शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

मेरा स्कूल, मेरे गुरु



मैं सम्राट अशोक माध्यमिक शाला भवन के सामने जाकर खड़ा होता हूँ। अन्दर कुछ हलचल हो रही है। सभी कक्षाएँ लगी होंगी। विद्यार्थी आये होंगे, शिक्षक पढ़ा रहे होंगे। आज स्कूल की छुट्टी नहीं है। बाहर से दोनों ओर देखता हूँ एक तरफ शीशम का पेड़ लगा है बड़ा सा जिस पर हम मित्र अक्सर चढ़ जाया करते थे और ऊपर से कूदने का खेल किया करते थे। वहीं एक बार फिसलकर नीचे आते हुए तने पर लगे काँटेदार तार से पेट लम्बा खरुँच गया था, खून भी निकला था, कई दिन चोट-दर्द बनी रही। अगले दिन नहलाने के लिए मम्मी ने बनियान उतारी तो उस बदमाशी के एवज में चार थप्पड़ भी लगाये थे। उसी पेड़ ने नीचे एक बूढ़ी अम्माँ बैठा करती थी जो हरी इमली, गुड़ की गजक, बेर और बेर का चूरन, चने और मूँगफली बेचा करती थी। वहीं से थोड़ा नीचे मदन का ठेला लगता था, वह खीरे-ककडि़याँ पानी में भिगोकर बीच से दो काटकर उनमें नमक-लाल मिर्च लगाकर बेचता था। 

पेड़ के नीचे अब दूसरे बिचवैया बैठते हैं। बूढ़ी अम्माँ के तो कई जनम हो गये होंगे, मदन का भी क्या पता कहाँ होगा? बाहर थोड़ी देर खड़े रहकर जैसे मैं अपने आपको ही भीतर भेजता हूँ खुद अपने को पाँचवीं कक्षा में बैठा देखने के लिए। टाटपट्टी पर अल्यूमीनियम का बक्सानुमा, पेटी कहा करते थे, वही लेकर जाया करता था। उसे खरीदवाने के लिए नाक में दम कर दिया था, मम्मी-पापा की। वे कहते भी थे कि ये बड़ी क्लास के बच्चों के लिए है पर अपने को चाहिए थी बस। पढ़ाई-लिखाई में जितना लद्धड़, बाकी नौटंकी में उतना ही आगे। समय पर सब चाहिए बस्ता, पेन-पेंसिल, कम्पाॅस, फुटा, कटर, रबर सब। 

हसन सर को यहीं पर जाना। नये आये थे, जैन सर कक्षा में उनको लेकर आये थे, कहते हुए कि ये हसन खान सर हैं, नये आये हैं। अब ये आपको गणित पढ़ायेंगे। जैन सर स्वयं हिन्दी और विज्ञान पढ़ाते थे। जैन सर और हसन सर दोनों के पास सायकिलें थीं। जैन सर पास में रहते थे और हसन सर दूर पुराने शहर में। हसन सर को पढ़ाने मेें बहुत रुचि थी। वे बड़े समदर्शी थे। सभी विद्यार्थियों पर बराबर निगाह रखते। प्रतिभाशालियों को प्रोत्साहित करते और हम जैसे गँवारों को ठोंक-बजाकर अपने हिसाब का बना लिया करते। उनका अजीब काम था, नहीं आये छात्रों को घर से बुलवा लिया करते, दूसरे छात्रों को भेजकर और डाँट-फटकार कर कक्षा में बैठा लिया करते। मारते तो थे खैर लेकिन उस मार में कोई दुर्भावना नहीं केवल एक ही भावना बच्चा पढ़ने में मन लगाये। उनका पढ़ाना घण्टे के हिसाब से नहीं बल्कि समझायी जाने वाली बात पूरी हो जाने तक रहता, भले ही वे जैन सर के पीरियड भी इसमें शामिल कर लिया करते।

