मंगलवार, 9 नवंबर 2010

हँसने, हँसाने के नाम पर

बड़े अरसे बाद गोलमाल थ्री में जॉनी लीवर दिखायी दिए। देखकर लगा कि लम्बे समय परदे से दूर रहकर भी कलाकार कितना पिछड़ जाता है। हालाँकि जानी की ऐसी स्थिति कभी नहीं रही कि उनका शुमार कोई बड़े हास्य अभिनेता के रूप में रहा हो। उन्होंने लम्बा समय स्ट्रगल खूब किया है। उनको बाद में सफलता मिली भी मगर वह सफलता उनको दरअसल अपने हुनर की वजह से मिली न कि कोई प्रतिभा या दक्षता के कारण। उन्होंने उस पूरे खाली समय में अपना अधिपत्य जमाया जब कोई दूसरा हास्य कलाकार सक्रिय न था। यह बीच का ऐसा समय था जब बहुत सारे नायक कॉमेडी सिनेमा के सिरमौर बन गये थे। अनिल कपूर से लेकर शाहरुख खान, सलमान और आमिर, अक्षय कुमार से लेकर संजय दत्त और सुनील शेट्टी तक मसखरी की हद तक जाकर अपना अन्दाज स्थापित कर रहे थे।

जॉनी लीवर ने उस वक्त अपनी जगह का विस्तार किया जब इन सितारों का भी कॉमेडी रंग उतरने लगा। उस पाँच-सात साल के बीच वे उभर कर सामने आये। वे एक अनिवार्यता सी भी बने। शक्ति कपूर घटिया कॉमेडी और उसके बाद स्कैण्डल में फँसकर अपना स्थान गवाँ बैठे। इसी बीच राजपाल यादव का उदय हो गया। वे व्यावसायिक सिनेमा के नये कॉमेडी आयकॉन बन गये। देखा जाये तो राजपाल यादव को इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने अपनी उपस्थिति और सक्रियता से जॉनी लीवर युग को पूरी तरह शून्य कर दिया। लेकिन एक दूसरा पहलू यह भी है कि उनकी अपनी मौलिकता भी एक सीमा के बाद अप्रभावित करने लगी। सिनेमा की भाषा में एक जैसे काम करने वाले या एकरस को टाइप्ड कहा जाता है। सो राजपाल यादव भी जल्दी ही टाइप्ड हो गये। उनको अभिनेता आशुतोष राणा ने शुरूआती समर्थन और प्रोत्साहन दिया था मगर आशुतोष से भी आगे उनका जहाँ बन गया।

इस समय अब राजपाल यादव का कैरियर भी उतार पर है। दो वर्ष पहले यह तक होने लगा था कि राजपाल यादव के लिए कैरेक्टर विशेष रूप से निर्देशक लिखवाते थे। प्रियदर्शन के वे प्रिय पात्र बने लेकिन प्रियदर्शन के सिनेमा से ही उनका चेहरा और काम उकताऊ हो गये। राजपाल यादव अब उतने लोकप्रिय नहीं रहे। इधर प्रियदर्शन ने राजपाल की उपस्थिति में ही जॉनी लीवर को खट्टामीठा में लेकर फिर उन्हें आजमाने की कोशिश की। एक दूसरी कोशिश रोहित शेट्टी ने गोलमाल थ्री में की। मगर यह बात नजर आने लगी है कि जॉनी लीवर उस तरह का तिल हो गये हैं जिसमें तेल नहीं है। आराम ने काया को बेडौल कर दिया है। अदा और अन्दाज भी अब लुभाते नहीं।

ऐसा लगता है कि हास्य के नाम पर आज के समय फिर सिनेमा में संक्रमण काल सा है। सब कुछ फूहड़ता के भरोसे है और हास्य बेमन और अरुचि का सबब बनकर रह गया है।

