गुरुवार, 13 सितंबर 2012

हिन्दी सिनेमा की भाषा


आलोचनात्मक ढंग से चर्चा में आयी अनुराग कश्यप की दो भागों में पूरी हुई फिल्म गैंग ऑफ वासेपुर से एक बार फिर हिन्दी सिनेमा में सिने-भाषा को लेकर बातचीत शुरू हुई है। एक लम्बी परम्परा है सिनेमा की जिसके सौ बरस पूरे हुए हैं। सिनेमा हमारे देश में आजादी के पहले आ गया था। दादा साहब फाल्के ने हमारे देश में सिनेमा का सपना देखा और उसको असाधारण जतन और जीवट से पूरा किया। भारत में सिनेमा का सच बिना आवाज का था। दादा फाल्के की पहली फिल्म राजा हरिश्चन्द्र मूक फिल्म थी। आलमआरा से ध्वनि आयी लेकिन इसके पहले का सिनेमा मूक युग का सिनेमा कहा जाता है। ध्वनि आने तक परदे पर सिनेमा के साथ पात्रों के संवादों को व्यक्त किए जाने की व्यवस्था होती थी। परदे पर संवादों को लिखकर प्रस्तुत करने की पहल भी दर्शकों को तब बड़ी अनुकूल लगती थी। जब सिनेमा में आवाज हुई तभी संवाद सार्थक हुए। यहीं से पटकथा और संवाद लेखक की भूमिका शुरू होती है।

हमारा सिनेमा संवादों की परम्परा के साथ सीधे ही रंगमंच और तत्समय व्याप्त शैलियों से बड़ा प्रभावित रहा है। सिनेमा से पहले रंगमंच था, पात्र थे, अभिव्यक्ति की शैली थी। बीसवीं सदी के आरम्भ में नाटकों में पारसी शैली के संवाद बोले जाते थे। पृथ्वीराज कपूर जैसे महान कलाकार नाटकों के जरिए देश भर में एक तरह का आन्दोलन चला रहे थे जिससे अपने समय के बड़े-बड़े सृजनधर्मी जुड़े थे। नाटकों, रामलीला, रासलीला में पात्रों द्वारा बोले जाने वाले संवादों का असर सिनेमा में लम्बे समय तक रहा है। सोहराब मोदी, अपने समय के नायाब सितारे, निर्माता-निर्देशक की अनेक फिल्में इस बात का प्रमाण रही हैं। बुलन्द आवाज और हिन्दी-उर्दू भाषा का सामन्जस्य उस समय के सिनेमा की परिपाटी रहा। आजादी के बाद का सिनेमा सकारात्मकता, सम्भावनाओं और आशाओं का सिनेमा था। धरती के लाल, कल्पना और चन्द्रलेखा जैसी फिल्में उस परिवेश की फिल्में थीं। नवस्वतंत्र देश का सिनेमा अपनी तैयारियों के साथ आया था। कवि प्रदीप जैसे साहित्यकार पौराणिक और सामाजिक फिल्मों के लिए गीत रचना कर हिन्दी साहित्य का प्रबल समर्थन कर रहे थे। हिन्दी में सिनेमा बनाने वाली धारा पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, बिहार, दक्षिण और पूर्वोत्तर राज्यों से आयी। निर्माता, निर्देशक, गीतकार, संगीतकार, नायक-नायिका, विभिन्न चरित्र कलाकारों में जैसे श्रेष्ठता की एक श्रृंखला थी। इन सबमें हिन्दी के जानकार और अभिव्यक्ति की भाषा में हिन्दी के सार्थक उपयोग की चिन्ता करने वाले लोगों के कारण सिनेमा को एक अलग पहचान मिली।

राजकपूर, बिमलराय जैसे फिल्मकार छठवें दशक से अपनी एक पहचान कायम करने में सफल रहे थे। राजकपूर के पास अपने पिता का तजुर्बा था। उनके पिता ने उनको एक सितारे का बेटा बनाकर नहीं रखा था बल्कि उनको उन सब संघर्षों से जूझने दिया था, जो एक नये और अपनी मेहनत से जगह बनाने वाले कलाकार को करना होते हैं। राजकपूर संगीत से लेकर भाषा तक के प्रति गहरा समर्पण रखते थे। आह, आग, आवारा, श्री चार सौ बीस आदि फिल्मों में हिन्दी के संवादों में कहीं कोई समस्या नहीं है। इधर बिमलराय जैसे फिल्मकार ने बंगला संस्कृति और भाषा से श्रेष्ठ चुनकर हिन्दी के लिए काम किया और अपने समय का श्रेष्ठ सिनेमा बनाया। वे नबेन्दु घोष जैसे लेखक, पटकथाकार, हृषिकेश मुखर्जी जैसे सम्पादक जो कि आगे चलकर बड़े फिल्मकार भी बने और अनेक महत्वपूर्ण फिल्में बनायीं, इन सबके साथ मुम्बई में काम करने आये थे। उनकी बनायी फिल्में हमराही, बिराज बहू, दो बीघा जमीन, परिणीता, देवदास, सुजाता, बन्दिनी आदि मील का पत्थर हैं। हम यदि इन फिल्मों को याद करते हैं तो हमें दिलीप कुमार, बलराज साहनी, नूतन, सुचित्रा सेन, अशोक कुमार ही याद नहीं आते बल्कि मन में ठहरकर रह जाने वाले दृश्य, संवाद और गीत भी यकायक मन-मस्तिष्क में ताजा हो उठते हैं। हिन्दी सिनेमा की भाषा को बचाये रखने की कोशिश पहले नहीं की जाती थी क्योंकि सब कुछ स्वतः ही चला करता था। हिन्दी फिल्मों में हिन्दी को कोई खतरा नहीं था। बाद में चीजें बदलना शुरू हुई। जो लोग इस बदलाव से जुड़े थे और इसका समर्थन कर रहे थे उनका मानना यही था कि नये जमाने के साथ सिनेमा को भी अपनी एक भाषा की जरूरत है। दर्शक एकरूपता से उकता गया है जबकि ऐसा नहीं था। दर्शक समाज इतना बड़ा समूह है कि वह स्तरीयता की परख करना जानता है और यकायक भाषा में भोथरा किया जाने वाला नवाचार उसकी पसन्द नहीं हो सकती। ठीक है, पीढि़याँ आती हैं, जाती हैं, अपनी तरह से वक्त-वक्त पर अपनी दुनिया भी गढ़ी जाती है लेकिन अपनी सहूलियत और बदलाव के लिए मौलिकता और सिद्धान्तसम्मत चीजों को विकृत किया जाये, यह बात गले नहीं उतरती। 