हमारे कुछ दोस्त, मैं भी प्रायः उनसे मार खाया ही करते। मैं कुछ अधिक इसलिए क्योंकि हमारी माँ भी उसी स्कूल में पढ़ाती थीं। कई बार उन्होंने माँ के सामने भी तमाचे लगाकर अपना प्रभाव दिखाया। हाँ, तो हमारे कुछ दोस्त बाद में इसका बदला भी लिया करते। कई बार यह हुआ कि हसन सर और जैन सर की सायकिलों की हवा निकाल दिया करते। फिर दूर कहीं से उनको पैदल सायकिल घसीटकर जाते देख मजा लेते। एक दोस्त जो अभी साथ नौकरी पर भी है, याद करके हँसता है कि उसने न केवल हसन सर की सायकिल की हवा निकाली बल्कि उसका वालट्यूब, ढिबरी कहीं दूर फेंक दी। उस दिन सर समझ गये थे कि लड़के ये भी करने लगे हैं पर उनकी शिक्षा जिसमें निष्ठा प्रबल थी, उसमें कमी नहीं आयी।

याद आता है, हसन सर की पढ़ाई का ही कमाल था कि उस साल हमारी पाँचवीं क्लास में तीन छात्र प्रावीण्य सूची में आये थे और कक्षा के शत-प्रतिशत छात्र प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए थे। सम्राट अशोक माध्यमिक शाला के इतिहास में ऐसा परिणाम न पहले आया था और न ही अब तक आया होगा। याद है दृश्य जब परीक्षा परिणाम कार्ड बाँटते हुए हसन सर खूब खुश थे और नाम बुला-बुलाकर, कुछ छात्रों को जिनको वे बोझा ढोने वाले प्राणियों के नाम से सम्बोधित करते थे, प्यार से घूँसा और धौल जमाकर कार्ड पकड़ा रहे थे।

मैं हसन खान सर को हमेशा याद रखता हूँ क्याेंकि उस निष्ठा का मुझे कभी पर्याय नजर नहीं आया अपनी आगे की पढ़ाई पढ़ते हुए भी। मैं अक्सर सोचता था कि हसन सर को इतने सालों में कभी भी शिक्षक दिवस के दिन श्रेष्ठ शिक्षक का पुरस्कार क्यों नहीं मिला? हसन सर कभी इसके लिए लालायित नहीं रहते थे, वे अपना कर्म निष्काम और निस्वार्थ भाव से ही करते थे। हसन सर बाद में भी मिला करते थे, हम सब बड़े हो गये थे, किसी न किसी काम से जुड़ गये थे, सर कहा करते थे, तुमने हमारी बड़ी नाक कटायी। हमारे पढ़ाये बच्चे बड़ी-बड़ी जगहों पर हैं कोई डाॅक्टर है, कोई इंजीनियर है, कोई प्रोफेसर है, कोई पुलिस अधिकारी है। एक तुम हो जो फिसड्डी ही रहे। सर की बात सुनकर हँसी ही आ जाती रही लेकिन कभी ऐसा नहीं लगा कि उनमें कोई पक्षपात की भावना है। हसन सर के बारे में सुना है कि वे सेवानिवृत्त होने के बाद शायद अपने बेटों के पास मुम्बई में रहने लगे हैं। मैं अपने जहन में लेकिन उनको अपने बड़े पास ही मानता हूँ। जब कभी तन्हा होता हूँ, उस उम्र में जाता हूँ, सम्राट अशोक स्कूल दिखायी देता है तो हसन सर याद आते हैं, वाकई हमारे हीरो।

बुधवार, 20 अगस्त 2014

गोविन्द निर्मलकर : छत्तीसगढ़ी नाचा के शीर्ष स्तम्भ का अवसान


कुछ समय पहले जब गोविन्द निर्मलकर के देहान्त की खबर मिली तो मन में यही आया कि छत्तीसगढ़ी नाचा के शीर्ष कलाकारों की श्रेणी के ये लगभग आखिरी प्रतिनिधि भी चले गये। मदनलाल, भुलवाराम यादव, रामचरण निर्मलकर, माला बाई, फिदा बाई, देवीलाल नाग सभी एक-एक करके। 

