गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

हास्य नाटक छुट्टी अर्थात एक झूठ और हजार मुसीबतें


इधर हिन्दी में मनोरंजक और दिलचस्प हास्य नाटकों का एक नया मौलिक शास्त्र विकसित हुआ है। इसके लिए कथानक छोटे-छोटे घटनाक्रमों अथवा मानवीय स्वभाव की विभिन्न रंगतों से लिए जाते हंै। अपने भोपाल में आज शहीद भवन में अभिनेत्री, निर्देशक नीति श्रीवास्तव के नाटक छुट्टी को देखना ऐसे ही अनुभवों से गुजरना हुआ है। यहाँ पर पहले ही दो बातें कह देने की इच्छा होती है, एक यह कि शहीद भवन सभागार सांस्कृतिक चहल-पहल का अब एक अच्छा केन्द्र बनता जा रहा है, दूसरी बात सुलझे हुए और ऊर्जावान रंगकर्मियों की पीढ़ी जिस प्रकार की सक्रियता से जानी जाती है, उसका योगदान आज के चलन और सुरुचि के नाटक गढऩे के साथ ही अपनी भी एक जगह को रेखांकित करने के लिए जाना जायेगा।

छुट्टी नाटक एक छोटे से झूठ और उससे उत्पन्न परिस्थितियों से उपजा है। पति-पत्नी के बीच नोंकझोंक हुई है, पत्नी रूठकर मायके चली गयी है। पति इन कुछ दिनों को अपने मित्रों के साथ मौज-मस्ती में व्यतीत करना चाहता है लिहाजा अपने बॉस से झूठ बोल देता है कि छुट्टी चाहिए क्योंकि पत्नी बीमार है और वे दो से तीन होने वाले हैं अर्थात परिवार में तीसरे की आमद होने को है। बॉस से फोन पर जिस तरह से घटना बयान की जाती है, बॉस कहता है कि वो शाम को घर आ रहा है, बीमार पत्नी को देखने। यहाँ पर अब सारी जुगत इस बात की है कि बॉस जब घर पर आये तो उसे बीमार पत्नी से कैसे मिलवाया जाये क्योंकि पत्नी तो मायके गयी हुई है। 

राज, अपनी नौकरानी से मनुहार करता है, दोस्त से कहता है जो अपनी प्रेमिका को इस बात के लिए राजी करने की कोशिश करता है, फैशन शो आयोजित करने वाले दोस्त से बात करता है कि ऐसा इन्तजाम हो जाये कि कोई दो घण्टे के लिए पत्नी बन जाये। घर में अचानक अपना सामान बेचने आ गयी सेल्स गर्ल से भी अपील की जाती है। बहरहाल किस्सा यह बनता है कि बमुश्किल सेल्स गर्ल इस बात के लिए तैयार हो जाती है मगर बाद में वे तीन-चार युवतियाँ भी एक-एक करके राज के घर दो घण्टे की भूमिका करने आ जाती हैं। दिलचस्प यह होता है कि उसी वक्त रूठी बीवी भी लौट आती है।

छुट्टी, स्वभावगत खामियों को उजागर करते हुए ऐसी प्रवृत्ति वाले इन्सान की मुसीबतों को रोचक ढंग से रेखांकित करता है। संजय श्रीवास्तव ने यह नाटक लिखा है और राज की भूमिका भी निभायी है। वे मुसीबतजदा पति के रूप में बहुत अच्छे ढंग से अपने काम को निबाहते हैं। सेल्स गर्ल बनी महुआ चटर्जी, बॉस बने शिलादित्य, सकू बाई बनी रोजी सतपथी और राज के दोस्त के रूप में उज्जवल सिन्हा नाटक को बांधे रखते हैं। नाटक में फिल्मों के लोकप्रिय और अब के गानों की धुनों का इस्तेमाल राज और प्रियंका तथा सकू बाई की शख्सियत को मंच पर स्थापित करने के लिए बखूबी किया गया है। 

नीति इस नाटक की निर्देशक हैं जो स्वयं अच्छी कलाकार हैं, कई नाटकों में उन्होंने श्रेष्ठ भूमिकाएँ निभायी हैं, मगर यहाँ वे एक परिकल्पनाकार के रूप में इस मौलिक नाटक की सर्जक बनकर सामने आती हैं। आखिर में वे मंच पर आकर कहती भी हैं कि यह एक हल्की-फुल्की परिकल्पना और ड्राइंगरूम कॉमेडी की तरह दर्शकों को मनोरंजन प्रदान करने के उद्देश्य रचा गया है। दर्शक परिस्थितियों और संवादों का खूब आनंद उठाते हैं और कहकहे, ठहाके गूँजते रहते हैं, कुल मिलाकर एक अच्छा नाटक।

