शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

बेबी, डैनी साहब की गरिमामयी उपस्थिति की फिल्म है

प्रदर्शन के तीसरे सप्ताह में बेबी, गनीमत है, एकदम इक्के-दुक्के थिएटरों तक सिमटकर नहीं रह गयी जैसे कि अन्देशे आजकल होने लगे हैं। फिल्में प्रदर्शित होती हैं, जो कमायी करती हैं वे दो-तीन सप्ताह और जो विफल होती हैं वे अधिकतम दो सप्ताह में विस्मृत हो जाती हैं। सिनेमाघर अगली फिल्म की चिन्ता करने लगते हैं। बेबी का जारी रहना इस बात को जाहिर करता है कि दर्शक प्रेरित होकर अच्छी फिल्मों की तरफ जाता है और यह भी कि अच्छी फिल्मों से दर्शक अमूमन वंचित नहीं रहता। नीरज पाण्डे एक गम्भीर फिल्मकार हैं, यह उनकी पिछली फिल्मों ए वेडनेस्डे और स्पेशल छब्बीस से जाहिर हुआ ही था, बेबी तक आते-आते उन्हें सिनेमा को भव्यता के साथ बनाने का आर्थिक समर्थन मिलने लगा है, जो निश्चित ही बुरा नहीं है क्योंकि क्यों नहीं बेहतर और मेहनत के सिनेमा को आर्थिक सम्बल दिया जाना चाहिए पर निर्देशक पर यहाँ यह निर्भर करता है कि वह संसाधनों से लैस होकर मूल तत्वों को कैसे बरत रहा है?
नीरज ने बेबी के माध्यम से सामाजिक सरोकारों की एक फिल्म प्रस्तुत की है। आतंकवाद जैसे विषय को लेकर किस तरह एक संयमित फिल्म बनायी जा सकती है, बेबी इसका उदाहरण है। खासतौर पर विषय को समझते हुए हम यह अनुमान लगाते हैं कि फिल्म में हिंसा या मारधाड़ बहुत होगी, लेकिन उसके विपरीत यह फिल्म बौद्धिक कौशल के प्रमाण किरदारों के माध्यम से देती है। गुनहगार छुपा नहीं है, आरम्भ से जाहिर है, खेल चल रहा है, कैसे पकड़ा जायेगा, सारा दारोमदार बौद्धिक चातुर्य पर है। दर्शक बेबी देखते हुए सकारात्मक चरित्रों के माध्यम से यही देखना चाहता है। स्वाभाविक रूप से नीरज पाण्डे उसमें सफल रहे हैं।
यह उल्लेखनीय है कि परिश्रमी और क्षमतावान कलाकारों के साथ काम लेने वाले निर्देशक का भी नाम होता है, फिल्म प्रभावित करती है। अक्षय कुमार, राणा दग्गुबाती, तापसी पन्नू जैसे कलाकार डैनी जैसे शीर्ष और सधे कलाकार की टीम का देशभक्त हिस्सा नजर आते हैं। यह फिल्म अभिनेता डैनी डेंग्जोंग्पा को जितने सम्मान के साथ प्रस्तुत करती है, वह और भी महत्वपूर्ण है। वे इस फिल्म के नैरेटर (प्रस्तुतकर्ता) भी हैं।
बेबी (Baby Movie) दो और बातों से प्रभावित करती है, एक उसका चुस्त सम्पादन जो कि श्रीनारायण सिंहShree Narayan Singh ने किया है, दूसरा उसका पार्श्व संगीत जो कि संजोय चौधुरीSanjoy Chowdhury ने तैयार किया है, दोनों ही स्तरों पर कसावट दिखायी देती है, ध्वनियों के सजीव प्रभाव अनुभूत किए जा सकते हैं। अच्छे विषय का सिनेमा आपको सजग करता है, भीतर कहीं, किसी कोने में आपकी जवाबदेही की सुप्त चेतना को हरकत में लाता है, बेबी से यदि ऐसा होता है तो उसे सहजता से तीन सितारे बल्कि जरा ज्यादा, दिए जा सकते हैं।
***1/2

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

शमिताभ : बोझ तले दबती क्षमताएँ

शमिताभ का बड़ा प्रचार-प्रसार था। अमिताभ बच्चन की फिल्म है। निर्माता के रूप में भी वे, अभिषेक बच्चन सहित कोई सात-आठ नाम शामिल हैं। लगभग पचास करोड़ बजट की इस फिल्म से जिस तरह के लोग जुड़े हैं, उनकी अपनी प्रतिभा, क्षमता और उनके प्रदर्शन में अनेक विरोधाभास हैं। यही कारण है कि यह फिल्म कलाकारों के बीच में तो क्षमताओं का बोझ और प्रभाव तले दबना प्रमाणित करती ही है, एक सवाल यह भी खड़ा करती है कि फिल्मांकन के बाद जिस तरह से किसी फिल्म को अच्छे सम्पादन की जरूरत होती है, उसी तरह क्या फिल्म बनने से पहले पटकथा को भी अच्छे सम्पादन की जरूरत होनी चाहिए? जवाब पाठकों और दर्शकों के पास होगा।