चुटकुलेबाजी से फिल्म नहीं चलती

विपुल शाह की फिल्म एक्शन रीप्ले को दर्शकों ने नकार दिया है। एक दिन बाद लगने वाली गोलमाल थ्री का भी स्वागत उतने उत्साह से नहीं हुआ है, जैसी कि अपेक्षा की जा रही थी। जो शुरूआती गहमागहमी हमें देखने में भी आयी वो किसी सुपरहिट फिल्म का स्वागत जैसी नहीं है। दोनों ही फिल्मों के प्रति प्रबुद्ध समीक्षकों का रुख देखकर लगता है कि दीपावली, दो काबिल माने जाने वाले निर्देशकों के लिए आतिशबाजी उड़ाने का सबब बनकर आयी है। निर्देशक का भी विफल फिल्म से बड़ा नुकसान होता है, मगर वह कुछ ही समय में अपनी धूल झाडक़र खड़ा हो जाता है और अगले काम की तलाश करने लग जाता है। उसे अगला काम मिल भी जाता है। चोट लम्बे समय वो सहलाता रह जाता है जो पैसे लगाता है या पैसे लगाने की भागीदारी में चार लोगों को जोडक़र सपने देखता है।

राष्ट्रीय स्तर पर एक्शन रीप्ले की समीक्षा करते वक्त उसे एक सितारा दिया जाना, वास्तव में एक बुरी फिल्म को रेखांकित करने की तरह है। ऐसा किसी एकाध समीक्षक ने नहीं किया बल्कि कई लोगों ने किया है। इससे साबित होता है कि अच्छी फिल्मों की श्रेणी में दोनों ही फिल्में नहीं आ पायीं। विपुल शाह ने वक्त-वक्त पर आँखें, दीवार, वक्त जैसी फिल्में बनायीं हैं। अक्षय कुमार उनके प्रिय अभिनेता हैं मगर इस बार कुछ ज्यादा ही एक्सपेरिमेंट हो गया।

एक्शन रीप्ले और गोलमाल थ्री को देखकर यही लगता है कि कॉमेडी फिल्में बनाने वाले निर्देशक, स्क्रिप्ट के नाम पर अन्तहीन चुटकुलेबाजी को ही आधार बनाकर काम करते हैं। अब केवल चुटकुलेबाजी पर तो फिल्म चलने से रही। हालाँकि अब यह चुटकुलेबाजी बहुत जगहों पर हो रही है। मंचों पर हास्य कवि भी यही कर रहे हैं। अपने चुटकुले भी सुना रहे हैं और दूसरों के भी अपने बताकर।

मिमिक्री के तमाम शो जो टेलीविजन के चैनलों पर दिखायी देते हैं वो तो चुटकुलेबाजी पर ही टिके हुए हैं। एक माहौल बना दिया गया है जिसके साथ लोग हँसने का काम कर रहे हैं। मिमिक्री शो का हँसना, निहायत ही नकली और अशिष्ट किस्म का होता है, देश के दर्शक उसके भी साथ हैं और मुफ्त में लुत्फ लेने में लगे हैं। मनोरंजन का मामला जिस तरह से मंच से लेकर टेलीविजन तक और टेलीविजन से लेकर सिनेमा तक बड़े मामूली ढंग से लिया जाने लगा है उसी का परिणाम फूहड़ और घटिया हास्य फिल्मों का खरपतवार की तरह आना है।

खत्म होते साल में अपने ही कारणों से दुर्दशा को प्राप्त होने वाली फिल्में इस रस्ते से भी आयी हैं और फ्लॉप हो गयी हैं। जल्दी ही ये फिल्में सिनेमाघर से उतरकर चैनलों की शोभा बनेंगी और भुला दी जाएँगी। सिनेमा तब तक अच्छा नहीं हो सकेगा, जब तक ऐसी फिल्मों का स्थान ऐसी ही दूसरी फिल्में लेती रहेंगी।

