लम्बे समय तक फिल्म निर्माण के बड़े घराने यदि चुपचाप बैठे रहें तो उनकी सक्रियता को लेकर न सिर्फ शक होता है बल्कि नाउम्मीदी भी बढ़ती चली जाती है। वास्तव में हानि-लाभ के ऐसे भयानक जोखिम, जैसे आज के समय में सिनेमा को लेकर, वैसे पहले बहुत कम देखने को मिले हैं। एक जमाना था जब बड़े सितारों की फिल्में चलते हुए भी आज की ताजा खबर और जंगल में मंगल टाइप की फिल्मों को सफलता और लाभ दोनों मिल जाया करते थे। इतना ही नहीं ऐसी फिल्मों के सितारों की भी अच्छी-खासी दाल-रोटी चल जाया करती थी मगर अब खतरे ज्यादा हो गये हैं।
पिछले कुछ समय से फिल्म निर्माण के बड़े घराने आज के तमाम जोखिमों का बारीकी से आकलन कर रहे हैं। कुछ घराने ऐसे हो गये हैं जिनके मुख्य फिल्मकार खुद फिल्में निर्देशित नहीं करते, दूसरे निर्देशकों को मौके देते हैं मगर मौकों के साथ खुद भी अपने हस्तक्षेप और निगरानियाँ बराबर रखते हैं। राकेश रोशन ने काइट्स के साथ ऐसी ही निगरानी रखी मगर अनुराग बासु क्या बना रहे हैं इस तह तक शायद वह नहीं पहुँच पाये। अब उन्हें अपने बेटे के लिए खुद फिल्म निर्देशित करने की तैयारी करना पड़ रही है। यश चोपड़ा भी अस्सी साल की उम्र में एक बार फिर तैयार हो रहे हैं। वीर-जारा उनका अनुभव बुरा नहीं था। अभी भी वे उत्साह और ऊर्जा से भरे हैं।
उनके बेटे आदित्य निर्देशक के रूप में और उदय अभिनेता के रूप में भले लम्बे समय से उल्लेखनीय न कर पा रहे हों मगर उनके मन में अच्छी कहानी, अच्छी फिल्म का जज्बा बरकरार है। वे नये साल में एक फिल्म शुरू कर रहे हैं। उम्मीदें अमिताभ बच्चन की भी हैं और शाहरुख खान की भी। यश चोपड़ा ही जानते हैं कि उनकी फिल्म की स्टार कास्ट क्या होगी। इधर उनके भतीजे, रवि चोपड़ा ने भी अगले साल बी.आर. फिल्म्स के बैनर पर अगली फिल्म बनाने की पहल शुरू कर दी है। बागवान निर्देशित करके रवि, अपने आत्मविश्वास को बनाए हुए हैं भले ही बाबुल ने उनको वह प्रतिसाद न दिया हो जिसकी उनको आशा थी। इधर शो-मैन सुभाष घई कैसे पीछे रहते।
अपना जन्मदिन, मुक्ता आर्ट्स की वर्षगाँठ सभी को जश्रपूर्वक मनाने वाले घई ने अपने बैनर पर एक साथ तीन फिल्में घोषित की हैं। इनमें से एक वे खुद निर्देशित कर रहे हैं, दूसरी फिल्म प्रियदर्शन को दी है और तीसरी फिल्म के लिए निर्देशक ढूँढा जा रहा है या कह लीजिए तय किया जा रहा है।
शुक्रवार, 19 नवंबर 2010
लक्ष्यों की राह और नया साल
अब जाते हुए साल पर सितारों का आकर्षण कम हो गया है। सभी को नये साल के अनुबन्धों की चिन्ता सताने लगी है। नया साल नये संकल्पों के साथ शुरू होता है। समयबद्ध ढंग से काम करने वाले फिल्मकार-कलाकार हर चीज सुनिश्चित रखते हैं। ट्रेड गाइड में हम देखते हैं कि निर्माता छ:-छ: महीने आगे तक की योजना बनाते हुए अपनी फिल्म का प्रदर्शन तय कर देते हैं। बहुत कम निर्माता ऐसे होते हैं कि घोषित किए गये समय पर अपनी फिल्म प्रदर्शित कर सकें। तयशुदा कार्यक्रम उनके होते हैं मगर व्यवधान अनेक स्तरों पर आते हैं। सबसे ज्यादा समस्याएँ हीरो और हीरोइनों की तारीख और उपलब्धता को लेकर होती है। कलाकारों को तभी तक मजा आता है जब तब तय शेड्यूल पर सारी चीजें होती रहें।
यदि निर्माता व्यावसायिक कारणों अथवा आर्थिक परिस्थितियों के चलते अपनी शूटिंग शेड्यूल में परिवर्तन करता है तो कलाकार को मुश्किलें होती हैं। कई बार कलाकार किसी खास प्रोजेक्ट पर अधिक रुचि लेकर, चलते हुए काम को प्रभावित करता है। ऐसे कई कारण होते हैं जिनके चलते फिल्में लेट हुआ करती हैं। इस समय अभिनेत्रियों में दीपिका पादुकोण, कैटरीना कैफ, करीना कपूर, प्रियंका चोपड़ा के नाम लगातार चलने वाले और मांग बरकरार रखने वाले कलाकारों में शामिल हैं। इसी तरह अभिनेताओं में सलमान खान, आमिर और शाहरुख एक-एक प्रोजेक्ट करने वाले कलाकार माने जाते हैं। ह्रितिक रोशन भी इनमें शुमार होते हैं। वे भी एक वक्त में एक ही फिल्म करना चाहते हैं। उनके अलावा अक्षय कुमार का समय अपने समकालीनों में अजय देवगन से अच्छा चल रहा है।