यह एक अच्छी बात रही है कि हिन्दी के साथ उर्दू का समावेश करके सिनेमा को एक नया प्रभाव देने की कोशिश की गयी, वह स्वागतेय भी रही क्योंकि उर्दू तहजीब की भाषा है, उसका अपना परिमार्जन है। फिल्मों में संवाद लेखन करने वाले, गीत लेखन करने वाले उर्दू के साहित्यकार, शायरों का भी लम्बे समय बने रहना और सफल होना इस बात को प्रमाणित करता है कि दर्शकों ने इस नवोन्मेष का स्वागत किया। इसी के साथ-साथ हिन्दी के साथ निरन्तर बने रहने वाले लेखकों, पटकथाकारों और निर्देशकों ने अपनी एक धारा का साथ नहीं छोड़ा। अब चूँकि सत्तर के आसपास एक टपोरी भाषा भी हमारे सिनेमा में परिचित हुई जिसका एक विचित्र सा उपसंहार हम मुन्नाभाई एमबीबीएस में देखते हैं, उसने सिने-भाषा का सबसे बड़ा नुकसान करने का काम किया। उच्चारण, मात्रा और प्रभाव सभी स्तर पर इस तरह की बिगड़ी हिन्दी लगभग चलने सी लगी। हालाँकि साहित्यकारों में मुंशी प्रेमचन्द से लेकर अमृतलाल नागर, नीरज, शरद जोशी, फणिश्वरनाथ रेणु आदि का सरोकार भी हिन्दी सिनेमा से जुड़ा मगर इन साहित्यकारों का हम ऐसा प्रभाव नहीं मान सकते थे कि उससे सिनेमा का समूचा शोधन ही हो जाता। वक्त-वक्त पर ये विभूतियाँ हिन्दी सिनेमा का हिस्सा बनीं, नीरज ने देव आनंद के लिए अनेकों गीत लिखे, शरद जोशी ने फिल्में और संवाद लिखे, रेणु की कहानी पर तीसरी कसम बनी, नागर जी की बेटी अचला नागर ने निकाह से लेकर बागबान जैसी यादगार फिल्में लिखीं। मन्नू भण्डारी और राजेन्द्र यादव की कृतियों पर फिल्में बनी, पण्डित भवानीप्रसाद मिश्र दक्षिण में लम्बे समय एवीएम के लिए लिखते रहे लेकिन सकारात्मक विचारों की विरुद्ध प्रतिरोधी विचार ज्यादा प्रबल था लिहाजा वही काबिज हुआ। बच्चन जैसे महान कवि के बेटे अमिताभ बच्चन तक मेजर साब फिल्म में सेना के अधिकारी बने अपने सीने पर जसवीर सिंह राणा की जगह जसविर सिंह राणा की नेम-प्लेट लगाये रहे, लेकिन एक बार भी उन्होंने निर्देशक को शायद नहीं कहा होगा कि जसविर को जसवीर करके लाओ। 

सत्तर के दशक में जब नये सिनेमा के रूप में सशक्त और समानान्तर सिनेमा का प्रादुर्भाव हुआ तब हमने देखा कि एक तरफ से श्याम बेनेगल और गोविन्द निहलानी जैसे फिल्मकारों ने अपने सिनेमा में भाषा और हिन्दी के साथ-साथ उच्चारणों की स्पष्टता पर भी ध्यान दिया। अगर कहूँ कि निश्चय ही उसके पीछे स्वर्गीय पण्डित सत्यदेव दुबे जैसे जिद्दी और गुणी रंगकर्मी थे तो कोई अतिश्योक्ति न होगी। दुबे जी हिन्दी भाषा के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने मुम्बई में हिन्दी रंगकर्म की ऐसी अलख जगायी कि अपने काम से अमर हो गये। वे हिन्दी की शुद्धता और उसके उच्चारण तक अपनी बात मनवाकर रहते थे। यही कारण है कि मण्डी, जुनून, निशान्त, अंकुर, भूमिका जैसी फिल्में हमें इस बात का भरोसा दिलाती हैं कि कम से कम एक लड़ाई भाषा के सम्मान के लिए प्रबुद्ध साहित्यकारों, लेखकों और कलाकारों द्वारा जारी रखी गयी। यह काम फिर उनके समकालीनों में सुधीर मिश्रा, प्रकाश झा, केतन मेहता, सईद अख्तर मिर्जा ने भी किया। बी.आर. चोपड़ा की महाभारत के संवाद लेखन में राही मासूम रजा के योगदान को सभी याद करते हैं। इसी तरह रामानंद सागर ने भी रामायण धारावाहिक बनाते हुए उसके संवादों पर विशेष जोर दिया। भारत एक खोज धारावाहिक भी भाषा के स्तर पर एक सशक्त हस्तक्षेप माना जाता है। तीसरी कसम, सद्गति, सारा आकाश जैसी फिल्में साहित्यिक कृतियों पर कालजयी निर्माण के रूप में जाने जाते हैं। उपन्यासकार गुलशन नंदा का उल्लेख भी यहाँ इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वे सामाजिक उपन्यासों के एक लोकप्रिय लेखक थे और उनकी कृतियों पर अपने समय में सफल फिल्में बनीं जिनमें फूलों की सेज से लेकर काजल, सावन की घटा, पत्थर के सनम, नीलकमल, कटी पतंग, खिलौना, शर्मीली, नया जमाना, दाग, झील के उस पार, जुगनू, जोशीला, अजनबी, महबूबा आदि शामिल हैं। 