शनिवार, 6 नवंबर 2010

भूमिका में त्रासद आयाम रचती जि़न्दगी

रविवार एक यादगार फिल्म को उसकी विशिष्टताओं के साथ याद करने का हमारा दिन होता है। इस बार हम स्वर्गीय स्मिता पाटिल की अविस्मरणीय फिल्म भूमिका को चुन रहे हैं जिसका निर्देशन प्रतिष्ठित फिल्मकार श्याम बेनेगल ने किया था। आज हम जिस तरह से सत्तर के दशक की नकल पर बन रही फिल्मों का हौव्वा-तौबा देख रहे हैं, भूमिका उसी दशक की एक सार्थक फिल्म है जिसे 1977 में प्रदर्शित किया गया था। इस फिल्म की कहानी को लेकर यह बात छुपायी नहीं गयी थी कि यह मराठी फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री हंसा वाडकर के जीवन पर बनी है। भूमिका, हंसा वाडकर की आत्मकथा सांगते एका, पर आधारित थी।

सत्तर का दशक बेशक अपने आपको प्रबुद्ध साबित करने वालों के सिनेमा का समय था, जिसमें अमिताभ बच्चन जैसे एंग्रीयंग मैन का उदय हुआ मगर यही दशक सार्थक सिनेमा आन्दोलन के परवान चढऩे का भी था जिसमें श्याम बेनेगल, गोविन्द निहलानी, केतन मेहता और प्रकाश झा जैसे लोग फिल्में बनाकर अपनी एक अलग, समानान्तर मगर मोटी लकीर खींच रहे थे, जो अच्छे सिनेमा के जिज्ञासु और जानकार दोनों के लिए आकर्षण का केन्द्र बनी थी। भूमिका की पटकथा लिखने में श्याम बेनेगल के साथ अभिनेता, निर्देशक और रंगकर्मी गिरीश कर्नाड और पण्डित सत्यदेव दुबे ने भी सहयोग किया था। इस फिल्म की नायिका ऊषा एक अभिनेत्री है, जिसका जीवन द्वन्द्व और झंझावातों से भरा है। एक अधेड़ आदमी उसका पति है जो उसकी माँ का कभी प्रेमी रहा था और उससे दस साल की उम्र में चार आने के बदले विवाह का वचन कुटिलतापूर्वक ले लेता है। यह भूमिका अमोल पालेकर ने बखूबी निभायी है।

अमोल, एक शोषक पुरुष के रूप में अपनी भूमिका के साथ पूरा न्याय करते हैं वहीं ऊषा की भूमिका निबाहने वाली स्मिता पाटिल, भावाभिव्यक्ति से शोषण, पीड़ा और इस सबके बावजूद भीतर-बाहर से इन तमाम विरोधाभासों से लडऩे वाली स्त्री के रूप में गहरा प्रभाव छोड़ती हैं। यह स्त्री, अपने आसपास के परपीडक़ और शोषक परिवेश के बीच अपने जीवट के साथ खड़ी रहती है और सफलता, सम्पन्नता और प्रतिष्ठा अर्जित करती है।

इस ऊषा में अपनी सन्तुष्टि और आराम का जीवन जिए जाने की भी हिम्मत और हौसला अब आ गया है। नायिका के जीवन में और भी पुरुष आते हैं मगर अपनी भूमिका में वह शोषित होने या किए जाने की दयनीयता से उबर चुकी है। फिल्म के उत्तरार्ध में स्मिता पाटिल, अपने किरदार में जिस तरह विद्रोही चरित्र को प्रस्तुत करती हैं, वह सचमुच उन्हीं के द्वारा निभाया जा सकना सम्भव था। नसीरुद्दीन शाह, अमरीश पुरी, अनंत नाग फिल्म के अहम कलाकार हैं।

इस फिल्म का कैमरा वर्क गोविन्द निहलानी का है। चौथे-पाँचवें दशक के परिवेश के अनुरूप गीत रचना मजरूह सुल्तानपुरी और वसन्त देव ने की थी। वनराज भाटिया ने भूमिका का उसी मिजाज़ का संगीत भी तैयार किया था। श्याम बेनेगल की फिल्मोग्राफी की यह एक सशक्त फिल्म है, जो अपने आपमें अविकल्प और अकेला उदाहरण है उत्कृष्ट सिनेमा का।