हालाँकि उनके प्रति अतिरिक्त मोह रखने वाले प्रकाश झा, राजकुमार सन्तोषी और रोहित शेट्टी जैसे निर्देशक उन्हें अपनी फिल्म में रिपीट करते रहते हैं पर और बेहतर स्थितियों में रणबीर कपूर और नील नितिन मुकेश को हम देखते हैं। आमिर खान के भांजे इमरान की गाड़ी धीमी ही चल रही है। इससे अलग इरफान खान सभी कलाकारों के बरक्स एक समानान्तर सक्रिय लकीर की तरह अपनी पूछ-परख बनाए रखते हैं। उनकी एक फिल्म पान सिंह तोमर की प्रतीक्षा की जा रही है। संजय दत्त भी आने वाले साल में दो-तीन फिल्मों के लिए अनुबन्धित हैं वहीं देओल परिवार को एक साथ यमला पगला दीवाना में देखा जा सकेगा।
इन कलाकारों में एक अभिनेत्री इस समय सबसे आगे आने वाले साल में अपनी फिल्मों को लेकर है, फिल्में क्या परिणाम देंगी वह तो आगे पता चलेगा मगर दीपिका पादुकोण को 2011 में एक साथ लगभग सात-आठ फिल्मों की शूटिंग करना है।
यदि निर्माता व्यावसायिक कारणों अथवा आर्थिक परिस्थितियों के चलते अपनी शूटिंग शेड्यूल में परिवर्तन करता है तो कलाकार को मुश्किलें होती हैं। कई बार कलाकार किसी खास प्रोजेक्ट पर अधिक रुचि लेकर, चलते हुए काम को प्रभावित करता है। ऐसे कई कारण होते हैं जिनके चलते फिल्में लेट हुआ करती हैं। इस समय अभिनेत्रियों में दीपिका पादुकोण, कैटरीना कैफ, करीना कपूर, प्रियंका चोपड़ा के नाम लगातार चलने वाले और मांग बरकरार रखने वाले कलाकारों में शामिल हैं। इसी तरह अभिनेताओं में सलमान खान, आमिर और शाहरुख एक-एक प्रोजेक्ट करने वाले कलाकार माने जाते हैं। ह्रितिक रोशन भी इनमें शुमार होते हैं। वे भी एक वक्त में एक ही फिल्म करना चाहते हैं। उनके अलावा अक्षय कुमार का समय अपने समकालीनों में अजय देवगन से अच्छा चल रहा है।
हालाँकि उनके प्रति अतिरिक्त मोह रखने वाले प्रकाश झा, राजकुमार सन्तोषी और रोहित शेट्टी जैसे निर्देशक उन्हें अपनी फिल्म में रिपीट करते रहते हैं पर और बेहतर स्थितियों में रणबीर कपूर और नील नितिन मुकेश को हम देखते हैं। आमिर खान के भांजे इमरान की गाड़ी धीमी ही चल रही है। इससे अलग इरफान खान सभी कलाकारों के बरक्स एक समानान्तर सक्रिय लकीर की तरह अपनी पूछ-परख बनाए रखते हैं। उनकी एक फिल्म पान सिंह तोमर की प्रतीक्षा की जा रही है। संजय दत्त भी आने वाले साल में दो-तीन फिल्मों के लिए अनुबन्धित हैं वहीं देओल परिवार को एक साथ यमला पगला दीवाना में देखा जा सकेगा।
इन कलाकारों में एक अभिनेत्री इस समय सबसे आगे आने वाले साल में अपनी फिल्मों को लेकर है, फिल्में क्या परिणाम देंगी वह तो आगे पता चलेगा मगर दीपिका पादुकोण को 2011 में एक साथ लगभग सात-आठ फिल्मों की शूटिंग करना है।
सोमवार, 15 नवंबर 2010
बदजुबानी लहजे का इन्साफ
विषय पर बड़ी सावधानी के साथ बात करने को जी चाहता है, खतरा यह भी लगता है कि आजकल के चलन में सब लोकप्रियता के नाम पर है, हादसे भी और विवाद भी सो पता नहीं अपना लिखा, अपना उठाया मुद्दा जमाने के हिसाब से कौन सी राह पकड़ ले मगर इस बात पर चुप रहना भी मूर्खता होगी, कि एक बदतमीज और अशिष्ट स्त्री अपनी परममूढ़ता के चरम पर इस सीमा तक जा सकती है कि उसकी बात से एक आदमी अपनी जान से भी हाथ धो बैठे।
राखी सावन्त के रूप में बात हम एक ऐसी युवती की कर रहे हैं जो पिछले वर्षों में सिर्फ इसलिए कामयाब होती चली गयी क्योंकि हर शहर में उसके नाच के शो एनवक्त पर अश£ीलता के खतरों और उनसे बरप उठने वाली अराजकता के डर से निरस्त किए जाते रहे। अनेक शहरों में उसे अपने भद्दे नाच और उससे खड़ी हो जाने वाली कानून-व्यवस्था की मुश्किलों को लेकर उल्टे पैरों वापस लौटना पड़ता था। दुर्भाग्य यह है कि राखी सावन्त इतने पर ही प्रसिद्ध होती चली गयी। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया उसके नाचने से लेकर नहीं नाचने और नहीं नाच पाने से उठी झल्लाहट तक को रसीली खबर बनाकर बेचता-दिखाता रहा। आखिरकार राखी सावन्त को कुछ चैनलों ने सीधे इस तरह मान्यता प्रदान की जैसे वह हमारे समय की सबसे बड़ी मीडिया महारानी हो। बड़े-बड़े रिपोर्टर भी उसकी स्तरहीनता को उफान देने में चुटकी बजाते हुए आगे आये।