बिमल राय के सहायक तथा उनकी फिल्मों में सम्पादक रहे प्रख्यात फिल्मकार हृषिकेश मुखर्जी का सिनेमा भी भाषा एवं हिन्दी के स्तरीय प्रभाव के अनुकूलन का सिनेमा रहा है। उन्होंने सत्यकाम, अनाड़ी, अनुपमा, आशीर्वाद, आनंद, मिली, चुपके-चुपके, खट्टा-मीठा, गोलमाल जैसी अनेक उत्कृष्ट फिल्में बनायीं। स्मरण करें तो इन सभी फिल्मों में भाषा के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों को बड़े महत्व के साथ पेश करने काम किया गया है। हाँ, चुपके-चुपके में हिन्दी भाषा-बोली को हास्य के माध्यम से एक कथा रचने में हृषिदा को बड़ी सफलता मिली। फिल्म का नायक प्यारे मोहन जो कि परिमल त्रिपाठी से इस नकली चरित्र में रूपान्तरित हुआ है, एक-एक शब्द हिन्दी में बोलता है, वाक्य भी उच्च और कई बार संस्कृतनिष्ठ हिन्दी में बोलता है। ऐसा करके वह अपनी पत्नी के जीजा जी को परेशान किया करता है, आखिर क्लायमेक्स में रहस्य खुलता है और मजे-मजे में फिल्म खत्म हो जाती है। चलते-चलते हम शुद्ध हिन्दी में लिखा फिल्म हम, तुम और वह का एक गाना भी याद करते हैं, प्रिय प्राणेश्वरी, हृदयेश्वरी, यदि आप हमें आदेश करें तो प्रेम का हम श्रीगणेश करें........................
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बुधवार, 15 अगस्त 2012

अन्तत: टायगर परदे पर देखा गया...........

एक था टायगर को लेकर दर्शकों में बड़ी जिज्ञासाएँ थीं, बॉडीगार्ड के बाद सलमान खान की फिल्म का बेसब्री से इन्तजार किया जा रहा था। फिल्म प्रदर्शन के सुनिश्चित दिन शुक्रवार की परिपाटी से अलग दो दिन पहले स्वतंत्रता दिवस के दिन इस फिल्म को रिलीज किया गया है। दो कार्यदिवस के बाद फिर ईद तक तीन दिन छुट्टी के हैं। आज सिनेमाघर के आँगन का जो हाल देखा उससे लग गया है कि एक सप्ताह में फिल्म लागत पार करके मुनाफे की भी अच्छी स्थिति प्राप्त कर लेगी।

भोपाल का रंगमहल सिनेमा सुबह से गुलजार है, परिसर में खासी भीड़ और अरसे बाद अनुशासन बनाने के लिए पुलिस की लाठियाँ भी किसी सिनेमाघर में बाहर निकलीं, सौ-पचास लोग सिनेमाघर के बाहर खड़े रहकर भीड़ के अचम्भे को देख रहे हैं, रह-रहकर सिनेमाघर के माथे पर लगे फिल्म के पोस्टर पर सलमान खान को देखकर फिर भीड़ की तरफ निहारते हुए। भई, गजब का आकर्षण इस हीरो के प्रति। सिनेमाघरों में ऐसी भीड़ दुर्लभ है क्योंकि ऐसा क्रेज केवल इसी सितारे के लिए आकर इकट्ठा होता है।

दर्शक बस यह जानता है कि यह सलमान खान की फिल्म है। प्रभाव ऐसा है, कि यशराज बैनर भी दबा हुआ है, निर्देशक कबीर खान का नाम किसी को जानने की जरूरत नहीं। ज्यादा से ज्यादा इतना पता कर लिया कि कैटरीना कैफ हीरोइन है। कहानी भारत और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों रॉ और आय एस आय के दो प्रतिनिधियों की प्रेमकथा है। शुरूआत में नैरेशन में जब कहा जाता है कि देश की सुरक्षा के सवाल पर बहुत सी सच्चाइयाँ छुपा दी जाती हैं तब हम सोचते हैं कि पता नहीं फिल्म में ऐसी कौन सी सच्चाई देखने को मिलेगी जिसको पूरा या आधा हम जान पायेंगे लेकिन वह किस्सा मोहब्बत का होता है। जोया, कैटरीना कैफ आय एस आय और टायगर रॉ के प्रतिनिधि होते हैं।

कबीर खान एक कल्पनाशील और काबिल निर्देशक हैं। सलमान खान परदे पर पहली बार किस तरह और कैसे आये, सबसे बड़ा दिमाग निर्देशक को इसके लिए लगाना होता है। पन्द्रह मिनट का लम्बा सीन जिसमें हीरो स्पायडर मैन की तरह दीवार पर चढ़ता, जम्प करता है, खलनायकों को तबीयत से मारता है और फिर सबके धराशायी होने पर गमछा लपेट कर शान से चल देता है, ओफ्ओह...........हॉल में दर्शक इतना हल्ला करते हैं, सीटियाँ और शोर मचाते हैं कि संवाद सुनायी ही नहीं देते। यह विकट जादू है जो अरसे बाद किसी सितारे को हासिल हुआ है, परदे पर सलमान को देखकर दर्शक जैसे सुध-बुध खो देता है।


एक था टायगर की पटकथा रोचक है। हालाँकि कहानी की तार्किकता कहीं-कहीं भटकती दिखायी देती है। कथ्य कई बार गौण होकर समाप्त हो जाता है मगर फिल्म की गति तेज होने से तुरन्त दर्शक ऐसी विसंगतियों को नहीं जान पाता। मोहब्बत के लिए हर जोखिम उठाया जा सकता है, इसे फिल्म में हम हर पन्द्रह मिनट बाद देखते हैं। टायगर को उसके बॉस शेनॉय, गिरीश कर्नाड एक ऑब्जर्वेशन मिशन सौंपते हैं जिसमें उन्हें एक शोधकर्ता, रोशन सेठ की गतिविधियों को देखकर रिपोर्ट करना है, लेकिन वहाँ से कहानी मोहब्बत की राह पर चल पड़ती है। यह फिल्म हमें हाँगकांग, डबलिन, इस्तांबुल, बैंकाक, हवाना से दिल्ली तक की सैर कराती है, खूबसूरत देश, जबरदस्त एक्शन यह सब हम असीम मिश्रा की सिनेमेटोग्राफी से बड़े प्रभावी ढंग से देख पाते हैं। फिल्म का अन्त कल्पनातीत है। जिस समय क्लायमेक्स में दर्शक किसी सशक्त और सराहनीय अन्त की उम्मीद लगाकर बैठा हो, उस वक्त फिर हम एक नैरेशन सुनते हैं जिसमें बता दिया गया है कि टायगर और जोया अपनी दुनिया बनाकर किसी अनजान मुल्क में सुकून से रह रहे हैं।