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

हिन्दी फिल्मों में दीपावली

अपनी विराट भव्यता में दीपावली का त्यौहार किसी फिल्म में यदि दिखायी देता है तो वह करण जौहर की एक बहुत अच्छी फिल्म कभी खुशी कभी गम में है। अमिताभ बच्चन, जया बच्चन, शाहरुख खान, हिृतिक रोशन, काजोल और करीना स्टारर यह फिल्म आकलन की दृष्टि से देखा जाए तो एक बड़ी परफेक्ट स्टारकास्टिंग वाली फिल्म है। फिल्म की अपनी कहानी, संवेदनशील और भावनात्मक तो है ही मगर उसके साथ दृश्यों के प्रस्तुतिकरण, सिनेमेटोग्राफी के श्रेष्ठ कमाल के साथ उसको परदे पर देखना अनुभूतिजन्य है। परिवार के मुखिया रायचन्द के घर दीपावली अपने दृश्यों में याद रहती है। महल से भव्य जगमगाता घर, दीए, पूजा-आरती-प्रार्थना और रिश्तों का फलसफा, बड़ी खूबसूरती से बुना गया तानाबाना है। करण जौहर जैसे अपेक्षाकृत युवा की कल्पना ऐसे फिल्मांकन के लिए बड़ी सराहना का विषय है।

हिन्दी फिल्मों में दीपावली फिल्मों के नामों में प्रमुख रही है। यादगार अच्छे-बुरे प्रसंग, इस त्यौहार में घटने वाली घटनाओं को तानेबाने में बुनकर शामिल किए गये हैं। इसी तरह की विविध आयामी अनुभूतियों के गाने, विभिन्न फिल्मों में वक्त-वक्त पर शामिल किए गये हैं। विजय आनंद निर्देशित फिल्म गाइड में वहीदा रहमान पर, पिया तो से नैना लागे रे, गाना अनूठी खूबी के साथ फिल्माया गया है। शैलेन्द्र के लिखे इस गीत में एक अन्तरा दिवाली पर है, जग ने उतारे, धरती पे तारे, पर मन मेरा मुरझाए, तुम बिन आली, कैसी दीवाली, मिलने को जिया अकुलाए.. .. .., खूबसूरत कन्दील जगमगा रही हैं, अनार अपना रंग बिखेर रहे हैं और रूपक ताल में वहीदा रहमान का कथक आधारित नृत्य। अपने वक्त की ये अलग ही क्लैसिक यादें हैं जिनका आज भी कोई तोड़ नहीं है।

कैफी आजमी ने चेतन आनंद की फिल्म हकीकत में एक गीत लिखा था, आयी अबकी साल दिवाली, मुँह पर अपने खून मले, चारों तरफ है घोर अंधेरा, घर में दीप जले, मदन मोहन का संगीत था और लता की आवाज। भारत-चीन युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी 1964 की इस फिल्म में मारे गये फौजियों और अशान्ति का परिप्रेक्ष्य था। राजकपूर की फिल्म श्री चार सौ बीस और रामगोपाल वर्मा की फिल्म सत्या में नायक अपनी प्रेमिका को दीवाली की रात मुम्बई दिखाने ले जाता है। चालीस के दशक में जयन्त देसाई ने दीवाली नाम से ही फिल्म बनायी थी। 1956 में दीवाली की रात और घर घर में दीवाली नाम से दो अलग-अलग फिल्में बनी। चिराग में आशा पारेख और चाची चार सौ बीस में कमल हासन की बेटी दीवाली के पटाखों से घायल होते हैं। घर-घर में दीवाली है, लाखों तारे आसमान में, एक मगर ढूँढे न मिला, देख के दुनिया की दीवाली, मन मेरा चुपचाप जला, से लेकर दीपावली मनाएँ सुहानी तक कितने ही गीत हमारे जेहन में होते हैं।