चैनलों में उसके कार्यक्रम शुरू हुए, उसका स्वयंवर का अच्छा-खासा धारावाहिक चलता रहा। एक कदम आगे जाकर राखी का इन्साफ नाम का रीयलिटी शो एक चैनल ने शुरू कर दिया जिसमें कायिक और वाचिक परम्परा दोनों में ही लगभग अनावृत्त राखी सावन्त को देखते-बोलते घर बैठे दर्शक निहाल होते रहे। युवाओं और किशोर बच्चों को राखी की भदेस वाचालता में रस आने लगा और आखिर तार्किकता में अपढ़ और लगभग निरक्षर हीनवृत्ति को अपने मुँह से लगभग फेंकने वाली इस इन्साफकर्ता ने एक आदमी को मौत का रास्ता दिखा दिया। अब कानूनी परिस्थितियाँ बन रही हैं तो चैनल भी अपनी जवाबदारी से पल्ला झाड़ रहा है।
कुछ समय पहले तक एक शो हम किरण बेदी का देखते थे जिसकी अपनी मर्यादा और प्रासंगिकता नजर भी आती थी। किरण बेदी एक अनुभवी पुलिस प्रशासन और समाज सेवी हैं उनका अपना तरीका किसी भी बात को सुनने और समाधान प्रस्तुत करने का बिल्कुल अलग होता था लेकिन पता नहीं कैसे एक चैनल समाज की सेवा के लिए इन्साफ करने का दायित्व राखी सावन्त जैसी सदा निरर्थक और विफल कलाकार को देने पर अमादा हो गया और परिणाम इस रूप में सामने आया। हो सकता है, इसके सभी जिम्मेदार, कन्नियाँ काट रहे हों, दोषारोपण कर रहे हों, मुँह छिपा रहे हों मगर रीयलिटी शो की पहचान बनती जा रही बदजुबानी ने एक हादसा पेश कर दिया है। पता नहीं और कितने हादसे होंगे?
राखी सावन्त के रूप में बात हम एक ऐसी युवती की कर रहे हैं जो पिछले वर्षों में सिर्फ इसलिए कामयाब होती चली गयी क्योंकि हर शहर में उसके नाच के शो एनवक्त पर अश£ीलता के खतरों और उनसे बरप उठने वाली अराजकता के डर से निरस्त किए जाते रहे। अनेक शहरों में उसे अपने भद्दे नाच और उससे खड़ी हो जाने वाली कानून-व्यवस्था की मुश्किलों को लेकर उल्टे पैरों वापस लौटना पड़ता था। दुर्भाग्य यह है कि राखी सावन्त इतने पर ही प्रसिद्ध होती चली गयी। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया उसके नाचने से लेकर नहीं नाचने और नहीं नाच पाने से उठी झल्लाहट तक को रसीली खबर बनाकर बेचता-दिखाता रहा। आखिरकार राखी सावन्त को कुछ चैनलों ने सीधे इस तरह मान्यता प्रदान की जैसे वह हमारे समय की सबसे बड़ी मीडिया महारानी हो। बड़े-बड़े रिपोर्टर भी उसकी स्तरहीनता को उफान देने में चुटकी बजाते हुए आगे आये।
चैनलों में उसके कार्यक्रम शुरू हुए, उसका स्वयंवर का अच्छा-खासा धारावाहिक चलता रहा। एक कदम आगे जाकर राखी का इन्साफ नाम का रीयलिटी शो एक चैनल ने शुरू कर दिया जिसमें कायिक और वाचिक परम्परा दोनों में ही लगभग अनावृत्त राखी सावन्त को देखते-बोलते घर बैठे दर्शक निहाल होते रहे। युवाओं और किशोर बच्चों को राखी की भदेस वाचालता में रस आने लगा और आखिर तार्किकता में अपढ़ और लगभग निरक्षर हीनवृत्ति को अपने मुँह से लगभग फेंकने वाली इस इन्साफकर्ता ने एक आदमी को मौत का रास्ता दिखा दिया। अब कानूनी परिस्थितियाँ बन रही हैं तो चैनल भी अपनी जवाबदारी से पल्ला झाड़ रहा है।
कुछ समय पहले तक एक शो हम किरण बेदी का देखते थे जिसकी अपनी मर्यादा और प्रासंगिकता नजर भी आती थी। किरण बेदी एक अनुभवी पुलिस प्रशासन और समाज सेवी हैं उनका अपना तरीका किसी भी बात को सुनने और समाधान प्रस्तुत करने का बिल्कुल अलग होता था लेकिन पता नहीं कैसे एक चैनल समाज की सेवा के लिए इन्साफ करने का दायित्व राखी सावन्त जैसी सदा निरर्थक और विफल कलाकार को देने पर अमादा हो गया और परिणाम इस रूप में सामने आया। हो सकता है, इसके सभी जिम्मेदार, कन्नियाँ काट रहे हों, दोषारोपण कर रहे हों, मुँह छिपा रहे हों मगर रीयलिटी शो की पहचान बनती जा रही बदजुबानी ने एक हादसा पेश कर दिया है। पता नहीं और कितने हादसे होंगे?