बुधवार, 11 अप्रैल 2012

शिल्प और पेंटिंग के विलक्षण कलाकार जेराम पटेल


श्वेत-श्याम रंगों से अपनी कलाकृतियों को एक विशिष्ट पहचान देने वाले विख्यात कलाकार जेराम पटेल का जन्म 1930 में सोजित्र, गुजरात में हुआ। आपने सर जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स से कला की शिक्षा प्राप्त की। उसके पश्चात दो वर्ष सेंट्रल स्कूल ऑफ आर्ट एण्ड क्राफ्ट लन्दन में रहे।

जेराम पटेल ने अपनी निरन्तर कला साधना में डिज़ाइनिंग को एक प्रमुख आयाम के रूप में विकसित किया। कला में आकल्पन और परिकल्पना के मौलिक आग्रहों और प्रयोगधर्मी रचनाशीलता के माध्यम से आपने एक बड़ी सम्भावना का प्राकट्य खोजा और प्रेक्षकों को भी इस माध्यम के प्रति आकृष्ट किया। पटेल अध्यापन से जुड़े रहे हैं। आप एम.एस. यूनिवर्सिटी बड़ौदा में कला के प्रभाग के विभिन्न पदों पर काम करते हुए फेकल्टी ऑफ फाइन आर्ट्स के डीन के पद से सेवानिवृत्त हुए।

जेराम पटेल ने अब तक अनेक समूह एवं एकल प्रदर्शनियों में अपनी कलाकृतियों के माध्यम से सहभागिता की है। आपकी अब तक बयालीस एकल प्रदर्शनियाँ भारत एवं दुनिया के विभिन्न देशों की प्रतिष्ठित कलादीर्घाओं में आयोजित हुई हैं। विशेष रूप से चेमोल्ड आर्ट गैलरी, जहाँगीर आर्ट गैलरी, दिल्ली आर्ट गैलरी में आपकी प्रदर्शनियाँ हमेशा चर्चित रही हैं। कई कला दीर्घाओं में आपकी प्रदर्शनियाँ एक से अधिक बार भी आयोजित हुई हैं। ललित कला अकादमी, नई दिल्ली द्वारा आयोजित पहली, तीसरी, चौथी तथा पाँचवीं अन्तर्राष्ट्रीय कला त्रैवार्षिकी में आपकी महत्वपूर्ण उपस्थिति प्रशंसनीय रही है।

जेराम पटेल ने कला में अपना लंबा अनुभव जिया है। छह दशकों की उनकी सर्जना, कलात्मक एकाग्रता और दृष्टि ने समकालीन कला जगत में उनकी जगह को ऊँचे मापदंडों के साथ स्थापित किया है। वे कला में अपनी परिकल्पनाओं के एक तरह से स्वतंत्र-चेता रहे हैं। उनका काम सृजनात्मक परिवेश में अपनी अलग ही अहमियत रखता है। उन्होंने जटिलताओं को अपने जटिल कामों के माध्यम से ही दर्शाना चाहा है। उनका रंग-चयन श्वेत-श्याम रंगों की परिधि में भी अपने आवेगों और समय को चिन्हांकित करने में प्रबल रूप से सक्षम रहा है।

कला जगत में लम्बे समय से निरन्तर सक्रिय उपस्थिति और योगदान के बीच आपको अनेक मान-सम्मान और पुरस्कार मिले हैं जिनमें इमेरिट्स फैलोशिप, रॉयल सोसायटी ऑफ आर्ट्स लन्दन की फैलोशिप, अहमदाबाद का कालिदास अवार्ड शामिल हैं। आपकी कलाकृतियाँ देश-विदेश के अनेक महत्वपूर्ण कला संग्रहालयों में संग्रहीत हैं जिनमें आधुनिक कला संग्रहालय एवं ललित कला दीर्घा नई दिल्ली, आर्ट सोसायटी ऑफ इण्डिया मुम्बई, भारत भवन, स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर अहमदाबाद, म्युजियम ऑफ मॉडर्न आर्ट बगदार आदि प्रमुख हैं। जेराम पटेल को मध्यप्रदेश सरकार ने रूपंकर कलाओं के क्षेत्र में राष्ट्रीय कालिदास सम्मान से विभूषित किया है।

शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

रंगास्वामी वेडार : दक्षिण भारत के सुप्रसिद्ध टेराकोटा शिल्पी


रंगास्वामी वेडार, दक्षिण भारत के सुप्रसिद्ध टेराकोटा शिल्पी हैं। उनका जन्म तमिलनाडु राज्य में मलईउर ग्राम, तालुका आलंगुड़ी जिला पुदुक्कोटई में पारम्परिक कुम्हार परिवार में हुआ। तमिलनाडु के अंचलों में, स्थानीय भाषा में मिट्टी के पारम्परिक कामों से जुड़े लोगों को वेडार कहा जाता है। रंगास्वामी वेडार को छोटी उम्र से ही परिवार के कार्यों में गहरी रुचि और रूझान रहा है लेकिन पारम्परिक कार्य के साथ-साथ उन्होंने अपनी सर्जना को कला से जोड़कर अपनी एक अलग पहचान बनायी और इस माध्यम के वरिष्ठ कलाकारों का ध्यान आकृष्ट किया।

रंगास्वामी वेडार ने मुख्यतया घरेलू उपयोग के मिट्टी के बरतन, कोठी तथा अन्य दैनन्दिन उपयोग की वस्तुओं के साथ-साथ अय्यनार देवालयों में मिट्टी की बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ बनाने के काम को अपने शिल्प ज्ञान और नवाचार के माध्यम से प्रतिष्ठित किया है। वेडार को पारम्परिक मिट्टी शिल्प में अपने हुनर के प्रदर्शन के लिए अनेक कार्यशालाओं और प्रदर्शनियों में सहभागिता के लिए निमंत्रित किया गया है। ऐसे अवसरों पर उन्होंने अपनी कला से प्रेक्षकों और जानकारों को बहुत प्रभावित किया है। लगभग पच्चीस वर्ष पूर्व वेडार ने भोपाल स्थित राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में रहकर अय्यनार देवालय के प्रादर्शन निमा्रण हेतु मिट्टी की विशालकाय मूर्तियों का निर्माण किया था। तब से लेकर अब तक वे ऐसे अनेक शिविरों में सक्रिय सहभागिता दर्शा चुके हैं।

रंगास्वामी वेडार की अपनी कला और शिल्प के साथ उपस्थिति अनेक समारोहों का साक्ष्य भी बनी है जिसमें संस्कृति विभाग का प्रतिष्ठित आयोजन लोकरंग सहित संस्कृति संस्थान और शिल्प संग्रहालय, दिल्ली और अन्य अनेक उत्सव शामिल हैं। आप अपनी कलाकृतियों का प्रदर्शन जापान, ताइवान आदि देशों में भी कर चुके हैं। उनके द्वारा गढ़े गये मिट्टी शिल्पों में देखने वाले को उनके सजीव और प्राणवान होने का अहसास होता है, यह कौतुहल उनके सृजन का एक प्रमुख आयाम है।

स्वभाव से एकदम भोले और अतिविनम्र रंगास्वामी वेडार कुछ दिन पहले ही मध्यप्रदेश सरकार का तुलसी सम्मान ग्रहण करने भोपाल आए थे। संस्कृति मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने उन्हें एक गरिमामयी समारोह में दो लाख रुपये की राशि और सम्मान पट्टिका भेंट करके सम्मान से विभूषित किया। अलंकरण समारोह के अवसर पर उनके शिल्प भी प्रदर्शित किए गए थे। प्रदर्शित तीन शिल्पों में से एक शिल्प तो रंगास्वामी ने भोपाल में ही नव-निर्मित जनजातीय संग्रहालय में दो दिन रहकर बना डाला था।

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

धुंधली स्मृतियों में मोटी अम्माँ

मुझे मोटी अम्माँ की याद धुंधली स्मृतियों में है। मम्मी अक्सर उनके बारे में बताया करती रही हैं। मोटी अम्माँ को मैंने अपनी चार-पाँच साल की उम्र तक देखा है पर मम्मी ने मुझे बाद में बताया था कि मेरे जन्म के दो महीने बाद जब उन्होंने फिर से स्कूल में पढ़ाना जाने शुरू किया था, तब स्कूल से अन्दर जाते हुए वो मुझे मोटी अम्माँ के सुपुर्द कर दिया करती थीं। 