फिल्म जंजीर का क्लायमेक्स खास दीवाली के दिन को केन्द्रित कर रचा गया था वहीं धर्मेन्द्र की फिल्म फागुन में साडिय़ाँ दीवाली के रॉकेट से जलकर खाक हो जाती हैं। नायक एक साड़ी बचा पाता है मगर उसे अपनी खोयी हुई पत्नी उसी दिन मिल जाती है जिसे वो साड़ी ओढ़ाता है, दीवाली उसके लिए सुखद हो जाती है।

बुधवार, 3 नवंबर 2010

फिल्में देखना त्यौहार मनाना नहीं होता

पता नहीं कैसे यह अवधारणा बन गयी है कि तीज-त्यौहार मनुष्य फिल्में देखकर मनाता होगा। फिल्मेें देखना रूटीन में ही कम होता जा रहा है। हमारे फिल्मकार आज तक यह निष्कर्ष नहीं निकाल पाये कि दर्शक का रुझान सिनेमाघर जाकर फिल्में देखने में क्यों कम होता जा रहा है? आज का सिनेमा ऐसा है कि उसे युवा पीढ़ी ही देखती है। इन दर्शकों में भी कुछ और विभाजन भी हो गया है।

बहुत सारे छात्र जो शहरों में सुदूर अंचलों से किस्म-किस्म की शिक्षा प्राप्त करने के लिए, अपना नौकरी और रोजगार में भविष्य सँवारने के लिए आते हैं, उनमें से बहुत से आश्वस्त और निश्चिंत किस्म के युवा कई बार अपनी पढ़ाई को एक तरफ रखकर फिल्में देखने चले जाते हैं। अक्सर मॉर्निंग शो में नजर आने वाली भीड़ में ऐसे युवाओं का समूह खूब हो-हल्ला करता मिलता है, जो पता नहीं फिल्म भी कितनी देखता होगा। दिन के शो की भी ऐसी ही स्थिति रहती है। टीन एजर्स अपनी समझ का सिनेमा देखकर भी उसके साथ व्यावसायिक न्याय नहीं कर पाते। फिल्मों को जब तक घर और परिवार पसन्द करके देखने नहीं जाता तब तक उसका चलना प्रमाणित नहीं हो पाता। इतनी या अन्यथा जनसंख्या फिल्में नहीं चलाती।

हमारे सामने अभी रामगोपाल वर्मा की फिल्म रक्तचरित्र की विफलता का एक उदाहरण है। बड़े और ठसक वाले प्रभावशाली कलाकार भी एक सुपरहिट तेलुगु फिल्म के हिन्दी संस्करण को सफल नहीं बना पाए। सिनेमा की ट्रेड गाइडें जिस तरह का कलेक्शन इन फिल्मों के पहले शो का या एक सप्ताह का बतलाती हैं, वह दुखद आश्चर्य की तरह है। कमाल यह है कि फिर भी फिल्में बन रही हैं।

इधर रोहित शेट्टी ने एक दरजन सितारों को लेकर एक फूहड़ फिल्म बना ली है जो दर्शकों के सिर पर इसी दीपावली में मढ़ दी जायेगी। पता नहीं कितनी सफलता उसको मिलती है। इस फिल्म के प्रोमो, इसे एक निरर्थक फिल्म प्रमाणित करते हैं। सिनेमाघर क्या कहेगा, यह दो-तीन दिन में मालूम हो ही जायेगा। फिल्मी आतिशबाजी के लिए दीपावली सबसे बड़ा मौका होता है। निराशाजनक पहलू यह है कि कुल दो फिल्में रिलीज हो रही हैं। इस पर भी ऐसी फिल्मों को दिखाने के लिए थिएटर अचानक टिकिट की कीमतें वगैरह भी बढ़ाकर दर्शकों की जेब से रुपए छुड़ाने का काम करने में लग जाते हैं।

बस अच्छा सिनेमा ही हमारे यहाँ नहीं बनता, यदि बने तो सबका बेड़ा पार लगाये। अभी हम देख रहे हैं कि बड़े और मँहगे सिनेमा की आतिशबाजी छूटने को है और गलियारे में दस तोला, अल्लाह के बन्दे जैसी कम बजट की अच्छी फिल्में धमाकों और नतीजों के बाद सामने आने की कतार में हैं। देखिए क्या होता है.. .. .. ..

