ गयी। उसे कुछ खाने को दिया जिससे यह हुआ कि प्राय: आने लगी लेकिन सफेद रंग की यह साफ सुथरी स्वीटी देखते हुए इतना आल्हाद व्यक्त करती थी कि मन खुश हो जाता था। मेरे पास का वह सब खा लिया करती थी, बिस्कुट, मूँगफली, चने कुछ भी।

कुछ दिन में उसकी आदत ऐसी बन गयी कि वो घर में ज्यादातर समय बैठी रहती, आँगन में। आते-जाते सब पर मुफ्त का रुआब, भौंकने पर सब डरते, अन्दर आने से। घर से बाहर जाओ तो वह ऐसे देखती है जैसे उसकी जवाबदारी है सब। लौट कर आने तक आँगन में ही रहती। जब आओ तो मुँह ऊपर करके एक लम्बा सुर भी निकालती, जैसे वेलकम कर रही हो।बहरहाल इसी स्वीटी ने कुछ समय पहले तीन सन्तानों को हमारे ही आँगन के एक कोने में जन्म दिया। तीनो ही जेण्ट्स। अच्छे अच्छे रंगों वाले, सफेद में कुछ खाकी चित्ते-चकत्ते के साथ। इस समय पन्द्रह-बीस दिन के हो गये हैं, पहले पाँच सात दिन पड़े रहे, आँखें नहीं खुली थीं, जब आँखें खुल गयीं तब से सयाने हो गये हैं, अपनी उम्र के मुताबिक।

इन दिनों खूब कूदते-फाँदते और मस्ताते हैं, छोटा मुँह बड़ी बात टाइप पुक-पुक करके भूँकते भी हैं आपस में कुश्ती लड़ते हुए। इनमें सबसे छोटा गब्दू टाइप है और शेष दो जरा स्मार्ट फिटनेस का ख्याल रखने वाले। सुबह और शाम, कई बार रात में भी इनकी मस्तियाँ देखने को मिलती हैं। कई बार लिखते-पढ़ते पैरों के पास आ जाते हैं और जीभ से उंगलियाँ-छुँगलिया चाटने लगते हैं, ओह याद करके गुदगुदी महसूस होती है। मैं उन्हें ज्यादा लड़ियाता नहीं पर वे उसके लिए निमंत्रण की परवाह भी नहीं करते।

जीवन की आपाधापी में कई बार आपको अनुभूत करने वाली खुशी और सुख किस तरह मिलता है, इस पर मैं सोचने लगता हूँ। अनेक जगहों से खिजे-पिटे और बुझे लौटकर आने के बाद ये प्राणी, निश्छल और आत्मीय कैसे आपको एक अलग ही संसार में ले जाने आ जाते हैं। ये अबोले केवल प्रेम की भाषा जानते हैं, जो बोलते हैं वो कई भाषाओं के धनी होते हैं, उस दुनिया से इस दुनिया में कितना अन्तर है, थोड़ी देर इस दुनिया में रहकर लगता है बहुत सारी तकलीफें कम हुई हैं............................

गुरुवार, 6 नवंबर 2014

केतन मेहता और रंगरसिया


कला और मनोरंजन का संसार अनूठा है। इस संसार में उत्कृष्टता और श्रेष्ठता की चुनौतियाँ सर्जक और सृजन दोनों ही स्तरों पर निरन्तर बनी रहती हैं। किसी समय यह मापदण्ड दोनों ही स्तरों पर लीक से अलग हटकर और आकृष्ट किए जाने की स्थिति तक प्रायः उदाहरण बना करता था। एक लम्बा समय लगा इस यथार्थ को स्थापित हुए और एक चरम या शीर्ष पर पहुँचकर वैकल्पिक धरातलों पर या सरलतम सृजनमार्ग पर फिर एक लोकप्रिय जगत को सिरजना उस मूल भाव के विपरीत व्यापक हुआ जिसकी साधना या सरोकार अक्षुण्ण रहे थे। हमारे सामने दूसरी परम्परा का आना और उसमें एक बड़े जिज्ञासु समाज का समरस होना एक दूसरी घटना थी जिसने अच्छे मिथकों को भी चुनौतियाँ दीं। सर्जना के मूलभूत तत्व ही दूसरी परम्परा का माध्यम बने, वे औजार जिन्हें मनुष्यता ने खुद गढ़ा था, आगे चलकर मनुष्य के ही गढ़े दूसरे औजारों से पिछड़ गये। सर्जना श्रेष्ठता के अपने मानक धरातल पर ही विभाजित होने लगी। देखते ही देखते एक समानान्तर स्थान विकसित हो गया, प्रतिष्ठापनाएँ यहाँ की ज्यादा चकाचैंधभरी नजर आने लगीं। हमारे सामने श्रेष्ठजनों को आदरणीयों का स्थान प्राप्त हो गया और उनका चरण स्पर्श भर करके हमने उनको उतने ही तक सीमित कर दिया।