शनिवार, 13 नवंबर 2010
रस्किन बॉण्ड की कहानी - ब्ल्यू अम्ब्रेला
हालाँकि विशाल भारद्वाज ने संगीत निर्देशक से निर्देशक होते हुए आज अपनी ख्याति के व्यापक विस्तार में हैं मगर आरम्भ में गुलजार की फिल्म माचिस के संगीतकार के समय से उनको देखते हुए यह महसूस किया है कि उनकी रचनात्मक दृष्टि और चयन प्रक्रिया दोनों समकालीन युवा फिल्मकारों से काफी अलग हैं। अपने लिए बाद में उन्होंने विविधतापूर्ण फिल्में चुनीं मगर बच्चों के लिए शुरू में उन्होंंने एक के बाद एक जो दो फिल्में मकड़ी और ब्ल्यू अम्ब्रेला बनायी उनको देखते हुए, उस दुनिया में होना, एक अनूठा अनुभव है। खासतौर पर ब्ल्यू अम्ब्रेला बड़ी दिलचस्प और कहीं-कहीं सीधे मन को छू जाती है।
रविवार को हम एक फिल्म पर बात करते हैं जो अपने वक्त की उल्लेखनीय और प्रभाव छोडऩे वाली फिल्में होती हैं। बाल दिवस, इस बार इस रविवार को है लिहाजा बच्चों के लिए ब्ल्यू अम्ब्रेला की चर्चा ज्यादा समीचीन और सार्थक लगती है। अब हमारे यहाँ फिल्में प्राप्त करना और देखना कठिन प्रक्रिया नहीं है, सीडी और डीवीडी में सब उपलब्ध है, लिहाजा बच्चे इस फिल्म को देखकर बाल दिवस मना सकते हैं।
विशाल भारद्वाज ने रस्किन बॉण्ड की कहानी को फिल्म का मूल और मुख्य आधार बनाकर अपनी टीम के साथ पटकथा का हिन्दुस्तानी परिवेश में परिष्कार किया है। फिल्म में हम इस कहानी को हिमाचलप्रदेश के खूबसूरत आंचलिक सौन्दर्य और ठण्ड के खुशगवार मौसम में घटित होते देखते हैं। कहानी एक लालची दुकानदार, उसका नौकर और एक बच्ची के आसपास घूमती है। यह बच्ची जापानी सैलानियों के एक समूह को अपनी गाँव की खूबसूरती दिखा रही है। वह एक सुन्दर जापानी युवती की नीली खूबसूरत छतरी पर मोहित हो जाती है और जापानी युवती उस बच्ची के अनुष्ठानिक कण्ठहार पर। मासूम प्रस्ताव पर दोनों में छतरी और हार की अदल-बदल हो जाती है। अब बच्ची शान से पूरे गाँव में नीली छतरी लगाकर खेलती-घूमती है।
इस छतरी पर एक लालची दुकानदार की नीयत खराब हो जाती है और वह येन-केन-प्रकारेण इसे चुराने की फिराक में लग जाता है। एक दिन वह अपने इरादे में सफल हो जाता है लेकिन वह बच्ची, अपनी अक्ल और चतुराई से चोरी का पता लगाती है और दुकानदार पकड़ा जाता है। बाद में दुकानदार प्रायश्चित भी करता है। कुल मिलाकर एक बड़ी रोचक कहानी है जिसमें श्रेया शर्मा ने बच्ची की भूमिका अच्छी निभायी है मगर सबसे श्रेष्ठ साबित होते हैं लालची दुकानदार की भूमिका में पंकज कपूर। नंदू का यह किरदार एक पूरी मन:स्थिति और मनोविज्ञान को समझने में आनंद भी प्रदान करता है। यह एक एकाकी किरदार है जिसे गाँव के बच्चे खूब तंग करते हैं और वह भी अपने प्रतिवाद में उतना ही बुरा है, जितना एक बच्चों की फिल्म में किसी नकारात्मक चरित्र को होना चाहिए।
रविवार को हम एक फिल्म पर बात करते हैं जो अपने वक्त की उल्लेखनीय और प्रभाव छोडऩे वाली फिल्में होती हैं। बाल दिवस, इस बार इस रविवार को है लिहाजा बच्चों के लिए ब्ल्यू अम्ब्रेला की चर्चा ज्यादा समीचीन और सार्थक लगती है। अब हमारे यहाँ फिल्में प्राप्त करना और देखना कठिन प्रक्रिया नहीं है, सीडी और डीवीडी में सब उपलब्ध है, लिहाजा बच्चे इस फिल्म को देखकर बाल दिवस मना सकते हैं।
विशाल भारद्वाज ने रस्किन बॉण्ड की कहानी को फिल्म का मूल और मुख्य आधार बनाकर अपनी टीम के साथ पटकथा का हिन्दुस्तानी परिवेश में परिष्कार किया है। फिल्म में हम इस कहानी को हिमाचलप्रदेश के खूबसूरत आंचलिक सौन्दर्य और ठण्ड के खुशगवार मौसम में घटित होते देखते हैं। कहानी एक लालची दुकानदार, उसका नौकर और एक बच्ची के आसपास घूमती है। यह बच्ची जापानी सैलानियों के एक समूह को अपनी गाँव की खूबसूरती दिखा रही है। वह एक सुन्दर जापानी युवती की नीली खूबसूरत छतरी पर मोहित हो जाती है और जापानी युवती उस बच्ची के अनुष्ठानिक कण्ठहार पर। मासूम प्रस्ताव पर दोनों में छतरी और हार की अदल-बदल हो जाती है। अब बच्ची शान से पूरे गाँव में नीली छतरी लगाकर खेलती-घूमती है।
