गुरुवार, 12 जुलाई 2012

गैंग ऑफ वासेपुर : संक्षेप में एक पुनर्व्याख्या

 गैंग ऑफ वासेपुर देखना अपने आपमें एक बड़ा रोमांचक अनुभव है। सिनेमा देखते हुए यद्यपि उसकी विवरणात्मकता में जाने की जहमत कोई उठाना नहीं चाहता और जिस तरह से एक सेकेण्ड में बत्तीस फ्रेम निगाहों से गुजर जाते हैं, हमारी चेतना उससे कहीं ज्यादा आगे जाकर सिनेमा को देखने का काम पूरा कर डालती है। यही कारण है कि हमारे पास व्यक्त करने के लिए प्रतिक्रिया अमूमन होती ही नहीं। हम केवल शुभकामनाएँ देने और खेद व्यक्त करने की मुद्रा में ही हमेशा बने रहते हैं। यह तो गनीमत है कि इस पिछले एक दशक में लगातार सृजनात्मक परिश्रम करते हुए टिग्मांशु धूलिया, अनुराग कश्यप और पीयूष मिश्रा जैसे फिल्म सर्जकों ने अपनी जगह दिखाने और उस जगह पर आपकी तवज्जो को लाकर ठहरा देने का काम किया है वरना हम सस्ती और रंगीन इमरती खा-खाकर अपना हाजमा खराब कर चुके हैं मगर चटखारे लेने से बाज नहीं आ रहे। 

व्यक्तिश: मुझे यही लगता है कि एक सशक्त फिल्म को किस तरह गढऩा कठिन होता है, हरेक के लिए यह उतना सहज भी नहीं। अच्छी फिल्मों का रास्ता कठिन है। अच्छी फिल्मों के बनाने वालों का रास्ता भी उतना ही बल्कि उससे ज्यादा कठिन है। अनुराग कश्यप को कई बरस लग गये गैंग ऑफ वासेपुर तक आने में और यहाँ वे अल्प विराम की मुद्रा में हैं, अगले महीने वे इसी फिल्म का दूसरा भाग प्रदर्शित करेंगे। हिन्दी सिनेमा में उन्होंने यह प्रयोग बड़ी तैयारी के साथ किया है। इस फिल्म का पहला भाग देखते हुए जब हम अन्तिम दृश्य से प्रत्यक्ष होते हैं तो यह जानने की विकट जिज्ञासा रहती है कि शाहिद खान और रामाधीर सिंह की पुरानी दुश्मनी कहाँ जाकर खत्म होगी? प्रतिशोध की मानसिकता भयावह है। सरदार खान अपने पिता शाहिद खान की असमय मौत का बदला लेना चाहता है, वो कहता है, कह कर..................यही वाक्य एक पूरे गाने में भी आया है, ठीक उसी तरह जैसे प्रवृत्तियाँ अनिष्ठ गढऩे को हर दम आतुर हों। अमरीकन फिल्म गॉडफादर का नायक भी उस व्यक्ति से अपना बदला तब भी लिए बगैर नहीं रहता जब वो बीमार, लाचार और अतिवृद्ध हो चुका है क्योंकि बचपन से उसकी आँखों में उस शख्स की तस्वीर है और वह अपने पिता-माँ के साथ हुई हिंसा का एकमात्र गवाह है। 