यह बात भोपाल की है, बाल विहार स्कूल की जो उस जगह पर बना हुआ था, जहाँ बाद में उसे तोडक़र कृष्णा टॉकीज बना दिया गया था। टॉकीज से पहले स्कूल ही बरसों से लगा करता था। चौंसठ का साल था। छप्पन में बने मध्यप्रदेश में दूर-दूर से लोग आकर रह रहे थे। हमारे पिताजी और माँ भी, जो कि कानपुर के रहने वाले थे, पहले छोटी बुआ के पास ग्वालियर फिर उसके बाद नौकरी की तलाश में भोपाल आ गये थे। यहाँ पहले मम्मी की नौकरी लगी सरकारी स्कूल में शिक्षिका के रूप में, पापा को नौकरी बाद में मिली आदिम जाति कल्याण विभाग में।

शुरूआत में सरकारी घर नहीं था। चौक में शान्तिलाल जैन जी के यहाँ नव-विवाहित माता-पिता किराये पर रहते थे। वहीं एक-दो घर बदले, इसी बीच मेरा जन्म हुआ। बाद में दक्षिण तात्या टोपे नगर में मम्मी के नाम सरकारी मकान हुआ, छत्तीस बटे चौबीस नम्बर का। यह नम्बर हम सभी को खूब रटा हुआ है। यहीं से मम्मी प्रधान अध्यापिका होते हुए रिटायर हुईं। 

बात मोटी अम्माँ की हो रही थी। नाम के अनुरूप वे मोटी नहीं थीं मगर इसी तरह उनको सब बुलाते थे। बाल विहार स्कूल के मुख्य दरवाजे के किनारे वो एक बाँस की डलिया में बेर, इमली बेचा करती थीं। वो बड़ी दूर पुट्ठा मील के पास रहा करती थीं। जीवनयापन के लिए बच्चों के खाने-पीने का सामन बेचने वो रोज आया करती थीं। मम्मी बतलाती हैं कि मोटी अम्माँ के बेर बड़े स्वादिष्ट हुआ करते थे। वे उन्हें घर में उबालकर डलिया में कपड़े से ढँककर लाती थीं। पूरे समय गीले और मुलायम बने रहने वाले बेर कागज की चुंगी बनाकर उसमें नमक-मिर्च डालकर बेचा करती थीं, जिसे सब खूब चटखारे ले-लेकर खाते थे। 

इन्हीं मोटी अम्माँ की गोद में मैं बना रहता। आधी छुट्टी स्कूल लगने के दो घण्टे बाद हुआ करती थी तब मम्मी तेजी से बाहर आकर मुझे उठा ले जातीं और मुझे दूध पिलाती, फिर मोटी अम्माँ के पास छोड़ जातीं और फिर उसके दो-ढाई घण्टे बाद पूरी छुट्टी होने पर साथ घर ले जाया करतीं। चार-पाँच साल की उम्र में मम्मी का स्कूल बदल गया था, तब मोटी अम्माँ बड़ी दूर पुराने भोपाल से घर महीना-पन्द्रह दिनों में आया करतीं, तो मम्मी से उनकी खूब बातें होतीं। मम्मी उनसे सबके हाल लेतीं और वो भी सबके हाल मम्मी को बतातीं। अक्सर मैं खेल रहा होता या उनके पास बैठता तो बड़े लाड़ से मुझे अपने पास बैठा लेतीं, अपने पान रचे मुँह से खूब चुम्मी लिया करतीं। मुझे उनके मुँह से मद्रासी पान की खुश्बू बड़ी अच्छी लगती। मैं उनसे पान माँगता, वे बड़े प्यार से अपने डोरी वाले बटुए से टुकड़ों-टुकड़ों में कत्था-चूना लगे पान से जरा सा तोडक़र मेरे मुँह में रख दिया करतीं। 

यह मद्रास पान अपनी खुश्बू के साथ आज तक मेरे जहन में बना हुआ है। यों मुझे पान खाने की जरा भी आदत नहीं है मगर यदि आग्रहवश खाना ही पड़ गया तो मद्रास पान ही खाता हूँ। उसका वही पहचाना स्वाद जैसे मुझे उसी छोटी उम्र में ले जाकर खड़ा कर देता है, जहाँ महसूस होता है, मोटी अम्माँ डोरी वाले बटुए को खींचकर खोल रही हैं, पान का टुकड़ा निकाला है और मेरे मुँह में रख दिया है। मैं अपने बचपन, मोटी अम्माँ के उस निश्छल और अगाध स्नेह और दो साल तक अपने आँचल में महफूज़ रखे रहने की याद करके सजल हो उठता हूँ। बरसों पहले मोटी अम्माँ अल्लाह को प्यारी हो गयीं थीं। मुझे लेकिन वो हमेशा याद रहती हैं। ठेठ भोपाली बोली में बात करने वालीं, काला गहरा रंग, हँसी लाजवाब और आसपास से निकलूँ तो भींचकर गोद में बिठा लेने वालीं। मैं कहूँ, मोटी अम्माँ पान दो, इस पर अभी ले मेरे बेटे, फिर उसी तरह छोटा सा बिना सुपारी का कत्था-चूना लगा टुकड़ा और हिदायत यह भी कि बच्चे ज्यादा पान नहीं खाते...............।
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गुणी, धुनी और कुछ औघड़ से अलखनंदन