अब यह एक अजीब सी विवशता ही कहिए कि सलमान केन्द्रित फिल्म में सलमान के काम के लिए क्या लिखा जाये, क्योंकि उनकी अपनी खूब एक्शन उनके अनुकूल है, इससे कमतर हो भी नहीं सकता। डाँस में वे खूब पसन्द किए जाते हैं। एक खासियत उनकी लगातार यह बढ़ रही है कि वे हिन्दी बहुत अच्छी बोलते हैं और संवादों में अच्छे शब्दों का प्रयोग होता है। उनकी फिल्में देखने परिवार आये इसलिए इन्टीमेट सीन भी उनकी फिल्मों में वैसे नहीं होते जैसे आजकल दूसरी फिल्मों में बहुत आम हुआ करते हैं। कैटरीना के लिए बस इतना कह देना कि वे सुन्दर लगती हैं या गुडिय़ा की तरह दीखती हैं, काफी नहीं है, इस फिल्म में उन्होंने बहुत अच्छे एक्शन सीन किए हैं। रणवीर शौरी का काम अच्छा है, गिरीश कर्नाड और रोशन सेठ जैसे जीनियस सितारे हैं मगर रोशन सेठ के लिए अच्छी भूमिका नहीं लिखी जा सकी।


बहरहाल, एक था टायगर उस तरह से सुपरहिट होगी, जिसका सीधा सरोकार बाजार से है। आपके पास इस फिल्म की ऐसी समीक्षा करने का कोई आधार बचता नहीं जिसमें आप तार्किकता की आधारभूत संरचनाओं में इसे परखो। हाँ यह समझ में नहीं आया कि फिल्म का सबसे हिट गाना माशाअल्लाह फिल्म के अन्त में उस वक्त क्यों रखा गया जब शेष टायटल दिखाये जा रहे होते हैं क्योंकि सिनेमाघर वाला बाहर जाने का रास्ता दिखाने के लिए गेट खोल देता है और फिल्म बन्द कर देता है। यह एक बड़ी खामी है....................

मंगलवार, 31 जुलाई 2012

प्रेम का उदय

परिपक्व रंगकर्मियों के काम का हमेशा आकर्षण रहता है। सरोज शर्मा को भोपाल के रंगजगत में श्रेष्ठ रंगकर्म करते हुए लगभग तीन दशक से लगातार देखने के मौके आये हैं। पिछले कुछ समय से वे जहाँ रह रही हैं, वहाँ पास-पड़ोस के बच्चों के साथ उन्होंने अच्छे रंगप्रयोग किए हैं वहीं शहर के प्रतिभाशाली युवा कलाकारों के साथ उनका काम इन अर्थों में मायने रखता है कि उनके माध्यम से एक अच्छी और प्रतिबद्ध पीढ़ी तैयार होगी जो कम से कम जल्दी भटकेगी नहीं और न ही बड़ी ही जल्दी अपने आपको एकदम पारंगत ही मान लेगी। यह मुंशी प्रेमचन्द की जन्मशताब्दी का साल है। यह स्तुत्य है कि उनकी कृतियों को नाटककारों ने इस विशेष साल में मंच पर लाने का उपक्रम शुरू किया है। 

सरोज शर्मा ने भी आज भारत भवन में प्रेम का उदय नाटक का मंचन किया जिसका पूर्वाभ्यास वे तकरीबन डेढ़ माह से कर रही थीं। नाटक की कहानी यायावर बंजारों की दुनिया को नजदीक से देखती है। संदिग्ध गतिविधियों से हमेशा आरोपित और अपराध में संलिप्त जीवन इस दुनिया की नियति रही है मगर उसके बावजूद पुरुषार्थ और जोखिम से पीछे न हटने वाले लोग अपने भीतर एक अच्छी और अनुकूल जिन्दगी की कल्पना भी करते हैं और वैसा जीवन जीना भी चाहते हैं। इस नाटक के नायक भोंदू और उसकी पत्नी बंटी का जीवन भी ऐसा ही है। बंटी अपने पड़ोस के सुख और आनंद से इसलिए आक्रान्त है क्योंकि उसका पति गलत रास्ते पर जाने से डरता है। एक स्त्री की ईष्र्याएँ और असन्तुष्टियाँ कई बार घातक नहीं होतीं मगर उसको खुशी देने और सुख पहुँचाने के लिए दुस्साहस करने वाला पुरुष राह भटक जाता है। लेकिन इसी स्त्री का मन बदलता है और वह दुर्घटनाओं से खुशकिस्मती से बच रह गये जीवन को सँवारती है, अपने पुरुषार्थ से। प्रेम का उदय यही है। 

इस नाटक में मंच परिकल्पना और आकल्पन बहुत प्रभावित करता है। अनूप जोशी बंटी और अनिल गायकवाड़ को इसका श्रेय है। दूसरा पक्ष संगीत का है जो रंगक्षेत्र में लक्ष्मीनारायण ओसले और अनिल संसारे की मौलिक और ऊर्जावान आमद के प्रति बड़ी आशाएँ जगाता है। नाटक में बहुत ज्यादा किरदार नहीं हैं, छोटी सी दुनिया और छोटा सा पड़ोस और दुनिया-समाज को पथभ्रष्ट न होने देने वाली, उनकी निगरानी करने वाली संस्था पुलिस। इसी में कलाकार योगिता यादव चिढ़ी हुई पत्नी, सबक सीखने वाली पत्नी और जीवन को बदलने वाली पत्नी के रूप में ज्यादा प्रभाव छोड़ती हैं। रूपेश तिवारी ने पति भोंदू की भूमिका निभायी है जिसकी अपनी सीमाएँ हैं मगर किरदार के रूप में उन्हें संवादों में नुक्ता लगाने की जरूरत नहीं है। जमीनी किरदारों को उस धरातल की ही भाषा बोलनी चाहिए। बूढ़ा बाबा, चरवाहा, पड़ोसन, बच्चे सबमें बड़ा रंग और जीवन्तता है, बच्चे तो बेडऩी बने अनिल के नाच में जिस तरह भागीदार होते हैं, मजा देते हैं, सही मायने में वे ज्यादा सहजता से नाटक का हिस्सा बनते हैं। 