शमिताभ, फिल्म का नाम इसलिए है क्योंकि वह फिल्म के मुख्य किरदार का नाम है। फिल्म का मुख्य किरदार एक स्थापित अभिनेता है, उसकी अपनी आवाज नहीं है लेकिन उसका जुनून इतना तीव्र है कि वो उस व्यक्ति तक पहुँच जाता है जो उससे तीन गुना बड़ा है जिसकी आवाज का अपने पक्ष में इस्तेमाल करके वो सितारा बन जाता है। जिस चरित्र की आवाज महत्वपूर्ण है वह संघर्ष से हारकर शराब के नशे में अपनी कुण्ठाओं के साथ एक कब्रिस्तान में रह रहा होता है जहाँ का मजदूर उसे जहाँपनाह बुलाता है। यहीं पर इस आदमी, अमिताभ सिन्हा ने अपने लिए एक कब्र भी आरक्षित करा रखी है। खैर अनुबन्ध के बाद बोल नहीं सकने वाला साधारण शक्ल सूरत का युवा हिन्दी सिनेमा की दुनिया में अपना वजूद स्थापित करता है लेकिन व्यक्तित्व और आवाज के अन्तर्कलह इस यश वैभव को ज्यादा दिन चलने नहीं देते।

शमिताभ में यह टकराव सफलता की शुरूआत के साथ ही प्रकट हो जाता है। लगता है कि पटकथा लिखते हुए निर्देशक बाल्कि को अमिताभ बच्चन को उच्चतर स्थान पर रख कर कहानी को आगे ले जाने की जल्दी कहें या व्यग्रता ज्यादा थी। ऐसे में धनुष की क्षमताओं का वैसा उपयोग नहीं हो पाता जितनी उनकी प्रतिभा है। धनुष, राँझणा में अपने चरित्र के साथ इतना खुलकर आते हैं कि पूरी फिल्म बड़ी सहज प्रवहमयता में निकल जाती है, यहाँ लेकिन उनके सामने बड़ा व्यवधान बनकर अमिताभ बच्चन खड़े हो जाते हैं। एक उम्रदराज किरदार, अपने जीवनस्तर में बदलाव के बावजूद अपनी कुण्ठा को जीत नहीं पाता, अपना अहँकार और द्वेष दोनों ही उस किरदार को सार्थक ढंग से व्यक्त नहीं कर पाते। वैसे तो यह प्रारम्भिक ख्याल ही बड़ा विचित्र सा लगता है जिसमें प्रस्तुत कलाकार अत्यन्त युवा है और उसकी आवाज उम्रदराज व्यक्ति की। 

अक्षरा हसन अपनी पहली हिन्दी फिल्म में अपनी बहन से एक कदम आगे दीखती हैं, खास यह कि उनकी आवाज में उनके पिता का मैनरिज्म साफ झलकता है भले उनकी आँखें माँ की तरह हैं। दृश्यों में वे आत्मविश्वास के साथ हैं, अपने भविष्य की चिन्ता गम्भीरता से करने वाली एक युवा लड़की के जीवन में रोमांस और रिश्तों की अहमयित कब होनी चाहिए, यह आप अक्षरा के किरदार से देख सकते हैं।

शमिताभ, में कुछ और अकल्पनीयता का प्रदर्शन गले नहीं उतरता, जैसे एक अंचल में खुले में लगने वाली पाठशाला का बड़ी छोटी सी उम्र का बच्चा सिनेमा का ऐसा जुनून पाले दिखायी देता है जो उस तीव्रता में कई बार युवाओं में नहीं दिखायी देता। जिस स्थान पर शाला भवन न हो, वहाँ सिनेमाघर न जाने कितनी दूरी पर होगा, कैसे वह छ: साल का बच्चा, दानिश घनी स्प्रिंग की तरह इस जुनून से कसा नजर आया, आश्चर्य होता है। आर बाल्कि इस चरित्र को भी ठीक से प्रस्तुत नहीं कर पाते। वास्तव में होता यही है कि यथार्थ की पटकथाएँ मनुष्यरचित नहीं होतीं, फिल्म में तो घटनाक्रम लेखक, निर्देशक साथ लेकर चलते हैं और कई बार सितारे उसमें मनमाफिक मोड़ भी अकस्मात पैदा करते हैं।

धनुष, रजनीकान्त के दामाद हैं, रजनीकान्त का कैरियर बस कण्डक्टर से शुरू हुआ था, वही कथ्य यहाँ इस जुनूनी नायक के साथ जोड़ दिया गया है, अमिताभ बच्चन को आवाज के कारण रिजेक्ट कर दिया गया था, वह घटना इस कहानी के साथ जुड़ गयी है। बाकी मानवीय गुणों-दुर्गुणों के साथ एक साधारण कहानी को भव्यता प्रदान करते हुए शमिताभ के रूप में जो फिल्म हमारे सामने कुल मिला प्रभाव छोड़ती है, वह दो सितारा तक ही सीमित होकर रह जाती है, यदि हम तमाम सम्मोहन और भव्यता से परे आकलन करें तो। इस फिल्म में इलैयाराजा जैसे महान संगीतकार ने स्वानंद किरकिरे के साधारण गीतों को साधना चाहा है पर उसकी ऐसी चर्चा नहीं होगी जैसी सदमा जैसी फिल्म के संगीतकार के रूप में आज भी होती है।