विख्यात रंगकर्मी अलखनन्दन का अकस्मात निधन पिछले दिनों भोपाल में हो गया। स्वास्थ्य की दृष्टि से पिछले दो साल उनके लिए बड़े कठिन और पीड़ादायी रहे। इसी अवधि में उनको पहली बार फेफड़ों की बीमारी की शिकायत हुई। रंगसमाज में उनके अस्वस्थ होने की खबर एक अचम्भे से कम न थी क्योंकि पिछले चार-पाँच साल से अलखनन्दन अपनी सेहत और फिटनेस को लेकर बड़े सजग रहने लगे थे। घर के पास ही रवीन्द्र भवन था जहाँ वे रोज शाम को छ: बजे आ जाया करते थे। वहाँ वे लगातार तेज चाल गोलाई में कई चक्कर लगाया करते। मेल-मुलाकात-बातचीत-बहस भी इसी बीच हो जाया करती थी। न केवल भोपाल बल्कि वरीयता और गुणों के कारण मध्यप्रदेश के रंगजगत के वे दादा थे, अलख जी या दादा, आदर और प्यार का सम्बोधन था। उनकी बीमारी ने जल्दी ही उनको हतोत्साहित कर दिया वरना रचनात्मक दृष्टि से वे बहुत सशक्त और सबल थे। उनका स्वास्थ्य तेजी से गिरा, अलखजी के स्वास्थ्य की फिक्र उनके सभी चाहने वालों ने की मगर मृत्यु बीमारी के बहाने एक दिन सुबह उनको ले ही चली।

भोपाल और खासकर मध्यप्रदेश में एक वरिष्ठ और प्रतिभासम्पन्न रंगकर्मी के रूप में अलखनन्दन को मिली मान्यता उनके, जाहिर है, काम के आधार पर ही थी। उनका हर काम जिज्ञासा के साथ-साथ बड़ी उम्मीद के साथ देखा जाता था। उनकी सक्रियता लम्बी थी लेकिन उनके सृजनात्मक सरोकारों को जानने के अपने लगभग छब्बीस साल के समय की अनेक अलग-अलग घटनाएँ और बातचीत के प्रसंग याद आ रहे हैं, जो उनके साथ जुड़े थे। भारत भवन, रंगमण्डल में अलखनन्दन लम्बे समय रहे और भारत भवन से हटने के बाद अब तक निरन्तर खूब सक्रियता बनाये भी रखी। डिफेन्स ऑडिट में नौकरी करने और उससे अवकाश लेने के बाद रचनात्मक सक्रियता में आते हुए, देशबन्धु अखबार में पत्रकारिता से अपना कैरियर शुरू करने वाले अलख जी का एक कविता संग्रह घर नहीं पहुँच पाता, भी प्रकाशित है और उनके दो श्रेष्ठ और उत्कृष्ट उल्लेखनीय नाटक चन्दा बेडऩी और उजबक राजा तीन डकैत भी पाँच वर्ष पहले दिल्ली से प्रकाशित हुए हैं।

अलख जी चन्दा बेडऩी और महानिर्वाण से बखूबी और हमेशा जाने गये। इरफान, उनके प्रिय कलाकार जो पच्चीस साल की उम्र से इन नाटकों के अहम किरदार बने और आज भी उसे निभा रहे हैं। इरफान के बगैर ये दो नाटक और रंजना के बगैर चन्दा बेडऩी की कल्पना ही व्यर्थ है। अलखनन्दन ही थे जो अपने नाटकों मेें सन्तूर वादक ओमप्रकाश चौरसिया का संगीत अपरिहार्य मानते थे। बाद के उनके म्युजिकल नाटकों के लिए तालवाद्य के गुणी कलाकार सुरेन्द्र वानखेड़े अपरिहार्य रहे। उन्नीस सौ छियासी में भारत भवन और रवीन्द्र भवन में होने वाले कार्यक्रमों पर एक प्रमुख स्थानीय अखबार के लिए टिप्पणी लिखते हुए अलख जी से परिचय हुआ था, जो उनके हर नये काम के पूर्वरंग और प्रस्तुति से जुड़ा रहा। अपनी बेबाकी और स्नेहिल बरताव से ही वे लोगों से जुड़े रहे। उजबक राजा, सुपनवा के सपना, जगर मगर, सुपरिमो, मगध, गोडाला देखत हन, आगरा बाजार आदि बहुत नाटक हैं उनके, एकदम से याद नहीं आते। अलख जी को शिखर सम्मान मध्यप्रदेश से मिला था और अभी संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार घोषित हुआ था।