इस छतरी पर एक लालची दुकानदार की नीयत खराब हो जाती है और वह येन-केन-प्रकारेण इसे चुराने की फिराक में लग जाता है। एक दिन वह अपने इरादे में सफल हो जाता है लेकिन वह बच्ची, अपनी अक्ल और चतुराई से चोरी का पता लगाती है और दुकानदार पकड़ा जाता है। बाद में दुकानदार प्रायश्चित भी करता है। कुल मिलाकर एक बड़ी रोचक कहानी है जिसमें श्रेया शर्मा ने बच्ची की भूमिका अच्छी निभायी है मगर सबसे श्रेष्ठ साबित होते हैं लालची दुकानदार की भूमिका में पंकज कपूर। नंदू का यह किरदार एक पूरी मन:स्थिति और मनोविज्ञान को समझने में आनंद भी प्रदान करता है। यह एक एकाकी किरदार है जिसे गाँव के बच्चे खूब तंग करते हैं और वह भी अपने प्रतिवाद में उतना ही बुरा है, जितना एक बच्चों की फिल्म में किसी नकारात्मक चरित्र को होना चाहिए।
शुक्रवार, 12 नवंबर 2010
प्रकाश झा और आरक्षण
भोपाल में फिर एक बार गहमागहमी है। प्रकाश झा नयी फिल्म के लिए तैयार होकर आ गये हैं। जगहें देख ली गयी हैं। कला निर्देशक जयन्त देशमुख की परिकल्पना में आरक्षण फिल्म के लिए तैयार किए जाने वाले स्थानों का ब्ल्यू प्रिंट तैयार है, उनका काम शुरू भी हो गया है। निर्देशक के लिए फिल्म बनाना आसान नहीं होता। कैमरे के साथ केवल कलाकारों को स्क्रिप्ट के अनुसार निर्देशित करना और अपने मन की सन्तुष्टि के दृश्य प्राप्त करना ही केवल फिल्म बनाना नहीं है और न ही फिल्म बनाना यह है कि शूटिंग खत्म करके पोस्ट प्रोडक्शन के काम में अपनी रचनात्मकता को एकाग्र करे और फिल्म बनाकर दर्शकों के सुपुर्द कर दे और फैसला देखे। काम इन सबके अलावा दूसरे बहुत जरूरी हैं जिनमें बहुत सारी अधिकृत से ज्यादा अनपेक्षित और अनाधिकृत अपेक्षाओं का सामना करना एक मुख्य मुद्दा रहता है।
काम निर्बाध रूप से होता रहे और व्यवधानकर्ता चैन से बैठे रहें यह बड़ी चुनौती है। रूठे को मनाना बड़ा सरदर्द है और दिलचस्प यह है कि बनती हुई फिल्म का बड़ा कलाकार नहीं रूठता और न ही तकनीशियन और सहायक, उन सबमें यारबाजी से लेकर अबे-तबे और इससे ज्यादा आगे जाकर भी जो व्यवहार किया जाता है, वह प्यार के व्यवहार का हिस्सा होता है। सभी इसके अभ्यस्त होते हैं। मुसीबत वहाँ होती है जहाँ सो-काल्ड संवेदनशील लोग मजबूरी में जोड़े जाते हैं। उनकी सद्इच्छा बनी रहे, इसके लिए अतिरिक्त सावधानियाँ जरूरी होती हैं।
प्रकाश झा ने राजनीति बनाते हुए इसके झंझावात बहुत झेले। जो उनके बहुत नजदीक थे, उन्होंने कभी व्यवधान खड़े नहीं किए मगर यहाँ शूटिंग करते बहुत कम दिन ही ऐसे रहे होंगे जब उनको सिरदर्द न हुआ हो। लेकिन प्रकाश झा की खासियत गरल को बखूबी गले के नीचे रख लेने की है। एक बार फिर वे उसी धीरज और धैर्य के साथ मध्यप्रदेश की राजधानी में फिल्म बनाने आ गये हैं। वे कुछ धारावाहिक भी बनाएँगे।
इस बात को मानना होगा कि भोपाल को सिनेमा के नक्शे में एक अच्छी जगह देने का काम उन्होंने किया। भोपाल में रमना और लगातार काम करना आने वाले समय में इस नाते उनके निमित्त जाना जायेगा कि इस शहर से बड़ी फिल्में, बड़े स्तर के धारावाहिक बनकर देश और चैनलों की शोभा बनेंगे। सहायकों, तकनीशियनों और अपेक्षानुसार कलाकारों को भी इसमें रोजगार से लेकर परिष्कार तक के अवसर होंगे। आरक्षण इसलिए भी बड़ी हाई-लाइट है क्योंकि वह महानायक की फिल्म है।
प्रकाश झा अपनी फिल्म की स्क्रिप्ट की गोपनीयता भी बखूबी रखते हैं। हालाँकि आरक्षण आज कोई बड़ा आन्दोलन या ऊष्मा का विषय नहीं रह गया है, पर हमारे लिए यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रकाश झा किस फूंकनी से राख में दबी-छिपी चिंगारी को हवा देते हैं?