शमिताभ देखा जाये तो बस आ कर निकल जाने वाली फिल्म है, बहुत याद रहने वाली नहीं।

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बुधवार, 14 जनवरी 2015

जीवन की पतंग

पतंग की बात हो रही थी, दिन में। बचपन और आनंद के दुर्लभ हो चले खेलों की बात करते हुए कौन भला ऐसा होगा जो थोड़ी देर छोटा न हो जाना चाहेगा। मैं भी हो गया। मुझे अचानक रामदास चाचा याद आ गये। पापा के दोस्त थे। स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई साथ-साथ की थी ग्वालियर में। नौकरियाँ दोनों को मिलीं पर अलग-अलग विभागों में। रामदास चाचा को जल्दी तरक्कियाँ मिलीं। वे जेलर भी बन गये थे, शायद सुपर‍िडेण्ट जेलर। महीनों में जब कभी उनका भोपाल आना होता तो शाम को घर जरूर आते। प्राय: उनका मुख्य काम पापा के आने के पहले मुझे बाजार ले जाना होता। छोटी उम्र थी, शायद आज जैसी या इससे ज्यादा ही नासमझी भी रही होगी। मैं उनसे अपने मन-पसन्द की वे सब चीजें दिलवाने की जिद करता जो पापा-मम्मी की नजरों में फिजूल या बेकार की रहती।

रामदास चाचा सब खरिदवाते। कम्पॉस बॉक्स नया, भले बस्ते में रखा हो, पेन-पेंसिल, रबर, कटर सब कहता, खरीद दो। वे दिलवाते। बड़े अच्छे चाचा जी। फिर उनसे कहता, पतंग दिला दो। वे पतंग की दुकान ले जाते। वहाँ एक छोड़ तीन पतंगें पसन्द कर लेता। उस समय छोटी पतंग दो पैसे और बड़ी पतंगें पाँच, दस और पन्द्रह पैसे में आतीं। अपने को बमुश्किल पाँच पैसे मिला करते। पतंग की कब लायी, कब फट गयी पता नहीं। चकरी, सद्दी, माँजे का भी दारिद्रय। ऐसे में चाचा मसीहा बनकर आते। उनसे एक चकरी, माँजा, सद्दी खरीद देने को कहता। पन्द्रह-बीस रुपए चाचा खर्चते मेरे ऊपर और अपन राजा। गर्व से उनका हाथ थामे घर लौटते। पापा नाराज होते, चाचा पर भी, कहते, ये नालायक है, तुम और इसे बिगाड़ने में लगे हो। इस पर रामदास चाचा उनसे हँसकर कहते, अन्नू को कुछ मत कहो, हमारा एक ही तो भतीजा है, वाकई उस वक्त अपन एक ही थे, भाई-बहन बाद में आये।

रामदास चाचा से बस इतना ही स्वार्थ रहता। चाचा फिर पापा के साथ बातचीत करते, ग्वालियर के हालचाल, भोपाल आने का कारण, नौकरी की बातें, प्रमोशन वगैरह। खाना-वाना साथ खाते, रसरंजन भी होता और बड़े भावुक होकर, गले मिलकर लौट जाते। उनकी पापा की आत्मीयता कमाल थी। अक्सर वो चिट्ठी भी लिखा करते, मुझे याद है उसमें पापा के लिए उनका सम्बोधन - डियर दादा, मधुर मिलन..........फिर सारा हाल। उनका आना वाकई अपने लिए बड़ा खास होता। एक बार पापा ने ऑफिस से लौटकर उनके बारे में मम्मी से बताया था, तब मैंने भी सुना था कि वे नहीं रहे। तब नहीं रहने का अर्थ ज्यादा समझ में नहीं आता था। बाद में जब समझ आया तब उनकी बहुत याद आती रही। आज भी आयी, उनका पूरा व्यक्तित्व जेलर की वर्दी में उनका आना, बड़ा रोबीला होता।