अलखनन्दन, कुछ नया, कुछ खास करते समय यदि उनको समाज तक ठीक से पहुँचाने का मन होता था, तो फोन करके बुला लिया करते थे। वे कहते थे, तुमसे बात करके अच्छा लगता है, जो मैं सोचता हूँ, करना चाहता हूँ, तुमको बताकर यह भरोसा होता है कि अखबार में भी ठीक ढंग से आ जायेगा। अपने नाटकों के रिपीट शो या नये प्रदर्शनों के बारे में वे हमेशा बता दिया करते थे। उनका लगभग अन्तिम सशक्त और मर्म में गहरे उतर जाने वाला नाटक चारपायी था जिसमें उन्होंने एक प्रमुख भूमिका के लिए रंगमण्डल भारत भवन के वरिष्ठ कलाकार जावेद जैदी को लिया था। आजाद ख्याल और अरसो-बरसों में अभिनय करने वाले जावेद उनके नाटक में काम कर रहे हैं, यह बात अलख जी ने हँसते हुए बतायी थी। चारपायी एक अभावग्रस्त परिवार की कठिनाइयों और झुंझलाहट को उसके विषाद के साथ प्रस्तुत करता था। इसके भोपाल सहित देश में अनेक प्रदर्शन हुए और सराहा भी गया। यह नाटक अलखनन्दन के अच्छे मित्र नाटककार रामेश्वर प्रेम का लिखा था, जिनके दो और नाटक अजातघर और सुपरिमो वे पहले खेल चुके थे।

नाटकों के आंचलिक भाषाओं में प्रयोग प्रस्तुति को लेकर उनकी अपनी विशेषज्ञता थी। चन्दा बेडऩी इसी तरह का नाटक है, पूरा बुन्देलखण्डी में। विषय भी वहीं का, एक बेडऩी की कहानी जिसको प्रेम हो जाता है, कैसे वह कूटनीति, षडयंत्र और व्यवस्था का शिकार होती है, पूरा नाटक दिलचस्प ढंग से अपनी गति के साथ चलता है मगर जब अन्त में रस्सी पर नाचती चन्दा की मौत रस्सी काट दिए जाने से होती है, एक सन्नाटा व्याप जाता है। यह नाटक अलखनन्दन की रंग-सर्जना का सशक्त पर्याय माना जायेगा। सतीश आलेकर का महानिर्वाण अलखनन्दन ने खेला जिसमें भाऊ का किरदार कभी कारन्त जी ने निभाया था, उनके बाद इस चुनौती को इरफान सौरभ ने लिया सो आज तक निभाते आ रहे हैं। ऐसे ही अलखनन्दन की संस्था नटबुन्देले से जुड़े कलाकार आनंद मिश्रा, उनके देहावसान के समय उनके पास ही थे। सुबह साँस की तकलीफ महसूस होने पर उन्होंने आनंद को बुला लिया था। चारपायी नाटक में आनंद एक अहम भूमिका निभाते हैं। अलख जी को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिलने की सूचना तब मिली जब उनकी बीमारी जितनी बढ़ी हुई थी हौसला उतना ही घट गया था। फिर भी इस अवसर के लिए दिल्ली में चन्दा बेडऩी की प्रस्तुति के लिए उन्होंने अपना मानस बना लिया था।