काम निर्बाध रूप से होता रहे और व्यवधानकर्ता चैन से बैठे रहें यह बड़ी चुनौती है। रूठे को मनाना बड़ा सरदर्द है और दिलचस्प यह है कि बनती हुई फिल्म का बड़ा कलाकार नहीं रूठता और न ही तकनीशियन और सहायक, उन सबमें यारबाजी से लेकर अबे-तबे और इससे ज्यादा आगे जाकर भी जो व्यवहार किया जाता है, वह प्यार के व्यवहार का हिस्सा होता है। सभी इसके अभ्यस्त होते हैं। मुसीबत वहाँ होती है जहाँ सो-काल्ड संवेदनशील लोग मजबूरी में जोड़े जाते हैं। उनकी सद्इच्छा बनी रहे, इसके लिए अतिरिक्त सावधानियाँ जरूरी होती हैं।
प्रकाश झा ने राजनीति बनाते हुए इसके झंझावात बहुत झेले। जो उनके बहुत नजदीक थे, उन्होंने कभी व्यवधान खड़े नहीं किए मगर यहाँ शूटिंग करते बहुत कम दिन ही ऐसे रहे होंगे जब उनको सिरदर्द न हुआ हो। लेकिन प्रकाश झा की खासियत गरल को बखूबी गले के नीचे रख लेने की है। एक बार फिर वे उसी धीरज और धैर्य के साथ मध्यप्रदेश की राजधानी में फिल्म बनाने आ गये हैं। वे कुछ धारावाहिक भी बनाएँगे।
इस बात को मानना होगा कि भोपाल को सिनेमा के नक्शे में एक अच्छी जगह देने का काम उन्होंने किया। भोपाल में रमना और लगातार काम करना आने वाले समय में इस नाते उनके निमित्त जाना जायेगा कि इस शहर से बड़ी फिल्में, बड़े स्तर के धारावाहिक बनकर देश और चैनलों की शोभा बनेंगे। सहायकों, तकनीशियनों और अपेक्षानुसार कलाकारों को भी इसमें रोजगार से लेकर परिष्कार तक के अवसर होंगे। आरक्षण इसलिए भी बड़ी हाई-लाइट है क्योंकि वह महानायक की फिल्म है।
प्रकाश झा अपनी फिल्म की स्क्रिप्ट की गोपनीयता भी बखूबी रखते हैं। हालाँकि आरक्षण आज कोई बड़ा आन्दोलन या ऊष्मा का विषय नहीं रह गया है, पर हमारे लिए यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रकाश झा किस फूंकनी से राख में दबी-छिपी चिंगारी को हवा देते हैं?
गुरुवार, 11 नवंबर 2010
सिनेमा का इतिहास कहाँ है?
भारत का सिनेमा धीरे-धीरे अपनी शताब्दी की ओर बढ़ रहा है। 2012 से सिनेमा का सौवाँ साल शुरू होगा। एक वर्ष तक सिनेमा का सौवाँ वर्ष मनाया जायेगा। इस सफर के आयाम विस्तारित हैं। बहुत सारी विविधताओंं में बड़ी दूर तक जाकर सिनेमा का आकलन करना होगा तब समग्रता में सौ साल की यात्रा पर बात हो सकेगी। हमारे देश में सिनेमा का सपना देखने वाले दादा साहब फाल्के का व्यक्तिगत जुनून था सिनेमा। यह बात सच है कि विलक्षण काम जुनून से ही सम्भव हो पाते हैं। दादा साहब फाल्के ने रतलाम में आकर लिथोग्राफी का प्रशिक्षण हासिल किया था, सिनेमा के पितामह से जुडऩे का एक श्रेय मध्यप्रदेश को इस तरह है। उन्होंने फिल्म बनाने की तैयारी बहुत सारा ज्ञान और विधियाँ अर्जित करके की। जीवन में जो संघर्ष किए उनकी बात बहुत कम सुनने में आती है।
भारत की पहली फिल्म राजा हरिश्चन्द्र बनाने वाले फाल्के का बाद का जीवन बड़ी कठिनाइयों और अभावों में व्यतीत हुआ। उनके नहीं रहने के बाद उनके सामान, उपकरण आदि सब लावारिस हालत में मिले थे। यश चोपड़ा ने हाल ही बातचीत में बताया था कि अभिनेता जयराज को जब दादा साहब फाल्के पुरस्कार मिला था, तब उनको कहीं से मालूम हुआ था कि फाल्के का परिवार दुखद दिन व्यतीत कर रहा है, तब जयराज ने पुरस्कार की राशि ले जाकर उनके परिवार को दे दी थी और कहा था कि अब जाकर मुझे सच्चा सुकून मिला है। फाल्के बुनियाद थे और अब सिनेमा अपने पैरों पर ही नहीं खड़ा बल्कि सरपट दौड़ रहा है। बाज-वक्त कभी किसी आयोजन के अवसर पर कृत्रिम सी श्रद्धांजलि सिनेमा जगत के लोग अपने पितृ पुरुषों को देते हैं, ऐसे लोग दामले, फ त्तेलाल को नहीं जानते कि उनका सिनेमा के लिए क्या योगदान रहा है।