उनकी दिलायी पतंगें कई दिन चलतीं। पतंग उड़ाने के लिए जरूरी है कोई आपका सहायक उसे दूर तक ले जाकर ऊँचा उछाले, युक्तिपूर्वक, जिसे हम छुट्टी देना कहते थे, इस काम के लिए कोई मिलता नहीं था। मोहल्ले के जूनियर साथी इस लालच में कि उड़ने लगने के बाद उन्हें भी उड़ाने दूँ, छुट्टी दिया करते थे। घर के सामने स्कूल के मैदान से लेकर, घर की छत और कहाँ नहीं पतंग उड़ायी। पतंग के चक्कर में कई बार गिरे, पड़े और मम्मी से खासे पिटे भी। लेकिन तब डाँट, फटकार और पिटायी का प्रतिवर्ती प्रभाव दुस्साहस में तब्दील होकर और समृद्ध हुआ करता था। पतंगें खूब ऊँची उड़ायीं, अपनी कटी तो दुख मनाया, दूसरे की काटी तो खुश हुए। एक समय पतंग के साथ-साथ अपनी कामनाओं के उड़ने का भी हुआ करता था। आज याद आता है तो आकाश में पतंगे उस उदारता से दिखायी नहीं पड़तीं जो अपनी गोद में कामनाओं को बैठाकर दूर कहीं ऊँचे ले जायें.............

शनिवार, 10 जनवरी 2015

गुलाब विश्व में रमण करते हुए

तय नहीं कर पाया कि इसे गुलाब का गाँव कहूँ या विश्व। गुलाब है इसलिए गाँव कहने में सहज महसूस नहीं किया। गुलाब का विश्व ठीक है। ऐसा ही एहसास करने की भी कोशिश की जब सतह से तेज भागती ठण्डी हवा ने मुट्ठी भर महक भी उस सड़क पर उड़ेल दी, जहाँ से होकर जा रहा था। दायीं ओर निगाह गयी तो सड़क किनारे गाड़ियों को कतार में खड़ा पाया। बड़ा सा बगीचा था जिसमें सफेद कनातों से घिरा वह विश्व था, जिसे गुलाबों का विश्व कहा जा सकता है। महक का रास्ता वहीं से होकर आया था, चेतना झंकृत सी हो गयी।
गुलाब के फूल का अपना महत्व है। अपने स्वभाव का वह अलग सा ही फूल है, जितना ही खूबसूरत, उतना ही पल भर में बिखर जाने वाला। उसको सहेजना कठिन है और छूना जितना सुखद उतना ही जोखिम भरा। गुलाब की खूबसूरती के चारों तरफ उसकी हिफाजत करने वाले सख्त काँटों को देखकर मन सिहर उठता है पर फिर भी गुलाब से आँख कहाँ हटती है! राजकपूर की फिल्म मेरा नाम जोकर में वे शायद अपनी टोपी के अन्दर गुलाब ही छुपाकर रखते थे, नायिका को देने के लिए।
गुलाब बहुत सारे रंगों, आकारों और विन्यासों में देखा। वर्षों पहले शहर के ही एक अखबार के ‍लिए ऐसी प्रदर्शनी देखकर, सम्पादक जी की चाहत अनुसार कविताई रिपोर्टिंग करने का काम मिला था, वह याद आ गया। उस समय यह प्रदर्शनी बड़ी झील के किनारे लगी थी, अब वह अस्पताल के सामने लगने लगी है। मन कहता है कि इतने सारे गुलाबों की महक से अस्पताल में उन तक महक पहुँचती होगी तो उन्हें बहुत अच्छा लगता होगा, जिनकी तबियत खराब होती होगी।
शहर में दिन शुरू होते ही प्रेमी-प्रेमिका चेहरा बांध-बूँधकर मोटरसायकिल में जाने कहाँ-कहाँ घूमने निकल जाते हैं। वे तालाबों के किनारे या बाग-बागीचों में आबोहवा या प्रकृति के प्रति अनुराग के वशीभूत होकर अपना समय नहीं बिताते होंगे, ज्यादातर झुँझलाते या बहस करते दीखते हैं या उलाहने देते हुए। घण्टे भर गुलाब विश्व में रमते हुए ऐसा कोई जोड़ा नहीं दीखा जो गुलाब की खूबसूरती देखने-दिखाने आया हो।
गुलाब की खूबसूरती को सराहने वालों का अन्दाज दिलचस्प होता है। रमण करने वालों को सभी के सभी गुलाब सुन्दर, खूबसूरत, ब्यूटीफुल और वाओ लगते हैं। वास्तव में इस फूल की प्रकृति अचम्भित करके रख देती है। गुलाब का विभिन्न रंगों में यहाँ व्यक्त होना, उनका विन्यास चकित करके रख देता है। मुख्य रूप से तो सुर्ख-रक्ताभ गुलाब की खूबसूरती का शायद ही कोई पर्याय हो। लाल गुलाब से ध्यान मुश्किल से हटता है। आमतौर पर गुलाब, नाम के अनुरूप गुलाबी और गुलाबी में भी गहरे और हल्के रंगों की अनेक छायाओं में दिखायी देते हैं। पीला गुलाब देखना बहुत सुहाता है। यदि कहें कि सुर्ख लाल रंग का गुलाब मादकता का बोध कराता है तो पीला गुलाब मद्धम मुस्कुराता-लजाता सा महसूस होता है। सफेद गुलाब की शालीनता को उसके अनूठेपन में परिभाषित किया जा सकता है।
प्रयोगधर्मी समय में गुलाब उपरोक्त प्रमुख रंगों के अतिरिक्त नीले, हरे, बैंगनी आदि अनेक रंगों में दिखायी देते हैं किन्तु मूलभूत रूप से लाल, गुलाबी, पीला और सफेद गुलाब सीधे हमारे संज्ञान से जुड़ा है। गुलाब के फूलों की अनुभूति सीधे अनुराग से जुड़ी है। हमारे सिनेमा में ऐसे कितने ही दृश्य यादगार हैं जिसमें नायिका या तो स्वयं अपने बालों, जूड़े में गुलाब लगा रही होती है या उसका नायक प्रेम में भरकर मुस्कुराते हुए उसके बालों में गुलाब लगाता है। ऐसे दृश्य बहुत से एहसासों का पुनर्स्मरण कराते हैं। गुलाब पेश करना और उसका स्वीकार लिया जाना किसी के भी जीवन का दुनिया जीत लिए जाने जैसी अनुभूति रहा होगा, निश्चित ही। स्मृतियों में किताब में रखे-रखे सूख गये गुलाब भी याद आते होंगे जो देना थे मगर दे नहीं पाये। गुलाब का फूल शाहजहाँ की तस्वीर में उनके हाथों में हमेशा रहा है।
आज शायद ही किसी को गुलाब के सहारे अपनी ख्वाहिशों की दुनिया जीतने का ख्याल कभी आता हो..........