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

फिल्मों का चलना, न चलना

फिल्मों की सफलता की स्थितियों में जितना असमंजस पिछले पन्द्रह बीस सालों में दिखायी देता है, वैसा उसके पहले कभी नहीं था। मशहूर फिल्मकार यश चोपड़ा ने पिछले दिनों एक विशेष बातचीत में यह बात की थी कि अब फिल्मों के साथ सिनेमाघरों में दिनों तक चलने का चलन पूरी तरह समाप्त हो चला है। एक जमाना था जब खुद उनकी वक्त, दीवार, त्रिशूल और कभी-कभी जैसी फिल्मों में चलते रहने का रेकॉर्ड कायम किया था। उन्होंने यह भी बताया कि किस तरह उनके बेटे आदित्य चोपड़ा की फिल्म दिलवाले दुल्हनियाँ ले जाएँगे, निरन्तर मुम्बई में चल रही है। आज स्थितियाँ यह हैं कि एक फिल्म का जीवन कुल मिलाकर अधिकतम दो माह भी नहीं है शायद।

दबंग जैसी सफल, सुपरहिट फिल्म खूब अच्छी ओपनिंग के बाद भी महीने भर के पहले ही सिनेमाघरों से बाहर हो गयी। जल्दी ही निर्माताओं ने उस फिल्म के डीवीडी और सीडी जारी कर दिए। चैनलों में भी वह शेड्यूल होने की स्थितियों में है। कोई भी चैनल छाती ठोंककर फिल्म एलाउंस कर सकता है। सिनेमा और उसके अस्तित्व की क्षणभंगुरता शोचनीय है। सिनेमा की स्थितियाँ भी दयनीय हैं। हमारे दर्शकों के बीच से जिस तरह सिनेमा का प्रभाव धीरे-धीरे समाप्त हुआ है, वह आश्चर्यजनक है। अब दर्शक की मनपसन्द के नायक-नायिका नहीं रहे। गाने और घटनाओं में दर्शकों को कोई आकर्षण नहीं है। किसी भी किस्म का किरदार दर्शकों को याद नहीं रहता। निर्देशक अपने नाम से पहचाना नहीं जाता।

हीरोइनों की स्थिति सबसे ज्यादा चिन्ताजनक है, जिनका कैरियर बमुश्किल दो-तीन साल का ही है। इनमें से भी पता नहीं कितनी आयटम सांग पर नाचने लगी हैं। उनके चेहरे भी अब पहचाने नहीं जाते। इनमें से कई के फोटो, अखबारों के व्यावयायिक पेजों पर किसी न किसी ज्वेलरी, मोबाइल कम्पनी या अन्य उत्पाद के ब्रांड एम्बेसेडर बनने के साथ धीरे-धीरे धूमिल हो जाया करते हैं। आगे बढऩे की सीढिय़ाँ संदिग्ध हैं, पीछे जाने की सडक़ पर उल्टा चलने का अभ्यास जैसा सिनेमा हो गया है बहुधा। सिनेमा से चैनल तक सरलीकरण का विस्तार ऐसा है कि हम बड़ी जल्दी जल्दी बड़े भाव से घटी दर तक आते हुए लोगों को देखते हैं। जितने आयामों के साथ सिनेमा बनता है, उन सबमें बावजूद तकनीक के बड़े बेहतर हो जाने, संसाधन बड़े श्रेष्ठ हो जाने के बाद भी कमिटमेंट की भारी कमी है।