निर्देशक के रूप में सरोज शर्मा का यह पूरा क्राफ्ट अच्छे ढंग से सम्पादित किया हुआ है हालाँकि उन्होंने बंजारा जीवन और बुन्देली लोकभाषा को अपने ढंग से समाहित किया है। सूत्रधार बहुत ज्यादा जरूरी नहीं लगते और जरूरत है तो केवल योगेश परिहार काफी हैं। समग्रता में नाटक अच्छा है, अच्छा तरश जायेगा, एक-दो प्रदर्शन यदि इसके और तत्काल ही हो जायें।

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

गैंग ऑफ वासेपुर : संक्षेप में एक पुनर्व्याख्या

 गैंग ऑफ वासेपुर देखना अपने आपमें एक बड़ा रोमांचक अनुभव है। सिनेमा देखते हुए यद्यपि उसकी विवरणात्मकता में जाने की जहमत कोई उठाना नहीं चाहता और जिस तरह से एक सेकेण्ड में बत्तीस फ्रेम निगाहों से गुजर जाते हैं, हमारी चेतना उससे कहीं ज्यादा आगे जाकर सिनेमा को देखने का काम पूरा कर डालती है। यही कारण है कि हमारे पास व्यक्त करने के लिए प्रतिक्रिया अमूमन होती ही नहीं। हम केवल शुभकामनाएँ देने और खेद व्यक्त करने की मुद्रा में ही हमेशा बने रहते हैं। यह तो गनीमत है कि इस पिछले एक दशक में लगातार सृजनात्मक परिश्रम करते हुए टिग्मांशु धूलिया, अनुराग कश्यप और पीयूष मिश्रा जैसे फिल्म सर्जकों ने अपनी जगह दिखाने और उस जगह पर आपकी तवज्जो को लाकर ठहरा देने का काम किया है वरना हम सस्ती और रंगीन इमरती खा-खाकर अपना हाजमा खराब कर चुके हैं मगर चटखारे लेने से बाज नहीं आ रहे। 

व्यक्तिश: मुझे यही लगता है कि एक सशक्त फिल्म को किस तरह गढऩा कठिन होता है, हरेक के लिए यह उतना सहज भी नहीं। अच्छी फिल्मों का रास्ता कठिन है। अच्छी फिल्मों के बनाने वालों का रास्ता भी उतना ही बल्कि उससे ज्यादा कठिन है। अनुराग कश्यप को कई बरस लग गये गैंग ऑफ वासेपुर तक आने में और यहाँ वे अल्प विराम की मुद्रा में हैं, अगले महीने वे इसी फिल्म का दूसरा भाग प्रदर्शित करेंगे। हिन्दी सिनेमा में उन्होंने यह प्रयोग बड़ी तैयारी के साथ किया है। इस फिल्म का पहला भाग देखते हुए जब हम अन्तिम दृश्य से प्रत्यक्ष होते हैं तो यह जानने की विकट जिज्ञासा रहती है कि शाहिद खान और रामाधीर सिंह की पुरानी दुश्मनी कहाँ जाकर खत्म होगी? प्रतिशोध की मानसिकता भयावह है। सरदार खान अपने पिता शाहिद खान की असमय मौत का बदला लेना चाहता है, वो कहता है, कह कर..................यही वाक्य एक पूरे गाने में भी आया है, ठीक उसी तरह जैसे प्रवृत्तियाँ अनिष्ठ गढऩे को हर दम आतुर हों। अमरीकन फिल्म गॉडफादर का नायक भी उस व्यक्ति से अपना बदला तब भी लिए बगैर नहीं रहता जब वो बीमार, लाचार और अतिवृद्ध हो चुका है क्योंकि बचपन से उसकी आँखों में उस शख्स की तस्वीर है और वह अपने पिता-माँ के साथ हुई हिंसा का एकमात्र गवाह है। 


 पूरी फिल्म में हिंसा और वीभत्स परिणाम हैं, जो बेहद नजदीक से दिखाये गये हैं। यह फिल्म दर्शक से बड़े साहस की मांग भी करती है। देखा जाये तो पहली बार हिन्दुस्तानी दर्शक एक वयस्क फिल्म देख रहा होता है, गैंग ऑफ वासेपुर देखते हुए। यह फिल्म हमारी वयस्कता की भी परीक्षा लेती है। हमें यहाँ किसी भी किस्म की संवेदना या नाटकीयता की जरा भी उम्मीद नहीं करनी चाहिए। हमें बार-बार लगता है कि हम सच के सामने खड़े हैं। सरदार खान के अपनी बीवी नगमा के साथ अन्तरंग दृश्य और चारपायी पर साथ लेटे हुए की जाने वाली बातें दरअसल उस पूरे के पूरे गोपनीय स्थान में हमें साँस रोककर खड़ा कर देती हैं जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की होती। जल्दी-जल्दी गर्भवती हो जाने से चिढ़ता हुआ सरदार और नगमा के संवाद बड़े चटख हैं। कुछ बातों पर हँसी भी आती है मगर दरअसल निजता के उस समय की वह बड़ी विडम्बना भी है। सरदार खान का एक और औरत दुर्गा से रिश्ते बना लेना, खासकर उसके उपक्रम सहज पुरुषवृत्ति का ही परिचायक है। सरदार खान पर अन्तिम दृश्य में हमले का प्रारब्ध यही स्त्री बनती है। हम यहाँ आकर दूसरे भाग के लिए ठहर अवश्य जाते हैं लेकिन एक साथ अनेक प्रश्र कौंधने लगते हैं। 

इस फिल्म के लिए वास्तव में अनुराग कश्यप, टिग्मांशु धूलिया जिन्होंने रामाधीर सिंह की भूमिका निभायी है और सम्प्रेषक-सूत्रधार पीयूष मिश्रा जो कि फरहान की भूमिका में है, तीनों को सलाम करना चाहिए। दिलचस्प है कि टिग्मांशु निर्देशक हैं मूल रूप से और हाल ही में पान सिंह तोमर से वे भी अपनी एक दशक की सृजन यात्रा का चरम पेश कर गये हैं। अनुराग कश्यप ने उन्हें रामाधीर सिंह के किरदार के लिए चुना, यह अहम है। एक निर्देशक क्या चाहता है, यह एक निर्देशक से बेहतर कौन समझ सकता है। टिग्मांशु का किरदार इसीलिए पूरी फिल्म में एक तरह का प्रतिरोधी प्रभाव बनाये रखता है। पीयूष मिश्रा इस फिल्म के बहुत कुछ हैं, सूत्रधार, किरदार, गीतकार, संगीत परिकल्पक और गायक भी। इन आयामों में बड़ी आजादी के साथ वो पूरे परिवेश के साथ सार्थक न्याय करते हैं। 