गुरुवार, 8 जनवरी 2015

भीतर फूल से धर्मेन्द्र

धर्मेन्द्र बीते 8 दिसम्बर को अस्सीवें वर्ष में प्रवेश कर गये हैं। साल दर साल बढ़ती उम्र का एहसास रोमांचक है, तब जब वर्षों से हर जन्मदिन पर उनके साथ होने का सान्निध्य रहा हो। इस साल का जन्मदिन सक्रियता और व्यस्तताभरा है क्योंकि वे शूटिंग कर रहे हैं। शूटिंग में ही उनका यह विशेष जन्मदिन मनाया जायेगा। अपने हर जन्मदिन पर वे अपने चाहने वालों से दिन भर मिलते हैं। सबसे पुराने रिश्ते निबाहने वाले इस खूबसूरत और विनम्र इन्सान को बधाई देने दिन भर साथ के कलाकार आते हैं, वे कलाकार भी आते हैं जो बेटों के मित्र हैं, वे भी जिनके साथ काम किया है, निर्देशक आदि सभी। इसके अलावा वे थोड़ी-थोड़ी देर में बड़ी चिन्ता और जिम्मेदारी से मुख्य दरवाजे के बाहर भी चले जाया करते हैं जहाँ भीड़ भर चाहने वाले उनसे मिलने की ललक लिए खड़े रहते हैं। वे सभी से मिलते हैं। बाहर गये तो फिर मुरीदों के होकर रह जाते हैं। सबके मन की इच्छा पूरी करते हैं। मन की इच्छा फोटो खिंचवाना, दूरदराज से साथ लेकर आये तोहफों को प्रेमपूर्वक स्वीकार करना। धर्मेन्द्र किसी को निराश नहीं करते। मिलने वाले सुखद स्मृतियाँ लेकर जाते हैं। सुरक्षा गार्डों को वे कह देते हैं किसी पर जोर-जबरदस्ती बिल्कुल नहीं करना है। कोई कहता है कि धर्मेन्द्र का सीना बहुत बड़ा है, कोई फीता नहीं ऐसा जो नाप सके।

बात वाकई सही है। एक बात बड़ी स्वाभाविक और एक सी ही देखी है। धर्मेन्द्र की इण्डस्ट्री में सभी तारीफ करते हैं। इसकी वजह यह है कि वे सबको प्रोत्साहित करने वाले कलाकार हैं। उन्होंने अपने बेटों के साथ काम करने वाली पीढ़ी की भी पीठ थपथपायी और उनके साथ काम किया। सेट पर शूटिंग के वक्त उनका काम के प्रति समर्पण अलग सा है। वे पूरी तरह निर्देशक के मित्र हो जाते हैं। सहायक निर्देशक जो दृश्य के बारे में बतलाने आते हैं उनके साथ भी उनका व्यवहार बड़ा आत्मीय होता है। सेट पर उनके होने को अनुशासन की तरह भी लिया जाता है। धर्मेन्द्र मिल रहे आदर को अपनी पूँजी मानते हैं वे कहते हैं कि ये सब बच्चे लोग इतनी इज्जत देते हैं, इतना प्यार करते हैं, मुझे लगता है कि पचास साल से ज्यादा समय जो इस संसार को दिया है वह व्यर्थ नहीं गया है।