 पूरी फिल्म में हिंसा और वीभत्स परिणाम हैं, जो बेहद नजदीक से दिखाये गये हैं। यह फिल्म दर्शक से बड़े साहस की मांग भी करती है। देखा जाये तो पहली बार हिन्दुस्तानी दर्शक एक वयस्क फिल्म देख रहा होता है, गैंग ऑफ वासेपुर देखते हुए। यह फिल्म हमारी वयस्कता की भी परीक्षा लेती है। हमें यहाँ किसी भी किस्म की संवेदना या नाटकीयता की जरा भी उम्मीद नहीं करनी चाहिए। हमें बार-बार लगता है कि हम सच के सामने खड़े हैं। सरदार खान के अपनी बीवी नगमा के साथ अन्तरंग दृश्य और चारपायी पर साथ लेटे हुए की जाने वाली बातें दरअसल उस पूरे के पूरे गोपनीय स्थान में हमें साँस रोककर खड़ा कर देती हैं जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की होती। जल्दी-जल्दी गर्भवती हो जाने से चिढ़ता हुआ सरदार और नगमा के संवाद बड़े चटख हैं। कुछ बातों पर हँसी भी आती है मगर दरअसल निजता के उस समय की वह बड़ी विडम्बना भी है। सरदार खान का एक और औरत दुर्गा से रिश्ते बना लेना, खासकर उसके उपक्रम सहज पुरुषवृत्ति का ही परिचायक है। सरदार खान पर अन्तिम दृश्य में हमले का प्रारब्ध यही स्त्री बनती है। हम यहाँ आकर दूसरे भाग के लिए ठहर अवश्य जाते हैं लेकिन एक साथ अनेक प्रश्र कौंधने लगते हैं। 

इस फिल्म के लिए वास्तव में अनुराग कश्यप, टिग्मांशु धूलिया जिन्होंने रामाधीर सिंह की भूमिका निभायी है और सम्प्रेषक-सूत्रधार पीयूष मिश्रा जो कि फरहान की भूमिका में है, तीनों को सलाम करना चाहिए। दिलचस्प है कि टिग्मांशु निर्देशक हैं मूल रूप से और हाल ही में पान सिंह तोमर से वे भी अपनी एक दशक की सृजन यात्रा का चरम पेश कर गये हैं। अनुराग कश्यप ने उन्हें रामाधीर सिंह के किरदार के लिए चुना, यह अहम है। एक निर्देशक क्या चाहता है, यह एक निर्देशक से बेहतर कौन समझ सकता है। टिग्मांशु का किरदार इसीलिए पूरी फिल्म में एक तरह का प्रतिरोधी प्रभाव बनाये रखता है। पीयूष मिश्रा इस फिल्म के बहुत कुछ हैं, सूत्रधार, किरदार, गीतकार, संगीत परिकल्पक और गायक भी। इन आयामों में बड़ी आजादी के साथ वो पूरे परिवेश के साथ सार्थक न्याय करते हैं। 


 सरदार खान मनोज वाजपेयी, शाहिद खान जयदीप अहलावत, नगमा खातून रिचा चड्ढा, दुर्गा रीमा सेन अपनी भूमिकाएँ किरदार की तरह ही निबाहते हैं। वास्तव में गैंग ऑफ वासेपुर के रूप में हम ऐसा यथार्थ देखते हैं जो जितना कल्पनातीत है उतना ही हमारे संज्ञान से अछूता भी नहीं रहा है लेकिन न तो हम वहाँ पहुँच पाये और न ही अब तक कोई आइना लेकर हमारे सामने खड़ा हुआ। अब निगाहें फिल्म के दूसरे भाग पर टिकी हैं, यदि इसी प्रवाह और वातावरण में हम उस भाग को देखते हुए वही धारणाओं को बनाये रख सके जो इस फिल्म से बनी है तो निश्चित ही अनुराग कश्यप हमारे समय के एक असाधारण फिल्मकार के रूप में स्थापित होंगे।

4 टिप्‍पणियां:

Chetna Bharadwaj ने कहा…

achchha write up hai ..

सुनील मिश्र ने कहा…

sarahne ke liye aapka abharee hoon chetna jee.

बेनामी ने कहा…

Sarita Sharma-
badi hee steek vyaakhyaa. achchhee detailing. badhai.

सुनील मिश्र ने कहा…

sarita jee, pasand karne ke liye shukria. asha hai aapne yah film zaroor dekhi hogi, naheen dekhi to zaroor dekhiyega.