 सरदार खान मनोज वाजपेयी, शाहिद खान जयदीप अहलावत, नगमा खातून रिचा चड्ढा, दुर्गा रीमा सेन अपनी भूमिकाएँ किरदार की तरह ही निबाहते हैं। वास्तव में गैंग ऑफ वासेपुर के रूप में हम ऐसा यथार्थ देखते हैं जो जितना कल्पनातीत है उतना ही हमारे संज्ञान से अछूता भी नहीं रहा है लेकिन न तो हम वहाँ पहुँच पाये और न ही अब तक कोई आइना लेकर हमारे सामने खड़ा हुआ। अब निगाहें फिल्म के दूसरे भाग पर टिकी हैं, यदि इसी प्रवाह और वातावरण में हम उस भाग को देखते हुए वही धारणाओं को बनाये रख सके जो इस फिल्म से बनी है तो निश्चित ही अनुराग कश्यप हमारे समय के एक असाधारण फिल्मकार के रूप में स्थापित होंगे।

रविवार, 8 जुलाई 2012

बालू शर्मा की शिल्प सर्जना






बालू शर्मा यह उनका प्रचलित नाम है, वैसे वे बालकृष्ण शर्मा हैं। चिर-परिचित शिल्पकार हैं। आदमकद शिल्प सर्जना में उनका काम इधर लगभग अपनी मौलिकताओं के साथ उनके ही पास है। दूसरे उदाहरण एकदम से ध्यान में नहीं आते। कुछ वर्षों का उनसे परिचय प्रगाढ़ आत्मीयता में तब्दील हो गया है। वे उज्जैन में रहते हैं, महाकाल की नगरी। वहीं से उनकी रचनात्मकता विस्तार दूर देश तक हुआ है। मालवा अंचल का यह प्रमुख शहर अपनी विलक्षण विरासत के कारण दुनिया में जाना जाता है। 

सृजनात्मकता साहित्य से लेकर अभिव्यक्ति के व्यापक आयामों का स्पर्श यहाँ देशज खूबियों के साथ करती है। पेंटिंग और शिल्पकला में यहाँ एक लम्बी परम्परा है जो वाकणकर से श्रद्धेय होती है। उसका विस्तार बड़ा है। आंचलिकता और उसके सारे रंग यहाँ सर्जना में दिखायी देते हैं। बालू शर्मा के पास अपनी अनूठी कल्पनाशीलता और रंग-समझ है। उनकी दृष्टि जीवन, रहन-सहन, हमारी उत्सवप्रियता, मांगलिक सरोकार और उसमें सदियों जीने और डूबे रहने वाली उत्कण्ठा तक जाती है। उनके शिल्पों को ध्यान से देखो, अकेले खड़े हुए या एक साथ समूह में, अलग-अलग अनुभूतियाँ छोड़ते हैं। हम उनमें मनुष्यों को ठहरे हुए देखते हैं, जो शायद उतनी देर हमारे लिए ही ठहरे हुए होते हैं। बाद में अकेले में वे जरूर कोलाहल करते होंगे, आपस में बातचीत या हँसी-खुशी बाँटते होंगे। हो सकता है दुख भी बाँटते हों लेकिन यह सब उनकी दुनिया का हिस्सा है। 

बालू शर्मा के ये शिल्प देखकर इससे भी ज्यादा विचार आते हैं। प्राय: शिल्पों का आकार हमारे कद के बराबर ही है लेकिन उनको गहनता से देखो और उनमें एक-एक मनुष्य, पुरुष या स्त्री की कल्पना करो तो उनके कद का अनुमान लगाना कठिन होता है। कलाकार ने इनको बनाते हुए पता नहीं यह सब सोचा होगा कि नहीं लेकिन इतना तो है कि बालू शर्मा अपने बचपन, मेले, तीज-त्यौहार और जीवन के साथ-साथ सामने से होकर गुजर गये मगर खुद में गहरे ठहर गये लोगों को भी अपनी सर्जना का आधार बनाया है। वे किरदारों को गढ़ते हैं, यह कहा जाये तो शायद अतिश्योक्ति न हो। उनके कलाकर्म को हम दो अलग-अलग रंगतों में देखते हैं, एक स्याह सलेटी रंग और दूसरा रंग-बिरंगे परिधान, गहने, श्रृंगार प्रसाधन, पगड़ी, धोती से भरे-पूरे लोग। बहुत सारे शिल्प उन्होंने बनाये हैं, नवाचार के साथ बनाया करते हैं। 


 उनके शिल्प विभिन्न कला संग्रहालयों में संग्रहीत हैं जिनमें भारत भवन, कालिदास अकादमी, ललित कला अकादमी इत्यादि शामिल हैं। बालू शर्मा अपने इस विशिष्ट काम के लिए नेशनल अवार्ड भी प्राप्त कर चुके हैं। वे लेकिन अपनी इन उपलब्धियों से बेफिक्र लगते हैं, खुद कभी बताते-गिनाते भी नहीं। एक कलाकार जो अपने आप में इतना शान्त और गम्भीर है वो दरअसल कितने मुखर और हमें कम से कम अपरिचित दिखायी देने वाले शिल्पों और चेहरों में कितनी कथाएँ समावेशित कर दिया करता है, यह विस्मय का विषय है। हालाँकि बालू इन सारी धारणाओं और मनन-चिन्तन से परे हमेशा जमीन पर बने रहते हैं जो कि उनकी खूबी है।