धर्मेन्द्र को अपने सब निर्देशक याद आते हैं। वे उस स्वर्णिम काल को याद करते हैं जब बड़ी ही स्वस्थ स्पर्धा के साथ अच्छी-अच्छी फिल्में बना करती थीं। एक साथ पाँच-छः निर्देशक अपनी-अपनी फिल्मों के साथ सक्रिय रहा करते थे। एक साथ अनेक नायक अपनी-अपनी फिल्मों में काम करते हुए अपना श्रेष्ठतम देने का प्रयास करते करते थे। फिल्में चलती थीं, एक-दूसरे की सराहना होती थी। परिवारों की तरह मिलना-जुलना हुआ करता था। अवार्डों-समारोहों की आब देखते ही बनती थी। अवार्ड मिलना-नहीं मिलना एक बात होती थी लेकिन काम किसने अच्छा किया, इस बात को लेकर श्रेय देने से पीछे कोई हटता नहीं था। धर्मेन्द्र कहते हैं कि मेरा सौभाग्य रहा कि बहुत गुणी डायरेक्टरों के साथ काम किया, बिमल राय, हृषिकेश मुखर्जी, रामानंद सागर, असित सेन, रघुनाथ झालानी, मोहन कुमार, जे. ओमप्रकाश, बी. आर. चोपड़ा, यश चोपड़ा, ओ. पी. रल्हन, रमेश सिप्पी आदि कितने ही अलग दृष्टि और सिद्धान्तों के फिल्मकार जिन्होंने अपनी फिल्में मनोयोग से बनायीं, उनकी पटकथा पर गम्भीरता से काम किया, गीत-संगीत को देखा और यहाँ तक कि सहायक कलाकारों, एक्स्ट्रा तक को साथ लेकर चले। 

परदे पर धर्मेन्द्र के होने का मतलब दर्शक जानते हैं। उनकी फिल्मों के नाम सभी को याद हैं। सबने वे फिल्में कई-कई बार देखी हैं। दर्शकों ने ही उन्हें मर्द, इण्डियन जेम्सबाॅण्ड, सदाबहार, ही-मैन आदि विशेषणों से स्थापित किए रखा है। दर्शकों ने उन्हें हर दौर में पसन्द किया है। ऐसा अनेक बार हुआ होगा जब एक वक्त में किसी नायक-महानायक विशेष का वर्चस्व रहा होगा लेकिन अचानक से उसी बीच धर्मेन्द्र की कोई फिल्म ऐसी आ गयी कि सबका ध्यान उस फिल्म की ओर मुड़ गया और फिल्म सुपरहिट हो गयी। ऐसे दौरों को धर्मेन्द्र ने खूब आजमाया और उस वक्त की लोकप्रियता का सुख उठाया है। धर्मेन्द्र अपनी फिल्मों में किस्म-किस्म के किरदार करते रहे हैं। उन्हें खलनायक डाकुओं से लड़ने वाले बहादुर युवा के रूप में भी पसन्द किया गया है और जब वे खुद डाकू बनकर आये तब भी सराहा गया। वे पुलिस इन्स्पेक्टर भी खूब जमे और पाॅकेटमार के रूप में भी। दर्शकों धर्मेन्द्र को चोर के रूप में देखकर खुशी से फूला नहीं समाते थे, ऐसा चोर जो पुलिस की आँखों में धूल झोंककर बड़ी से बड़ी चोरी कर लेता है, कीमती से कीमती हीरा चुरा लेता है। वे छुपे रुस्तम की तरह पुलिस अधिकारी, सी बी आई और सी आई डी अधिकारी बनकर भी बहुत प्रभावित करते रहे हैं।

धर्मेन्द्र जैसा नायक देश के दुश्मनों से लड़ता है तो उनके प्रति मुग्ध हुआ दर्शक धीरज छोड़ देता है। किसी जमाने में खलनायक शेट्टी से धर्मेन्द्र का फाइट सीन प्रायः हर फिल्म में रहा है। ऐसी अनेक फिल्में आयीं हैं जिनमें धर्मेन्द्र की सीधे शेर से लड़ाई के रोमांचक दृश्य फिल्माये गये हैं। खूँखार, कद्दावर विलेन से धर्मेन्द्र सीधे जा भिड़े हैं, क्षमताओं में पत्थर सा वज्र लिए यह हीरो रोमांटिक दृश्यों में कितना शर्मीला हो जाता है। कई बार वो नायिका से अपने दिल की बात नहीं कह पाता। कई बार दिल की बात इस तरह कहता है कि मैं जट यमला पगला दीवाना गाते हुए बेसुध जमीन पर लोट लगा देता है। भावुक और संवेदनशील दृश्यों में धर्मेन्द्र की आँखों में बिना ग्लिसरीन के आँसू आ जाते हैं। ऐसे दृश्यों में जब वे बिछुड़ कर मिली माँ, पिता, बहन या भाई से मिल रहे होते हैं, परदे पर गंगा-जमुना बह चलती है। धर्मेन्द्र हमारे समय के ऐसे नायक हैं जिनके व्यक्तित्व से उन्हीं की फिल्म का एक नाम फूल और पत्थर बड़ा मिलता सा लगता है। उनकी उदारता के अनेक किस्से हैं, वे ऐसे इन्सान हैं जो अपने घर चोरी की नीयत से कूदे चोर को भी खाना खिलाकर और कुछ नकद देकर यह नसीहत देकर विदा करते हैं कि आइन्दा चोरी मत करना.................।

रविवार, 28 दिसंबर 2014

चोट कुछ अलग सी होती है......