सिनेमा को पढऩे के लिए आज की पीढ़ी के पास कोई आदर्श किताब नहीं है। वरिष्ठ फिल्म समीक्षक मनमोहन चड्ढा ने बीस साल पहले हिन्दी में एक किताब हिन्दी सिनेमा का इतिहास लिखी थी जिसे राष्ट्रपति के स्वर्ण कमल पुरस्कार से भारत सरकार ने नवाजा था। यह हिन्दी की सिनेमा के इतिहास को मुकम्मल प्रामाणिकता के साथ बताने वाली अकेली किताब थी जो अब दुर्लभ है। इधर इस पुस्तक के लेखक मनमोहन चड्ढा पुणे फिल्म इन्स्टीट्यूट से पहले डिप्लोमा लेने, फिर अध्यापन करने के बाद देहरादून में रह रहे हैं। उनको सिनेमा की शताब्दी की बेला में शेष बीस सालों के इतिहास को भी इस किताब की पाण्डुलिपि में समाहित कर लेना चाहिए और हिन्दी का कोई प्रकाशक भी इसे प्रकाशित करने के काम को तवज्जो दे। यह जरूरी है।
सार्थक ज्ञान और जानकारियों के अभाव में ही बुद्धिहीनता की खतरतवारें उग जाया करती हैं। सिनेमा पर अज्ञान के साथ बात न हो, इसके लिए सिनेमा के सौ साल के इतिहास का मुकम्मल पुनर्लेखन जरूरी है।
भारत की पहली फिल्म राजा हरिश्चन्द्र बनाने वाले फाल्के का बाद का जीवन बड़ी कठिनाइयों और अभावों में व्यतीत हुआ। उनके नहीं रहने के बाद उनके सामान, उपकरण आदि सब लावारिस हालत में मिले थे। यश चोपड़ा ने हाल ही बातचीत में बताया था कि अभिनेता जयराज को जब दादा साहब फाल्के पुरस्कार मिला था, तब उनको कहीं से मालूम हुआ था कि फाल्के का परिवार दुखद दिन व्यतीत कर रहा है, तब जयराज ने पुरस्कार की राशि ले जाकर उनके परिवार को दे दी थी और कहा था कि अब जाकर मुझे सच्चा सुकून मिला है। फाल्के बुनियाद थे और अब सिनेमा अपने पैरों पर ही नहीं खड़ा बल्कि सरपट दौड़ रहा है। बाज-वक्त कभी किसी आयोजन के अवसर पर कृत्रिम सी श्रद्धांजलि सिनेमा जगत के लोग अपने पितृ पुरुषों को देते हैं, ऐसे लोग दामले, फ त्तेलाल को नहीं जानते कि उनका सिनेमा के लिए क्या योगदान रहा है।
सिनेमा को पढऩे के लिए आज की पीढ़ी के पास कोई आदर्श किताब नहीं है। वरिष्ठ फिल्म समीक्षक मनमोहन चड्ढा ने बीस साल पहले हिन्दी में एक किताब हिन्दी सिनेमा का इतिहास लिखी थी जिसे राष्ट्रपति के स्वर्ण कमल पुरस्कार से भारत सरकार ने नवाजा था। यह हिन्दी की सिनेमा के इतिहास को मुकम्मल प्रामाणिकता के साथ बताने वाली अकेली किताब थी जो अब दुर्लभ है। इधर इस पुस्तक के लेखक मनमोहन चड्ढा पुणे फिल्म इन्स्टीट्यूट से पहले डिप्लोमा लेने, फिर अध्यापन करने के बाद देहरादून में रह रहे हैं। उनको सिनेमा की शताब्दी की बेला में शेष बीस सालों के इतिहास को भी इस किताब की पाण्डुलिपि में समाहित कर लेना चाहिए और हिन्दी का कोई प्रकाशक भी इसे प्रकाशित करने के काम को तवज्जो दे। यह जरूरी है।
सार्थक ज्ञान और जानकारियों के अभाव में ही बुद्धिहीनता की खतरतवारें उग जाया करती हैं। सिनेमा पर अज्ञान के साथ बात न हो, इसके लिए सिनेमा के सौ साल के इतिहास का मुकम्मल पुनर्लेखन जरूरी है।
बुधवार, 10 नवंबर 2010
खिसकती धरती को पकडऩे का जतन
सितारा स्टेटस का बने रहना या खतरे में पडऩा दोनों ही मामले कलाकार के लिए चिन्ताजनक होते हैं। जिसका बना रहता है वह येन केन प्रकारेण उस पर कायम रहना चाहता है और जिसका खतरे में पड़ता है, वह हर तरह से खिसकती जमीन को थामने की कोशिश करता है। छठवें दशक तक मुश्किलें नहीं थीं। शेर और बकरी सभी एक घाट से पानी पी सकते थे। अशोक कुमार के समय में भी दिलीप कुमार, देव आनंद और राजकपूर के लिए जगह थी। इनकी बनी जगहों के बीच भी राजेन्द्र कुमार, जॉय मुखर्जी, शम्मी कपूर, सुनील दत्त, राजकुमार और गुरुदत्त जैसे कलाकार सुरक्षित थे। इन सबके बीच ही मोतीलाल, राजेन्द्रनाथ, जॉनी वाकर, मेहमूद जैसे कलाकारों ने अपना एक स्थान बना रखा था।