रविवार, 17 जून 2012

चिडिय़ाघर के बाबू जी राजेन्द्र गुप्ता



सब चैनल पर सप्ताह के पहले पाँच दिन प्रसारित होने वाले दो-तीन दिलचस्प धारावाहिकों में से एक चिडिय़ाघर को इन दिनों अनिल दुबे निर्देशित कर रहे हैं। अनिल एक तजुर्बेकार निर्देशक और पटकथाकार हैं, जिन्हें धारावाहिकों और सिनेमा का लम्बा अनुभव रहा है। चिडिय़ाघर की संरचना बड़ी रोचक है। परिवार के मुखिया बाबूजी हैं, उनके तीन बेटे हैं, दो बहुए हैं, एक पोता है और एक सेवक है जिसका नाम है गधा प्रसाद। घर का नाम चिडिय़ाघर इसलिए है क्योंकि बाबूजी की पत्नी का नाम चिडिय़ा था। गधा प्रसाद छोटी सी उम्र में उनके साथ मायके से आ गया था तब से यहीं का होकर रह गया। वह भी परिवार का हिस्सा है। बुद्धि और प्रखरता में उसका हाथ तंग है मगर वह अद्भुत रूप से संवेदना और आत्मीयता का ऐसा धनी है जो अपनी क्षमताओं, स्वभाव और सीमाओं में भी सभी को स्वीकार्य ही नहीं है बल्कि इस तरह जुड़ा हुआ है कि उसको अलग करके देखा ही नहीं जा सकता।

राजेन्द्र गुप्ता, वरिष्ठ रंगकर्मी और सिनेमा तथा टेलीविजन के अत्यन्त दक्ष कलाकार हैं, वे चिडिय़ाघर के मुखिया बाबूजी के रूप में पूरे घर को एकसूत्रता में बांधकर रखते हैं। वो पूरे परिवार को आज भी नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ाते हैं। दिलचस्प यह है कि परिवार के पूरे सदस्य उनकी कक्षा में उपस्थित होकर उनसे सरोकारों को समझते हैं, अपने समझ-नासमझी के प्रश्र भी करते हैं, जिनके समाधान बाबूजी सहजता से और कई बार किं कर्तव्य विमूढ़ होकर करते हैं। बहरहाल इस धारावाहिक को देखना रोचक अनुभव है। 

चिडिय़ाघर में गधा प्रसाद एक अलग तरह का आकर्षण है। ढीला-ढाला पायजामा और बुशर्ट पहले, हाथ से हाथ बांधे, पेट पर चढ़ाये गधा प्रसाद बाबूजी की एक तरह से ऊर्जा ही है। बाबू जी कभी गधा प्रसाद के बगैर दिखायी नहीं देते। अभी पिछले भागों में जब एक छुटभैया नेता ने बाबूजी को थाने में बन्द करवा दिया था, तब अपना झोला उठाकर गधा प्रसाद थाने पहुँच गया था उनको छुड़ाने लेकिन हुआ यह कि पुलिस ने उसे भी बाबूजी के साथ बन्द कर दिया। बाबूजी और गधा प्रसाद के आपसी संवाद ध्यान से सुनने वाले होते हैं। कई बार अपनी सीमाओं में भी गधा प्रसाद ऐसी बात कह जाता है जो बाबूजी को हैरान कर देती है, उसी सिधाई में भी जीवन में उसके पिछड़े होने की कसक और दर्द कई बार इस तरह नजर आता है कि वो मन को छू जाता है। वह अपनी सीमाओं में भी परिवार के प्रति अपने समर्पण और निश्छल प्रेम के ऐसे प्रमाण अपनी बातों से देता है जो किसी समझदार की भी क्षमताओं के नहीं होते। जीतू शिवहरे गधा प्रसाद के किरदार को बखूबी निबाह रहे हैं।

चिडिय़ाघर के सदस्यों के विभिन्न स्वभाव हैं। बड़ा बेटा घोटक है जो रेल्वे की नौकरी करता है, उसके दिमाग में रेल और स्टेशन की दुनिया एक सुरूर सी रहती-बहती है। उसकी पत्नी खूबसूरत है, परिवार को जोडक़र रखने में अपनी भूमिका बखूबी निबाहती है मगर वो भी आखिर चिडिय़ाघर रूपी एक घर का हिस्सा है जहाँ सभी अपनी-अपनी झक को बेपरवाही के साथ जिया करते हैं। एक बेटा गोमुख है जो पढ़ाता है, उसकी पत्नी मयूरी को नाचने का शौक है, कान में खूबसूरत झुमके पहनती है और प्राय: खुद को नृत्य मुद्रा में होने के एहसासों मे बड़ी मोहक अदा से अपने सिर को इस तरह झकझोरती है कि झुमके बज उठते हैं। सबसे छोटा बेटा और पोता भी इसी जीवन का अनूठा हिस्सा हैं।

इस धारावाहिक की खूबी इसके प्रति सुरुचि के साथ आकर्षित होना है। चिडिय़ाघर को देखते हुए न तो किसी तरह की उत्तेजना मन में होती है और न ही किसी तरह का रोमांच। घटनाएँ इस तरह घटित होती हैं कि हम सहज ही उसका हिस्सा हो जाते हैं, उसके साथ बहते चले जाते हैं। 

अनिल दुबे काम में असाधारण क्षमताओं वाले निर्देशक हैं। इस टिप्पणीकार ने स्वयं उन्हें लगातार तीसरे दिन तक जागकर बिना जम्हाई लिए काम करते देखा है। चिडिय़ाघर में भी वे हर वक्त सेट पर होते हैं, सुबह से लेकर रात और पता नहीं अगली सुबह तक और सब तरह की छुट्टियों में भी। राजेन्द्र गुप्त एक मिलनसार कलाकार हैं जो मुम्बई मे एक बड़े कलाकार समूह के एक तरह से अविभावक, बड़े भाई की तरह हैं। जाने कितने बरस से उनके घर चौपाल लगती है और बड़ी तादात में कलाकार वहाँ अपने अवकाश में खूब बातचीत करते हैं, अभिव्यक्ति देते हैं और गाते-बजाते हैं। यह मेजबानी अनवरत जारी है। उनसे मिलकर हमेशा ऐसी खुशी मिलती है जैसे बीस-पच्चीस साल की पहचान हो। चिडिय़ाघर उनकी भी अभिव्यक्ति का एक महत्वपूर्ण धारावाहिक है, जिसे जिन्दगी को समझने के लिहाज से, यदि फुर्सत हो तो देखा जरूर जाना चाहिए।