हबीब तनवीर के रंगकर्म का ये सब कलाकार अनिवार्य, अपरिहार्य सा हिस्सा थे, मैं उनके सारे ही प्रमुख नाटक और उनमें से कई एकाधिक बार देखे थे। आकर्षण कुछ ऐसा था कि मैं इन सारे ही कलाकारों की चमत्कारिक अभिव्यक्ति क्षमता से चकित हो जाया करता था, लिहाजा प्रतीक्षा रहती कि भोपाल फिर कब इनके नाटक का आना हो और मैं देखूँ। इसका आकर्षण सूत्र दरअसल श्याम बाबू की फिल्म चरणदास चोर रही जो बीसियों बार देखी और अब भी देखा करता हूँ। वह इन कलाकारों को लेकर ही बनी थी। एक बार आप अपने आपको इस फिल्म के हवाले कर दो देखते हुए तो फिर लगता है, दो घण्टे जमकर जीने का मजा आया, खैर।

चरणदास चोर, कामदेव का अपना वसन्त ऋतु का सपना, लाला शोहरत राय, आगरा बाजार, देख रहे हैं नैन, मिट्टी की गाड़ी आदि नाटकों की बड़ी पक्की स्मृतियाँ दिमाग में हैं। अपने आपसे जिद विफल होती है, काश उतना पीछे जाया जा सकता, इन सब प्रस्तुतियों के संसार में, जो अब सम्भव नहीं है। हाँ, गोविन्द निर्मलकर बाद में चरणदास चोर नाटक में चोर का किरदार करने लगे थे जो लम्बे समय तक करते रहे। छूटा तब जब उनको लकवा हो गया। चरणदास चोर नाटक का एक दृश्य है जिसमें चरणदास चोर पुलिस को चकमा देने के लिए लकवाग्रस्त होने का स्वांग करता है, पुलिस के सामने से निकल जाता है और सिपाही जान नहीं पाते। अजीब बात कही जा सकती है कि इस भूमिका को करने वाले दीपक तिवारी को भी यही बीमारी हुई और गोविन्द बाबा को भी।

छत्तीसगढ़ में उनको मिले सम्मान और बाद में भारत सरकार से पद्मश्री ने उम्र के संध्याकाल में रुग्णता के बावजूद थोड़ा खुशी देने वाली हल्की सी स्फूर्ति उनको दी थी। जब वे नईदिल्ली इस सम्मान को ग्रहण करने गये तो मित्र बालेन्द्र और उनके साथ अनूप रंजन पाण्डे के समन्वय से हमने यह योजना बनायी कि वापसी में गोविन्‍द बाबा को भोपाल उतार लें और यहाँ उनके साथ छोटा सा अनौपचारिक कार्यक्रम करके उनका सम्मान करें। हमारे औघड़ दोस्त प्रेम गुप्ता इसके लिए तत्काल न केवल तैयार हुए बल्कि अपनी संस्था में इस कार्यक्रम को बहुत अच्छे से संजोया। यह एक भावनात्मक तथा अविस्मरणीय उपक्रम था जिसमें गोविन्द बाबा अपनी धर्मपत्नी के साथ मंच पर बैठे, अपने अनुभव साझा किए, वे रोये, विनोद किया, अपने नाटकों और किरदारों के बारे में बताया। वह याद आज भी ताजा है। बीच-बीच में उनकी बीमारी की सूचनाएँ मिला करती थीं, शायद अस्सी पार उनका निधन हुआ।

मुझे याद आता है, एक बार हबीब साहब ने अपने सभी कलाकारों को भोपाल बुलाकर कुछ नाटक पुनर्संयोजित किए थे, पृथ्वी थिएटर, मुम्बई के उत्सव के लिए। तब मैं इन कलाकारों के ठहरने के ठिकाने पर भुलवाराम यादव से एक लम्बी बातचीत के इरादे से टेप लेकर गया था, दोपहर का वक्त था। भुलवा दादा दोपहर का खाना खाकर और देसी रसरंजन करके आराम कर रहे थे। उस वक्त गोविन्द बाबा, यद्यपि रसरंजन किए थे मगर विकल्प में बातचीत करने को सहर्ष तैयार हो गये थे, तब उनसे लम्बी बातचीत की थी जो चौमासा पत्रिका में शायद दस-बारह पेज में प्रकाशित हुई थी। भुलवाराम जी से बातचीत फिर अगले दिन हुई और कई दिन कई-कई बार हुई।

गोविन्द निर्मलकर से वह साक्षात्कार और भोपाल सम्मान का कार्यक्रम रह-रहकर याद आता है। वास्तव में उन जैसे, ग्रामीण किसान मजदूर और सारी जिन्दगी असाधारण योग करते हुए भी बस दो रोटी भर के रह जाने वाले कलाकारों के बारे में जितना समृद्ध देखा है, अपना हर कहा उस वजन का नहीं लगेगा, ये लोग सचमुच अपनी देह में जाने कौन सा विलक्षण जादू लेकर आये थे कि मंच पर किरदार को ऐसे जिन्दा करते थे बात ही क्या थी.......