चोट दुखती है बहुत अगर अपनी असावधानी से लग जाती है। चोट दुखती है अगर दूसरे की असावधानी से लग जाती है। अक्सर यह समझ पाना कठिन होता है कि चोट सबसे ज्यादा कब दुखती है? अपनी असावधानी से लग जाने के कारण या दूसरे की असावधानी से लग जाने के कारण। बहरहाल दर्द तो होता है, दुखता तो है ही। दुखना, दुख से उपजा शब्द है शायद। दुख देह में नहीं होता, मन में होता है। जब दुख मन में होता है ताे मन देह घर में ही चुपचाप एक कोने में अकेले बैठे रह जाना चाहता है। पता नहीं मन किस जगह से उठ या हटकर अपना एकान्त चुनता है, एक अंधरी कोठरी चुनता है जहाँ वह हमारी ही तरह घुटने मोड़कर उनमें मुँह छिपाकर बैठ जाया करता है। ऐसा सोचते हुए लगता है कि मन अपनी देह अलग गढ़ लिया करता है या हम अपने मन की देह अलग गढ़ दिया कर देते हैं। मन का इस तरह बैठ जाना और गहरी चुप्पी धारण करना देह से नहीं छूट सकने वाले हाथ को छुड़ाने की कोशिश सा जान पड़ता है। इसकी सफलता या विफलता, जीत या हार हमारे बाहर को प्रभावित करती है। 

चोट का पूरा का पूरा मिजाज अलग तरह का होता है, अक्सर लोग उसे पास-पड़ोस के शब्दों जैसे जख्म या घाव से भी जोड़ते हैं पर सचाई यह है कि चोट इन सबके पहले की अवस्था होती है। जख्म या घाव की तरह चोट प्रकट अवस्था में नहीं होती। उसका अप्रकट होना ही दरअसल हमारी संवेदना को उसकी तरफ एकाग्र करता है। शेष दो अवस्थाओं में हम सब कुछ के एक तरह से भिज्ञ ही होते हैं और उसके निदान को लेकर भी अनावश्यक संशय में नहीं रहते लेकिन चोट के साथ ऐसा नहीं है। चोट हमारे कदमों को पीछे, बहुत पीछे लौटा कर ले आने को होती है। वह दबाव शायद इस तरह का होता है कि हम उसका प्रतिरोध भी नहीं कर पाते। दी हुई चोट किसी भी संवेदनशील मनुष्य को ज्यादा तंग करती है। चोट कई बार छुए से मालूम नहीं देती, कई बार चोट छुए भर से मालूम हो जाती है। चोट के साथ स्पर्श का रिश्ता बहुत नम्र और कई मायनों में असरकारी भी होता है।

मन की चोट बरसों बनी रहती है। ऐसी चोट बढ़ती या घटती नहीं है पर बनी सदैव रहती है। देह से लेकर मन तक दरअसल महीन धागों की बुनी हुई ऐसी चादर भीतर ही भीतर कोई ढाँप कर छोड़ देता है, इस तरह की छुपी पीड़ा अपनी तपन को एक जैसा बनाये रखती है। नम्र स्पर्श, भूल को महसूस करने वाली नन्हीं-नन्हीं ग्लानियाँ चोट का धीमे-धीमे निवारण करने का अगर सच सरीखा प्रयत्न करते हैं तो सम्भवत:  वह चोट भी ठीक होती है जो ऋतुओं और त्यौहारों पर थोड़ी-थोड़ी हरियाई सी रहती है। सहलाहट केवल अँगुलियों या हथेलियों भर का हुनर नहीं है, सहलाहट सच कहा जाये तो सच्चे मन से स्वीकारी गयी भूल और उसी मन से किए जाने वाले प्रायश्चित या पछतावे की फिलॉसफी है। चोट को सहलाकर हम अपने मन तक उसके दर्द या पीड़ा के एहसासी होते हैं, यह एहसास हमें आत्मबोध कराता है और मान लीजिए चोट पहुँचाने की वृत्ति के प्रति थोड़ा-बहुत भी सचेत करता है, तो इससे बड़ी बात क्या हो सकती है! कुछ हो सकती है भला!!