अलखनन्दन, सचमुच इस दुनिया से बड़े बे-मन से गये, यह न जाने क्यों भीतर से लगता है। उनको बहुत सा काम करना था। जानलेना बीमारी का सबसे बड़ा गुनाह यही था कि उसने अलख जी को भरपूर ऊर्जा के साथ थिएटर करने से वंचित कर दिया। वे अपनी असहमतियाँ बेलाग ढंग से व्यक्त करते थे। यहाँ लेकिन असहमतियों ने एक तरह से कारुणिक अवसाद का रूप ले लिया था। हमने उनको और उनके सामने अपने को भी अलग-अलग धरातल पर इतना विवश नहीं देखा था। मुम्बई में फिल्मों में अब कला निर्देशक के रूप में प्रतिष्ठित जयन्त देशमुख, रंगमण्डल भारत भवन में उनके शिष्य थे जो आखिरी समय तक उनसे जुड़े रहे। जयन्त का कहना था, कि दादा असाधारण को अपने अनुशासन के दायरे में लाकर चैन लेते थे, यह उनका एक महत्वपूर्ण गुण था। उन्होंने उत्कृष्ट रंगकर्म और उसकी सार्थकता को प्रतिष्ठापित किया। अलखनन्दन ने अपने जीते-जी नट बुन्देले नाम की संस्था खड़ी की थी। उनके सारे के सारे रंग-उपक्रम उसकी ही देन हैं। नट बुन्देले की सम्हाल और उसकी निरन्तर सक्रियता एक बड़ी चुनौती है, पर फिलहाल अलखनन्दन की अनुपस्थिति के सच से ऊबरना कठिन लगता है।
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शनिवार, 24 मार्च 2012

सप्रे संग्रहालय एक जीवन दृष्टि का साकार स्वरूप है



योगदान शब्द जीवन की सार्थकता के साथ जुड़ा होता है। योगदान करने के लिए अपनी क्षमताओं के बड़े विस्तार की आवश्यकता होती है। कुछ भीतर की बेचैनी होती है और कुछ छटपटाहट। एक सीमित आवृत्ति से बाहर जाकर रचनात्मक चेष्टा करना, एक राह बनाना, कोई साथ चले, न चले, खुद आगे बढ़कर अपनी ही चुनौतियों से जूझना और सम्भावनाओं को तलाश करना, ये सभी ऐसी कठिन प्रक्रियाएँ हंै जिनमें बहुत सारे ठहराव, सकारात्मक-नकारात्मक स्थितियाँ और उन सबमें अपनी निरन्तर, एक तरह से परीक्षा देते रहना वह भी परिणाम की परवाह किए बगैर, श्रीधर जी जैसे व्यक्तित्वों से ही सम्भव होता है। हम अपने नजदीक श्रीधर जी को देखते हैं, वर्षों से देखते रहे हैं, इसीलिए अपने संज्ञान में उनको प्रमुखता से देखते हैं। श्रीधर जी को श्रीधर जी भी नहीं, भाई साहब कहा है अतः उनका पूरा नाम लिखना धृष्टता लगता है। यह टिप्पणी जिस अभिनन्दन ग्रन्थ के लिए लिखने का सौभाग्य मिला है, उसमें उनका पूरा नाम कई जगत प्रकाशित होगा, लिहाजा पाठक को कोई तकलीफ नहीं होगी और मेरी मर्यादा भी भंग नहीं होगी।

श्रीधर जी को पद्मश्री घोषित होने की घोषणा ने मुझे बड़ी आत्मिक खुशी दी है, जिसे मैंने बिना देर किए उनसे व्यक्त किया था फोन पर पर मुझ जैसे साधारण व्यक्ति को भी अनुज सी आत्मीयता देने वाले भाई साहब ने उसी आत्मीयता के वशीभूत मेरी बात खारिज करते हुए तत्काल यह कहा था, ऐसे नहीं, घर आकर...........। उनकी खूबी है, जिसे अपनाते हैं, उससे उसी धरातल पर निबाहते हैं, किसी भी वक्त औपचारिक नहीं होते। उनका अनौपचारिक होना, दरअसल भीतर-बाहर एक लाजवाब इन्सान होना है, ऐसा लाजवाब इन्सान जिसकी पहचान हमारे आसपास अब बहुत कम हो गयी है।