यह एक लम्बी बहस का विषय हो सकता है कि जो ऊष्मा समूचे परिवेश को ताम्बई आभा दिया करती थी, जो ताप हमने बड़ी दूर रहकर भी अपने व्यक्तित्व में अनुभूत किया उसी के बरक्स हमने आधुनिक धारा का एक और दौर अस्तित्व में आते देखा जिसकी सीमाओं ने यद्यपि स्वर्णिम दौर को स्वर्णिम बने रहने दिया लेकिन उसको सीमित भी कर दिया। 

केतन मेहता की रंगरसिया प्रदर्शन के परिणाम तक पहुँच सकती थी इसका अनुमान नहीं रह गया था क्योंकि वे इसे पाँच साल से बनाये बैठे थे। केतन मेहता पिछली सदी में आठवें दशक के एक महत्वपूर्ण फिल्मकार हैं जिनकी दृष्टि पर भरोसा किया ही जा सकता है क्योंकि बाद के भटकाव को छोड़कर प्रारम्भ में उनके सभी काम अच्छे थे, अच्छे थे अर्थात स्पर्धी दौर में श्याम बेनेगल, गोविन्द निहलानी, सईद मिर्जा, प्रकाश झा और सुधीर मिश्रा के कामों के बीच चर्चा में आते थे। पहले पैराग्राफ में जो बात आयी, केतन मेहता उसी तरह के समय के मारे कहे जायेंगे। जी चैनल पर उनका एक धारावाहिक प्रधानमंत्री ध्यान में आता है जो शायद चाचा चौधरी धारावाहिक के बाद उनका आखिरी अच्छा प्रयोग था। मंगल पाण्डे को लेकर कुछ ठीक से कहते नहीं बन रहा है लेकिन जब राजा रवि वर्मा जैसे व्यक्तित्व के साथ उन्होंने अपनी नयी फिल्म की कल्पना प्रस्तुत की तब लगा कि वे हताशा के बड़े समय में भी अपनी रचनाधर्मिता में थोड़ा ताप बचाये हुए हैं।

रंगरसिया को बना चुकने के बाद केतन को इतने बड़े समय में कई बार यह लगा होगा कि शायद इसका प्रदर्शन न हो पाये। बहरहाल उस निर्माण संस्था को जरूर धन्यवाद देना चाहिए जिसकी वजह से यह फिल्म सिनेमाघरों तक आ रही है। सैकड़ों करोड़ों के क्लब में दौड़-फांदकर जा पहुँचने के इस अजीबो गरीब समय में रंगरसिया को कुछ हजार संजीदा दर्शक देखते हैं तो यह बड़ी बात होगी। भारतीय कला परम्परा में राजा रवि वर्मा का व्यक्तित्व और कृतित्व अपनी जगह महान हैं। महान व्यक्तियों पर अथवा उनसे जुड़ी प्रतिभासम्पन्नता पर काम करना उत्साह और चुनौती के साथ संवेदनशील भी होता है। 

यह जरूर अचरज से भरा है कि इस फिल्म का प्रचार-प्रसार जन-आकर्षण की दूसरी जिज्ञासाओं के साथ हो रहा है। रचनात्मक रूप से एक बड़े कलाकार पर फिल्म बनाते हुए पूरे विषय को किस तरह बरता गया है, कैसे राजा रवि वर्मा के सृजनात्मक जीवन और जगत में सजगता और दक्षता के साथ प्रवेश किया गया है, यह केतन मेहता की ओर से इस बीच प्रदर्शन के इन पाँच-सात दिनों में सामने आना था। बहरहाल शुक्रवार को फिल्म प्रदर्शित हो रही है, देखना महत्वपूर्ण होगा कि भवनी भवई और मिर्च मसाला वाले केतन मेहता सिने-सर्जक के मूलभूत कलाकौशल पर अभी भी कितना स्थिर हैं, कितना डिग चले हैं..........?

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