शनिवार, 16 अगस्त 2014

जीभ लुपुर-लुपुर होना

शंकरदत्त मामा की स्मृतियाँ लगभग तीस साल पुरानी हैं। बड़ी दूर रेल्वे स्टेशन के समीप उनका घर था, एक बार उनकाे लेकर मित्रों के बीच कुछ यादें साझा की हैं। हफ्ते दस दिन में वे कभी अपनी साइकिल से घर आया करते थे। फिर शाम रात तक खाना खाकर ही मम्मी उन्हें जाने देतीं। वे पूछ लेती थीं, कि भैया क्या खाओगे, सब्जी कौन सी आदि। मामा बता दिया करते। पूड़ियाँ पसन्द करते थे फिर सब्जी भी बताते, बैंगन, भिण्डी भरवाँ या मसाले का कटहल या गोभी-आलू या परवल-आलू उन्हें सुहाते थे। मम्मी का बनाया उनको पसन्द भी बहुत आता था।

मामा चूँकि दोपहर या दोपहर बाद आ जाते थे तो टाइम पास करने के लिए मुझे और मुझसे छोटी को पढ़ाया करते थे। पढ़ाना यानी मुसीबत। वे हमारे पाठ या पाठ्यक्रम से अलग संसार का पढ़ाते थे लेकिन हमारी ही किताबें सामने रखकर जिनसे हमारा कोई साबका नहीं। हमारे पास उत्तर नहीं होता था तो मम्मी से शिकायत करते थे। उनमें पर्याप्त मसखरी के तत्व भी मौजूद होते थे। कहते थे, अब तुम्हारी मम्मी को बताता हूँ कि तुम लोगों को कुछ नहीं आता, सप्लीमेंट्री भी नहीं आयेगी, अभी पुजवाता (पिटवाता) हूँ। लेकिन मम्मी जानती थीं कि भैया ये शैली है, मामा कहते भी थे, मैं इनकी जड़ें मजबूत कर रहा हूँ।

बैठक में मम्मी, पापा, मामा और हम सब बैठा करते थे तो मामा सबकी नजर बचाकर हम लोगों को जीभ चिढ़ाया करते थे, हम इस बात से चिढ़ते थे, चिल्लाने पर उल्टे हमें ही डाँट खानी पड़ती क्योंकि मम्मी पापा कौन मानेंगे कि मामा जीभ चिढ़ा रहे हैं।

कई बार मामा आने के बाद हलवा बनाने की फरमाइश करते, मम्मी बनाती जब तो जरा देर में खुश्बू आने लगती। हम भाई बहन खुश होते कि हमको भी मिलेगा तो मामा कहते धीमे से, क्यों बड़ी जीभ लुपुर-लुपुर कर रही है......! हम उस बात पर फिर चिढ़ते तो मामा तुरन्त ऐसे संयत होकर बैठ जाते जैसे उन्होंने कुछ किया ही न हो। उनकी इस मजे लेने की आदत में हमें और बहन को अक्सर मुँह की खानी पड़ती।

हाँ, हमारे छोटे भाई को जो उनके हाथ नहीं आता था, उसको वो पास बैठाना चाहते, बात करना चाहते पर वो उनको लकड़ी-फुटा वगैरह मारकर भाग जाया करता था, उसको वे, बेताज बादशाह कहा करते थे। कल से मामा के कुछ ऐसे ही बोल याद आ रहे हैं, जीभ लुपुर-लुपर होना जबकि उस समय पापा, मामा के लिए कहते थे कि भैया बड़े स्वादिल हैं, उनकी जीभ लुपुर-लुपर किया करती है। बताइये मामा खुद जैसे, वैसा हमें कहते थे जबकि उनकी खातिर में एक छोटी सी कटोरी चम्मच के साथ हमारा भी भला हो जाया करता था।

मामा ऐसे छुट्टी के दिनों में दिन भर आकर रहा करते थे। शाम तक हम लोगों की खैर नहीं होती थी, रात जब जाते थे तब हम लोग याने भाई-बहन चैन की साँस लेते थे..........................