रविवार, 21 दिसंबर 2014

पप्पू का दर्शन शास्त्र


हर बार यही होता है कि जुल्फें जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती हैं और उन पर कैंची चलवाने का मौका मुश्किल से आता है। इधर दो-तीन दिन से सुबह बड़े अवसर थे मगर अपनी अलाली और शिथिलताओं से गँवाते रहे। इतवार फिलहाल आखिरी मौका था। मैं यथासम्भव मैले और गन्दे कपड़े पहनकर उसकी दुकान पहुँचा तो उसको सामने एकदम फुरसत में पानी पीते हुए खड़ा देखकर एक्टिवा से ही कूद जाने को हुआ। सेठ है अपनी दुकान का। बहुत व्यस्त रहता है और हर कोई उसी से बाल कटवाना चाहता है। मुझे लगा, ऐसा न हो गाड़ी खड़ी करने से लेकर उसके पास जाने के बीच, बीच से कोई आ जाये और अपना नम्बर लगा दे। बहरहाल ऐसा हुआ नहीं और मैं भी गाड़ी में लदे-लदे ही चिल्ला दिया, पप्पू भाई, अपना नम्बर।

मुझे देखकर या मेरी बात से उसे जैसे कोई खुशी नहीं हुई, वह वाकई फ्री था सो अनौपचारिक रूप से मेरे ही अनुसरण में दुकान में अन्दर चला आया और कहने लगा, कल नहीं आये, इन्तजार करता रहा? मैंने कहा, कल कब आने वाले थे, हमने तो नहीं बताया। वह बोला, संजू भैया आये थे, वो कह रहे थे। मैंने कह दिया, मजबूरी में उत्तर दिया होगा, तुमने उनसे पूछा होगा, यह सोचकर कि कहीं और से तो हम बाल नहीं कटवा रहे। इस पर तम्बाखू खाया पप्पू ही ही करने लगा, नहीं भाई साहब, ऐसी बात थोड़े ही है।

उसने कोने की कुरसी पर मुझे बैठने का इशारा किया और इसी बीच उसके दो आशिक आ गये जो जिद करने लगे, चलो यार, चलो यार, पहले मुझे निपटा दो, मेरे बाल काट दो। उनकी छीना-झपटी के बीच पप्पू ने मेरी ओर इशारा किया, भाई साहब बैठे हैं, इनके बाद ही। मुझे पप्पू के इन्साफ पर गर्व हुआ। दूध का दूध, पानी का पानी। वे पीछे बैंच पर बैठ गये और सामने कोने पर रखे छोटे से रंगीन टीवी में नरेन्द्र चंचल के भजन देखने लगे, इधर पप्पू मुझे ओढ़ा-ढँपाकर शुरू हो गया। बीच में उसका एक नौकर आया, उसको उसने आड़े हाथों लिया, क्यों क्या चक्कर चल रहा है तेरा, सुबह पानी गरम होता रहा और तूने स्विच बन्द नहीं किया, क्या बात है, कोई माशूका पाल ली है क्या? मैं पप्पू का चेहरा शीशे में देखते हुए मुस्कुराया तो कहने लगा, हाँ भाई साहब या तो माशूका आ जाये या उधारी हो, तभी आदमी का दिमाग उलझा रहता है। मुझे लगा इसके दर्शन पर गौर करूँ, फिर सोचा, नहीं गर्व करना ठीक होगा।

बीच में पप्पू से मैंने एक परामर्श भी लिया। मैंने उससे कहा, पिछले दिनों बहन तोहफे में एक बड़ा सा डिब्बा झाग वाली शेविंग क्रीम का दे गयी है, जिन्दगी में कभी देखा नहीं, लगाकर दाढ़ी बनाना तो दूर की बात, कैसे उसका उपयोग करूँ? तब उसने सामने ही शो-केस में रखे उसी तरह के डिब्बे को उठाकर, मुझे प्रशिक्षित किया, पहले गालों में पानी लगाऊँ, फिर डिब्बे को शेक करूँ, थोड़ा हथेली में रखूँ और हल्के-हल्के रगड़कर झाग उठाऊँ, थोड़ी देर बाद दाढ़ी मुलायम हो जायेगी तब रेजर से काट लूँ। नासमझ विद्यार्थी की तरह मैंने पूरा सुना फिर समझ आ जाने वाली समझदारी के साथ उसे यह एहसास भी कराया कि जान गया हूँ।

इस बीच पप्पू ने एक बार बाल काटते हुए आधा काम छोड़कर बाहर जाकर चाय भी पी। तम्बाखू भी फटकार कर खायी और मुझे एक काम भी सौंपा, कहा इस बार मुम्बई जाऊँ तो उससे मिलकर जाऊँ क्योंकि वहाँ क्राफर्ड मार्केट में नाक के बाल कुतरने की छोटी सी इलेक्ट्राॅनिक मशीन मिलती है, वह लेकर जरूर आऊँ। मैंने उससे पूछा, जोखिम भरा उपकरण तो नहीं है, नाक के बाल कुतरने के बजाय अराजक हो जाये तो नाक ही उधेड़ दे, इस पर पप्पू ने कहा नहीं भाई साहब, विदेशी है, एकदम शानदार।

इधर पीछे दो ग्राहक कसमसाकर पप्पू को खूब जल्दी से फ्री होने को कह रहे थे लेकिन पप्पू ने आज पूरी तसल्ली से मुझे महीने-पन्द्रह दिन लायक बना दिया। सब वादे और तमाम शुक्रिया के बाद जब मैं उसके सैलून से बाहर निकला, तो सच कहूँ, बड़ा अच्छा लग रहा था। पप्पू है तो सिर शेप में है, वाकई....................