अच्छा सिनेमा सबकी जरूरत हुआ करती थी। कोई किसी की रस्सी पर सरौता लगाने का काम नहीं करता था। सबको काम करने का मौका था। सभी श्रेष्ठ फिल्मों के निर्माण में अपनी अहम रचनात्मक भूमिका अदा किया करते थे। राजेश खन्ना युग से एक नया ही मौसम हमारे सामने आया जब सितारे ने सचमुच सितारा स्टेटस हासिल की। वह देर से उठने से लेकर सेट पर देर से आने के लिए भी प्रसिद्ध हुआ। बड़े से बड़े कलाकार उसका इन्तजार किया करते। इतना ही नहीं उसके मूड की भी फिक्र किया करते, मूड के पूरब या पश्चिम होने के अन्देशे को लेकर घबराया करते।
हृषिकेश मुखर्जी ने आनंद और बावर्ची फिल्म राजेश खन्ना के ऐसे ही रवैये के बीच किस तरह पूरी की, ये वो ही जानते थे। तब युवतियों में अपनी अदा और अन्दाज से खन्ना ने अपनी मजबूत जगह बनायी थी। इस जगह को हृषिकेश मुखर्जी, यश चोपड़ा, सलीम-जावेद, प्रकाश मेहरा और मनमोहन देसाई जैसे निर्देशकों, लेखकों ने अमिताभ बच्चन के माध्यम से हिलाने का काम किया। इन्हीं नामों ने रूमानी सिनेमा का राजेश खन्ना युग समाप्त सा कर दिया।
अमिताभ बच्चन गम्भीर, प्रतिबद्ध और अनुशासित होकर फिल्मों में आये। उस समय वे निर्देशकों के नायक थे। सत्तर का दशक अमिताभ बच्चन के उत्थान का दशक रहा। बाद में आमिर, सलमान और शाहरुख आये। अजय देवगन, अक्षय कुमार, हिृतिक रोशन आये। सबके पास अपना-अपना समय था, जितनी श्रेष्ठ फिल्में वे कर सके, जितना लगन से वे अपना किरदार निभा सके, उतना उन्होंने दर्शकों के दिलों में राज किया। आज पहले नम्बर पर रणवीर कपूर का नाम है, दूसरे नम्बर पर नील नितिन मुकेश अपनी जगह टिके रहने का प्रयास कर रहे हैं मगर सभी की जगहें अस्थिर हैं।
ऐसा लगता है कि आने वाले समय में स्थायी तो दूर, कुछ स्थिर समय में भी कोई सितारा अपनी जगह पर बना रहने की सुरक्षा प्राप्त नहीं कर सके गा। दर्शक अब सिनेमा को उसकी समग्रता में परखकर उसकी श्रेष्ठता के मानक तय करने लगा है।
अच्छा सिनेमा सबकी जरूरत हुआ करती थी। कोई किसी की रस्सी पर सरौता लगाने का काम नहीं करता था। सबको काम करने का मौका था। सभी श्रेष्ठ फिल्मों के निर्माण में अपनी अहम रचनात्मक भूमिका अदा किया करते थे। राजेश खन्ना युग से एक नया ही मौसम हमारे सामने आया जब सितारे ने सचमुच सितारा स्टेटस हासिल की। वह देर से उठने से लेकर सेट पर देर से आने के लिए भी प्रसिद्ध हुआ। बड़े से बड़े कलाकार उसका इन्तजार किया करते। इतना ही नहीं उसके मूड की भी फिक्र किया करते, मूड के पूरब या पश्चिम होने के अन्देशे को लेकर घबराया करते।
हृषिकेश मुखर्जी ने आनंद और बावर्ची फिल्म राजेश खन्ना के ऐसे ही रवैये के बीच किस तरह पूरी की, ये वो ही जानते थे। तब युवतियों में अपनी अदा और अन्दाज से खन्ना ने अपनी मजबूत जगह बनायी थी। इस जगह को हृषिकेश मुखर्जी, यश चोपड़ा, सलीम-जावेद, प्रकाश मेहरा और मनमोहन देसाई जैसे निर्देशकों, लेखकों ने अमिताभ बच्चन के माध्यम से हिलाने का काम किया। इन्हीं नामों ने रूमानी सिनेमा का राजेश खन्ना युग समाप्त सा कर दिया।
अमिताभ बच्चन गम्भीर, प्रतिबद्ध और अनुशासित होकर फिल्मों में आये। उस समय वे निर्देशकों के नायक थे। सत्तर का दशक अमिताभ बच्चन के उत्थान का दशक रहा। बाद में आमिर, सलमान और शाहरुख आये। अजय देवगन, अक्षय कुमार, हिृतिक रोशन आये। सबके पास अपना-अपना समय था, जितनी श्रेष्ठ फिल्में वे कर सके, जितना लगन से वे अपना किरदार निभा सके, उतना उन्होंने दर्शकों के दिलों में राज किया। आज पहले नम्बर पर रणवीर कपूर का नाम है, दूसरे नम्बर पर नील नितिन मुकेश अपनी जगह टिके रहने का प्रयास कर रहे हैं मगर सभी की जगहें अस्थिर हैं।
ऐसा लगता है कि आने वाले समय में स्थायी तो दूर, कुछ स्थिर समय में भी कोई सितारा अपनी जगह पर बना रहने की सुरक्षा प्राप्त नहीं कर सके गा। दर्शक अब सिनेमा को उसकी समग्रता में परखकर उसकी श्रेष्ठता के मानक तय करने लगा है।
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