मंगलवार, 5 अगस्त 2014

हिफाजत


दोपहर तेज बारिश में एक स्कूल की सड़क से गुजरना हुआ। शायद 1:30 का समय रहा होगा। बच्चों का एक स्कूल दिखायी दिया, जिसमें कुछ ही मिनट पहले ही छुट्टी हुई थी। सभी बच्चे अपने घर को जा रहे थे। कुछ जरा बड़े से बच्चे होंगे आठ-दस का समूह जो न छाता लिए था और न बरसाती, पीछे बैग टाँगे इत्मीनान से जा रहे थे। वे जल्दी में भी न दीखे। अपना समय याद आ गया, ऐसे भीगना आनंद की बात होती थी। कपड़े धोना-सुखाना तो माँ का काम होता था, अगले दिन सूखे कपड़े पहनाना उनकी जवाबदारी। 

कुछ बहुत छोटे बच्चे बरसातियाँ पहने, अन्दर ही पीठ पर अपना बैग लटकाये घर लौट रहे थे, दो-दो, तीन-तीन के समूह में। कुछ को लिवाने उनकी मम्मियाँ आयीं हुई थीं, वे ही साथ लिए आ रही थीं। वैसे एक बच्चे की मम्मी के साथ पास-पड़ोस के बच्चे भी सहजता से आ-जा लेते हैं। बच्चों की माँए परस्पर सखियाँ-सहेलियाँ होती हैं, आपस में बच्चों को लाते-ले जाते समय पूछ-बता लिया जाता है।

थोड़ा आगे चला तो सड़क जरा सी खाली हुई। बढ़ते हुए एक पिता को सायकिल के पीछे अपने बेटे को बैठाकर पैदल ही सायकिल ले जाते देखा। छोटा सा बच्चा था, सायकिल के कैरियर पर बैठा था जो सीट के पीछे होता है। वह बच्चा प्लास्टिक की बरसाती से पूरा ढँका हुआ, सीट को दोनों से हाथों से पकड़े झुका सा बैठा हुआ था और उसके पिता सिर से पाँव तक तर पानी में भीगते हुए पैदल सायकिल लिए चले जा रहे थे। स्वाभाविक है, घर पास ही होगा, जरा देर में पहुँच भी गये होंगे। 

मुझे उस संरक्षित बच्चे की पूरी चेष्टा और एक तरह का अभय प्रभावित कर गया। पीछे से आते हुए मैंने हॉर्न इसी इरादे से बजाया कि बच्चे का चेहरा देखूँ, वाकई बच्चा उस आवाज से पीछे घूमा, निगाह मिली तो मैं सुख से मुस्कुराये बगैर न रह सका। बच्चे और उसके पिता को थोड़ी देर देखते हुए यह जरूर सोचने लगा कि पिता किस तरह अपने बच्चे की अपनी ही सीमाओं और क्षमताओं में फिक्र के साथ हिफाजत करते हुए घर ले जा रहा है। 

बच्चों के साथ भीगने का डर हमेशा माता-पिता को सताता है क्योंकि उससे बच्चे जल्दी बीमार हो जाते हैं। यह चिन्ता मुझे सामने दिखायी दे रही थी। मैं सोच रहा था कि यह बच्चा अभी मासूम है, अपने पापा की सरपरस्ती में आनंद की सवारी कर रहा है। बड़ा होकर यही बच्चा अपने पिता का भी इसी तरह ख्याल रखेगा तो पिता का सारा संघर्ष सार्थक हो जायेगा, यह पूरा का पूरा समय निरर्थक न होगा जो वह बेटे की फिक्र के साथ व्यतीत कर रहा है........... 