स्त्री हिंसा और सत्यमेव जयते



सत्यमेव जयते के 17 जून के एपिसोड में स्त्री हिंसा पर आमिर खान ने अलग-अलग घटनाओं, त्रासदी झेलने वाली स्त्रियों और उनमें से कुछेक के आत्मविश्वास पर बात की है। हमारे देश में बहुत सारे लाइलाज मर्ज हैं जिनका समाधान आज तक नहीं हुआ। व्ही. शान्ताराम ने पिछली शताब्दी के चौथे दशक में दुनिया न माने फिल्म का निर्माण किया था जिसमें एक अनाथ लडक़ी निर्मला का ब्याह उसके रिश्तेदार पैसे की लालच में धोखे से एक बूढ़े से कर देते हैं। अनाथ निर्मला यह त्रासदी भोगती है कि पिता की उम्र के व्यक्ति के सामने उसे अर्धांगिनी के रूप में खड़ा होना पड़ता है। इस फिल्म में एक दृश्य है जिसमें उम्रदराज पति अपनी मूछें काली कर रहा है, निर्देशक इसे सीधे एक लोहार द्वारा पुराने बरतन चमकाने से जोड़ता है। प्रताडऩा ने अपने रूप बदले हैं, इस समय स्त्री अपनी घुटन में जीने और बाहर आने, दो तरह की परिस्थितियों से जूझ रही है। आँसू हर हाल में है, घुटते हुए भी और लड़ते हुए भी।


 17 जून के ही एपिसोड को देखते हुए प्रकाश झा की एक सशक्त फिल्म मृत्युदण्ड की याद आ गयी जिसमें स्त्रियाँ घर में अलग ही तरह की प्रताडऩा का शिकार हैं। परिवार में नपुंसक मठाधीश पति है जिसने समाज में पत्नी को बाँझ आरोपित कर रखा है। उसी परिवार की छोटी बहू पर जब उसका पति हाथ उठाता है तो वह हाथ रोककर कहती है, पति हो, परमेश्वर बनने की कोशिश मत करना। देव आनंद की कॉमर्शियल फिल्म हरे राम हरे कृष्ण का जिक्र भी करने की इच्छा हुई है जिसमें आपस में लड़ते-झगड़ते माता-पिता के साथ सहमे भाई-बहन एक कमरे में भय और अन्देशे को जिया करते हैं। 


 गोविन्द निहलानी की फिल्म अर्धसत्य याद आयी। इस फिल्म के नायक ओम पुरी थे जो अनंत वेलणकर का किरदार निबाहते हैं। सत्ता और व्यवस्था की विद्रूपताओं और अराजकता से लड़ता एक पुलिस इन्स्पेक्टर। इस फिल्म में बेशक द्वन्द्व राजनेता रामा शेट्टी से चलता है मगर अनंत के अवचेतन में अपने बर्बर पिता की खराब छबि है जो बात-बात पर उसकी माँ को पीटने लगता है। बचपन से ही वो इस घटना से घुटता है, एक बार पिता के साथ तू-तड़ाक में बात होती है तो वह झुंझला कर बोल देता है, तू हमेशा मेरी माँ को मारा करता था। इस किरदार की पूरी काया को हम विद्रोही देखते हैं, बोलते हुए, चुप रहते हुए। अन्त में उसकी लड़ाई का अन्त एक हिंसक परिणति से होता है जब वो रामा शेट्टी को मार देता है।

इस सदी और खासकर आज की स्थितियाँ और संघर्ष अब अपनी अस्मिता की रक्षा करने और समाज में अपनी स्पेस बनाने की चुनौती के ज्यादा हैं। मैं आज की सम्मानित कलाकार तीजन बाई को देखता हूँ तो उनकी शक्ति और आत्मविश्वास पर गर्व हो उठता है। वे पद्मभूषण हैं। छत्तीसगढ़ी लोकशैली में महाभारत की लोकगाथा पण्डवानी गाने वाली तीजन बाई ने भी यह प्रताडऩा सही थी कभी। आज वे बहुओं वाली हैं मगर जब वे शादी होकर अपने ससुराल गयीं तब पति के हिंसक व्यवहार ने उनका जीना मुहाल कर दिया था। कला और गायन में भी बाधक बना आदमी जब एक दिन उनको एक कार्यक्रम में ही मारने पहुँच गया तब तीजन बाई ने भी जवाब में उसे मारने के लिए तम्बूरा उठा लिया। तीजन बहादुरी और आत्मबल की अनोखी मिसाल हैं, हम सब उनका बहुत आदर करते हैं।


 सत्यमेव जयते में करुण सच्ची घटनाएँ, आजाद मुल्क और तमाम विरोधाभासी घटनाओं को रोकने और प्रतिरोध करने की वैधानिक संस्थाओं की सक्रियता और उपस्थिति के बावजूद हम जब सुनते हैं तो आहत होते हैं। कुछ उदाहरण हैं जहाँ बहादुरी है, जूझा गया है, लड़ा गया है और खड़ा भी हुआ गया है मगर यह सब आसान प्रक्रिया नहीं है। यह कठिन प्रक्रिया है। जूझती हुई स्त्री मानसिक रूप से अपने आपको खण्डित और पराजित इस तरह मान लेती है कि वो इस त्रासद अवसाद से बाहर ही नहीं आ पाती। सु-समाज का सपना हम देखते हैं, इतने विरोधाभासों के बावजूद उस पर विश्वास करते हैं, यह हमारा आशावादी दृष्टिकोण है मगर जिन्होंने दर्द सहे हैं, कसक जिनके मन से कभी जा न पायी है, उन्हें तैयार होने में, तैयार करने में बड़ी मेहनत करनी होती है। 

पीढिय़ों को मजबूत और सक्षम आत्मबल का संस्कार देने में हमें और ज्यादा समझ और मेहनत की जरूरत लगती है। अक्सर परिजन अपनी पढ़ती-लिखती बेटियों को स्कूटी खरीदकर देते हैं, इससे इतन जब मुझे अपने शहर में कोई लडक़ी या युवती मोटर साइकिल और कई बार बुलेट चलाती दीख जाती है तो मुझे उसके निडर और निर्भीक होने का एहसास होता है। हमें स्त्रियों को, बेटियों को निडर और निर्भीक बनाना चाहिए। खुद की कुण्ठाओं, अपने आसपास की विफलता, षडयन्त्र, धोखे या पराजय से उपजी निराशा का पत्नी, बच्चों के ऊपर शारीरिक अत्याचार की विकृति के रूप में प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। वैचारिक असहमतियों के भी सार्थक समाधान कर पाने की क्षमता होनी चाहिए। जिन्दगी के रिश्ते बिगाडक़र उसके दोषारोपण दूसरों पर करने के बजाय गर्त में गिरने के पहले ही सम्हल जाना चाहिए।