हर आदमी खूब समय दे रहा है जी-जान से लगा हुआ है मगर किसी भी बड़े लक्ष्य के साथ नहीं। लक्ष्य स्पष्ट नहीं हैं लिहाजा लेबल ऑफ एक्सीलेंस भी कुछ नहीं है। फिल्म का चलना, न चलना इन्हीं यथार्थों के बाहर की सचाई है।

सोमवार, 1 नवंबर 2010

समीक्षाएँ और सितारे

फिल्म समीक्षा को लेकर आज बात करें तो स्थितियाँ बड़ी विकट नजर आती हैं। फिल्म समीक्षा के स्तर का निर्धारण सितारों से होता है। जाहिर है फिल्म का स्तर भी सितारों से ही होता है। दोनों जगह अलग-अलग तरह के सितारे हैं। एक सितारा सिनेमा का है दूसरा सितारा, समीक्षक के पास होता है। फिल्मों को देखकर आकलन किया जाता है और प्रदर्शन के बाद हमें तत्काल ही मालूम हो जाता है कि समीक्षक ने क्या देखा और क्या तय किया? प्रश्र अब आदर्श समीक्षा को लेकर उठने लगा है। तकनीक और सम्प्रेषण के व्यवहारिक साधन इतने त्वरित और तीव्र प्रभाव के साथ आप तक पहुँचते हैं कि आप खुद चकित हैं।

मुम्बई में अमूमन फिल्म, समीक्षकों को एक दिन पहले दिखा दी जाती है। विशेष मेहमानों और पत्रकारों के लिए उसका विशेष शो इसीलिए रखा जाता है ताकि इनायत रहे। अब सब रिश्ते भी सौहाद्र्र के बनाने में विश्वास करते हैं। अच्छा परिचय समीक्षा को बहुत प्रभावित करता है यह भी सच है। कई आदर्श और अपनी कलम से साथ टू द पाइंट होने वाले समीक्षक हालाँकि रिश्तों की परवाह नहीं करते। कई बार फिल्म बनाने वालों पर भी सख्त किस्म के, एकदम सख्त न भी कहिए तो मुलायम न रहने वाले समीक्षकों का दबाव-प्रभाव रहता है, जो, जो देखते हैं, अपना आकलन करके साफ-साफ लिखने में विश्वास करते हैं। ऐसे समीक्षकों से सिनेमा का सच्चा आकलन भी होता रहता है। बहरहाल मुम्बई के बाहर स्थितियाँ ऐसी नहीं हैं। समीक्षकों को फिल्म का विश£ेषण पता नहीं होता। भावुक उदारता से सितारे दे दिया करते हैं। इण्टरनेट पर मनोरंजन के तमाम डॉट कॉम में समीक्षा अपना अपना दृष्टिकोण होता है। बहुत से अखबारों को समीक्षा अगले दिन छापना अपरिहार्य है।

बहुत से अखबार, रविवार का दिन मुकर्रर करते हैं। इस तरह शुक्रवार को सिनेमाघर में लगी फिल्म पर व्यवस्थित टिप्पणी आसानी से सम्भव हो जाया करती है। अलग-अलग स्थितियों और अपरिहार्यताओं के कारण समीक्षा के पृथक रंग दिखायी देते हैं। एक फिल्म पर आप चार जगह पढक़र अलग-अलग राय जान पाते हैं। निष्पक्ष, निष्कपट और इसके उलट पूर्वाग्रहग्रस्त टिप्पणियाँ भी अपना आकर्षण रखती हैं। समीक्षाएँ, सिनेमा की अब रिपोर्टिंग ज्यादा हो गयी हैं। समुचित जानकारी और अनुभव के अभाव में अच्छी टिप्पणी अब दुर्लभ है।

यह बात भी उतनी ही सच है कि अब सिनेमा उस तरह का होता भी नहीं कि लिखने वाला बहुत ज्यादा कसरत करके कलम उठाए मगर बुरी फिल्म की अच्छे ढंग से बुरी समीक्षा करना भी एक किस्म का रचनात्मक हुनर है। हिन्दी सहित भारतीय भाषाओं में ऐसे हुनरमंद समीक्षक कम हैं।