रविवार, 3 अगस्त 2014

वो सितारों का पता रखते थे

राजेन्द्र ओझा को यूँ शायद सब लोग नहीं जानते होंगे लेकिन उनका सबसे बड़ा काम था मुम्बई में सितारों का पता बताने वाली डायरेक्ट्री का प्रकाशन करना। स्क्रीन वल्र्ड इस डायरेक्ट्री का नाम था जिसका प्रकाशन वे पिछले 33वर्षों से कर रहे थे। इस बात की कल्पना की जा सकती है कि मध्यप्रदेश के मन्दसौर से एक युवा चालीस साल पहले मुम्बई जाता है, फिल्मी दुनिया उसको आकृष्ट करती है, पत्रकारिता और लेखन करते हुए अपना कैरियर वो उसमें बनाना चाहता है। कुछ ही दिनों में उसे एक अलग ढंग का काम सूझता है, वह एक प्रकाशन करने के बारे में सोचता है जिसमें उसका उद्देश्य होता है फिल्म जगत के लोगों के पते और फोन नम्बरों की जानकारी देना। 

राजेन्द्र ओझा, मध्यप्रदेश से ही मुम्बई गये एक वरिष्ठ फिल्म पत्रकार बद्रीप्रसाद जोशी के साथ मिलकर फिल्म से जुड़े प्रकाशनों और रिपोर्टिंग के कामों से जुड़ गये थे। कुछ समय बाद जब फिल्म डायरेक्ट्री के प्रकाशन का विचार आया तब यह काम उन्होंने स्वतंत्र रूप से किया। कुछ समय वे राजश्री प्रोडक्शन्स से भी जुड़े रहे जब इस निर्माण संस्था के नियंता ताराचन्द बड़जात्या थे और उस दौर में निरन्तर साफ-सुथरी, मनोरंजक और सभ्य किस्म की फिल्मों का निर्माण यह बैनर कर रहा था। यह बात जरूर है कि शुरू में राजेन्द्र ओझा को स्क्रीन वल्र्ड का प्रकाशन करना बहुत कठिन रहा लेकिन उन्होंने उस दौर में भी जब मोबाइल या सूचना संचार के आधुनिक साधन नहीं थे, सभी से सम्पर्क स्थापित कर अपने इस काम को आगे बढ़ाया। कहा जाता है कि इसका जब पहला प्रकाशन हुआ था तब शायद इसका मूल्य दो सौ पचास रुपए था और आज यही डायरेक्ट्री तमाम आधुनिक सूचनाओं से लैस लगभग दो हजार रुपए मूल्य की हो गयी है।

स्क्रीन वल्र्ड को राजेन्द्र ओझा ने बहुत विस्तार दिया। हिन्दी, मुम्बइया सिनेमा से आगे वे गुजराती सिनेमा, मराठी सिनेमा, चेन्नई फिल्म इण्डस्ट्री, बंगला फिल्मोद्योग के साथ-साथ साल भर आने वाले सितारों के जन्मदिन महीनेवार प्रस्तुत करने का काम इस डायरेक्ट्री ने किया है। राजेन्द्र ओझा का यह प्रकाशन हर साल किसी न किसी बड़े सितारे ने ही लोकार्पित किया है। मुम्बई फिल्म जगत में प्रत्येक सितारे के पास यह डायरेक्ट्री हर साल अपने नये संस्करण में अद्यतन हुआ करती है। इस तरह का काम किसी अन्य व्यक्ति ने मुम्बई में नहीं किया जो मध्यप्रदेश के राजेन्द्र ओझा ने करके दिखाया।

राजेन्द्र ओझा ने ही दादा साहब फाल्के पुरस्कार प्राप्त कलाकारों के परिचय के साथ एक वृहद किताब का भी प्रकाशन किया और राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त करने वाले कलाकारों की जानकारी देने वाली किताब का प्रकाशन भी किया। उन्होंने सिनेमा के सौ साल पूरे होने पर उसके बड़े वाल्यूम भी प्रकाशित किए, पहले 1913 से 1988 तक और बाद में अद्यतन। उनके बारे में, उनके योगदान को लेकर यह सब लिखे बगैर इसलिए नहीं रहा जा रहा है क्योंकि 26 जुलाई को उनका मुम्बई में अकस्मात निधन हो गया। दुखद यह है कि सारे कलाकारों का पता रखने वाले राजेन्द्र जी के अचानक इस तरह चले जाने का पता किसी को नहीं चला।


गुरुवार, 31 जुलाई 2014

बहन, सरोकारों की संवाहक

राखी का त्यौहार आने को है। बहन आने को है। घर में बहन का आना कितनी सारी अनुभूतियों को जाग्रत करता है, बयाँ कर पाना मुश्किल होता है, एकदम नेत्र सजल हो जाते हैं। बहन के साथ हमारा बचपन बीतता है। हम यदि उससे छोटे होते हैं तो उसका हुक्म खुशी-खुशी बजाते हैं। बहन यदि हमसे छोटी होती है तो वह हमारा हर कहा करके देती है। बहन का ग्लास भर दिया पानी ही बड़ा मायने रखता है, फिर चाय या और कुछ आपका-उसका मनचाहा तो कमाल का होता है।
बहन जब अपने घर जाती है, हम उसे पराया घर कहते हैं पर दरअसल वह उसका अपना घर होता है, जहाँ हम खुशी-खुशी और रोते-रोते भी उसे भेजकर अपना कर्तव्य निर्वहन कर लिया करते हैं, उस घर जाने के बाद हमारी स्मृतियों में उसका वही सान्निध्य रह जाता है जो हमने बचपन में जिया होता है। लड़ते-झगड़ते, रूठते-मनाते, बाँटते-छीनते, छेड़ते-चिढ़ाते बहुत कुछ हमारा बहन ले जाती है और बहुत कुछ अपना हमें दे जाती है। समय-समय पर उसे याद करके हम अपनी आँखें भिगोया करते हैं, मुस्कुरा उठते हैं, आँसू पोंछकर।
बहन, माँ का उदार रूप हुआ करती है। व‍‍ह माँ और पिता दोनों के साथ हमारे सरोकारों की संवाहक होती है। बचपन में पिता और माँ को वही बताया करती है कि हमें क्या चाहिए जो उनसे हम कह नहीं पा रहे हैं। बहन ऐसे सवाल और ऐसी कठिनाइयाँ जादू से हल कर दिया करती है। बहन का मन बहुत विराट होता है। अपने ही घर में वह खुशी-खुशी यह अनुभव जिया करती है कि उससे ज्यादा जगह उसके भइया की है लेकिन उसे इस बात पर जरा भी ईर्ष्या नहीं होती बल्‍िक इसका संज्ञान लेने की भी उसमें चतुराई नहीं होती। वह अपने जन्मदिन से, अपने कपड़ों से लेकर अपनी सारी हिस्सेदारी को लेकर गजब की सहिष्णु हुआ करती है।
राखी के त्यौहार की बहन को साल भर प्रतीक्षा होती है। उस दिन वह पानी तभी पीती है जब भाई को राखी बांध ले। उसका दिया नारियल, रूमाल और माथे पर किया तिलक आपको पल भर में अपनी भटकी और बहकी आत्मा के सामने खड़ा कर दिया करता है। बहन हमेशा अपने भाई और उससे जुड़कर बढ़े समाज की सदिच्छा की कामना करती है। वास्तव में तो बहन हमारी अपनी अस्मिता और हमारे अपने समूचे आसपास में हमारे जिए रहने की कामना करने वाली वह विलक्षणा है जिसका आधा हृदय उसके पास होता है और आधा भाई के पास।
मुझे याद है, भोपाल के जयप्रकाश अस्पताल में जब मैं अपने पापा के साथ सायकिल पर आगे लगी छोटी सीट पर बैठकर अपनी बहन को देखने गया था, तब वहाँ की एक नर्स सिस्टर ने मेरा गाल पकड़कर कहा था, देखो तुम्हारी बहन आ गयी, अब यह तुम्हारे घर का सारा सामन ले जायेगी। उस समय मैं रोने लगा था, छोटी सी बहन गुड्डन माँ के बगल में लेटी हुई थी। मैं मम्मी से कहने लगा, घर चलो, इसे यहीं रहने दो......
आज हँसी आती है। सच कहूँ वह घर का कुछ भी सामान लेकर नहीं गयी बल्कि जीवन में वो यश हासिल किया जिसने माँ-पिता को असीम सुख और गर्व से भर दिया। वह डॉक्टर बनी और हम सबको गौरव प्रदान किया। आज जब वह हम सबकी तकलीफों को अपनी दवाओं और कई बार सुइयों से भी दूर कर दिया करती है तब यह एहसास होता है कि रिश्तों के इस संसार में यह भागीदारी कितनी सुखद है, अविस्मरणीय अनुभूति की तरह, सदैव मन में बनी रहने वाली और अक्सर ऐसे वक्तों में मन से छलक कर बाहर आ जाने वाली.........

रविवार, 13 जुलाई 2014

सांस्कृतिक अस्मिता और जोहरा सहगल

जोहरा सहगल का नहीं रहना, अकल्पनीय और अविश्वसनीय इसलिए लगता है कि वे हमारी पिछली स्मृतियों तक बड़ी सचेत थीं। उनका सचेत होना किसी चमत्कार से कम न था। उनमें एक पूरी की पूरी सदी स्पन्दित होती थी। एक शख्सियत किस तरह आपको सुखद तरीके से हतप्रभ कर देती है, वैसा उनको देखना होता था। उनके बारे में सोचते हुए अस्सी-नब्बे साल पीछे दौड़कर ठहरना होता है, तब के देशकाल की कल्पना करनी होती है, सामाजिक वातावरण और स्थितियों के बारे में कल्पना करनी होती है, परतंत्र भारत में भारतीयता का एक खाका बुनना होता है और फिर उस पूरे सन्दर्भ में जोहरा जी के व्यक्तित्व की कल्पना होती है। दरअसल पूरा का पूरा परिवेश हमारे सामने अनेक तरह के पिछड़ेपन, परिमार्जनहीनता और मूल्यों के धरातल पर डाँवाडोल होते विश्वास का प्रकट होता है।

ऐसे वातावरण में एक शख्सियत पन्द्रह-सत्रह साल की उम्र में किस तरह तमाम विरोधाभासों के बीच एक सांस्कृतिक धरातल की कल्पना करती होगी, एक युवती किस तरह यह निश्चय अपने आपमें करती होगी कि आने वाले समय में इस देश में मनुष्यता और भारतीय अस्मिता में सांस्कृतिक मूल्यों की स्थापना और उससे ऊर्जा, शक्ति तथा सामर्थ्य अर्जित कर के एक बड़ी भूमिका का सूत्रपात किया जाना बेहद जरूरी है।अंग्रेजों की पराधीनता के सालों में अनेक विरोधाभासों, दमन और प्रतिकूलताओं के बावजूद साहित्य, कला और संस्कृति, नाटकों ने जो भूमिका अदा की है, उसका समय-समय पर प्रबुद्धजनों ने श्रेष्ठ आकलन किया है। वास्तव में सुप्त मन:स्थिति और सोयी चेतना को अभिव्यक्तियों ने ही जाग्रत करने का काम किया। जोहरा जी की सक्रियता और उपस्थिति की जरा उस धरातल पर कल्पना कीजिए।

जोहरा जी तो भारतीय स्वतंत्रता के साल में परिपक्व उम्र और सजग चेतना में थीं। उनकी भूमिका को देश के सांस्कृतिक पुनरुत्थान के परिप्रेक्ष्य में सोचकर जरा देखा जाये जब वे अल्मोड़ा में उदयशंकर की अकादमी में भारतीय बैले की अवधारणा के बीज मंत्रों के साथ अनूठे और असाधारण प्रयोग कर रही थीं। सोचा जा सकता है उनका पृथ्वीराज कपूर जैसे यायावर रंगकर्मी और उनके समूह का हिस्सा बनकर देश के कोने-कोने में जाना, तमाम मुसीबतें और परेशानियों में साथ बने रहना और रंगमंच की बुनिया की स्थापना में अपना योगदान करना। जानकारों को उनकी सक्रियता और उनके योगदान के बारे में बहुत कुछ पता होगा। जोहरा जी के कृतित्व और व्यक्तित्व को केवल बीस साल के हाल के सिने-कैरियर से बहुत पीछे जाकर जरा देखें और अपने सारे संवेदनात्मक आग्रहों के साथ विचार करें तो बहुत दूर तक साफ-धुंधला-मिलाजुला नजर आयेगा, जिसे दृष्टि को और साफ करके देखने से इस महान कलाकार, एक विलक्षण प्रतिभा के होने का अर्थ समझ में आयेगा।

....................उनका जाना एक बड़ी सांस्कृतिक विरासत में अब तक उनके रूप में बने रहने वाले सम्बल का हमारे बीच से खत्म होना भी है।