निश्चित रूप से अब तक पच्चीस साल हो गये होंगे, श्रीधर जी के सम्पर्क में आये हुए। निश्चित रूप से सृजनात्मक लेखन और फिर विशेष रूप से कला-संस्कृति-साहित्य के क्षेत्र में लिखने के रुझान को सबसे पहले नईदुनिया अखबार में मदन मोहन जोशी जी ने प्रोत्साहन प्रदान किया था। 1987-88 में नईदुनिया इन्दौर से प्रकाशित होता था। तीसरे पेज की तैयारी प्रोफेसर्स काॅलोनी स्थित आॅफिस से होती थी। जोशी जी वहीं ब्यूरो प्रमुख थे जो बाद में इसी अखबार के भोपाल संस्करण के सम्पादक भी बने। नईदुनिया में दो वर्ष लिखने के बाद वहाँ दूसरे समीक्षक के जुड़ जाने के पश्चात मैंने नवभारत में अपने लिए सम्भावनाएँ तलाशनी चाहीं। श्रीधर जी उस समय नवभारत समाचार टीम के प्रमुख थे। मेरी नौकरी भी भारत भवन में उस समय शुरू हुई थी। एक दिन वहीं से दोपहर फोन करके उन्हें अपना परिचय देते हुए मैंने बताया कि मैं नईदुनिया में लिखता रहा हूँ। इन दिनों नहीं लिख रहा हूँ। अवसर मिले तो आपके साथ जुड़ना चाहता हूँ। श्रीधर जी ने तत्काल कह दिया, हम तलाश में ही थे कि कोई हमारे लिए यह काम कर दिया करे, तुम शुरू कर दो अभी से ही। उस समय भारत भवन में जयशंकर प्रसाद पर एकाग्र तीन दिवसीय आयोजन विभावरी हो रहा था। मैंने उस पर एक समग्र टिप्पणी लिखी जिसे उन्होंने दो दिन बाद ही सम्पादकीय पेज पर प्रकाशित किया। मेरे लिए यह सुखद अचम्भा था। फिर यही होता रहा कि आयोजन चलते रहे। मैं अपनी टिप्पणी भेज दिया करता, दूसरे दिन वो प्रकाशित हो जाया करती। 

फोन पर उनसे क्या भेजा, मिला कि नहीं, छप गया या छप रहा है, यह बात हो जाया करती थी। तीन-चार माह बाद एक दिन उन्होंने फोन पर ही कहा, एक दिन आकर मिलो, कई समीक्षाएँ छप गयीं, उनका मानदेय ले जाना। तभी उन्होंने यह भी बताया था कि दोपहर में ग्यारह बजे से कुछ समय हम किलोल पार्क के पास आचार्य नरेन्द्र देव पुस्तकालय के ऊपर सप्रे संग्रहालय में मिलते हैं। सप्रे संग्रहालय इस तरह भारत भवन के नजदीक ही था। एक दिन मिलने गया और फिर एक सिलसिला ऐसा बना कि उनके साथ ही नवभारत से जुड़ गया जहाँ नियमित रूप से कला समीक्षक के रूप में कार्य तो किया ही, चर्चा और परामर्श के साथ खुलकर काम करने के अवसर और आजादी के रूप मंे पहले सप्ताह में एक बार कला-संस्कृति के पेज का सम्पादन, शनिवार को सिनेमा के परिशिष्ट का सम्पादन और बाद में रविवारीय परिशिष्ट का सम्पादन भी किया। यह सब काम श्रीधर जी के वहाँ सम्पादक होने तक बढ़ते और स्वतंत्रतापूर्वक करने को मिले। नवभारत में सम्पादक रहते हुए जो अधिकार और जगह श्रीधर जी ने मुझे जैसे अल्पकालीन लेखक को प्रदान की उसे मैं अपना सौभाग्य मानता हूँ। बाद में जब शासकीय सेवा की मेरी व्यस्तताएँ बढ़ीं, भारत भवन से मध्यप्रदेश फिल्म विकास निगम, प्रतिनियुक्ति पर मध्यप्रदेश गृह निर्माण मण्डल और बाद में संस्कृति संचालनालय में आते हुए सारे रचनात्मक नियमित काम छूटते गये, मैं नवभारत और श्रीधर जी से उस तरह नियमित जुड़ा नहीं रह सका फिर भी जब कभी उनको मुझ से कराने योग्य काम नजर आता, मुझे साधिकार आदेशित किया करते थे। ऐसे ही एक दिन जब धारावाहिक क्योंकि सास भी कभी बहू थी, की बहू तुलसी कौन बनेगा करोड़पति में अमिताभ बच्चन के सामने हाॅट सीट पर आयी तब उन्होंने फोन करके इस आदेश के साथ तलब किया था, रात को 9 बजे नवभारत आ जाओ, यहीं मेरे कमरे में पूरा कार्यक्रम देखो और तत्काल लिखो, पहले पेज पर जायेगा। वैसा ही करते हुए मैंने उसको प्रस्तुत किया, शीर्षक डालकर उनके सामने रख दिया। श्रीधर जी ने शीर्षक के नीचे मेरा नाम लिखा, सुनील मिश्र और पेज एक के प्रभारी को भेज दिया। वह एक मिनट में उनके सामने आकर कहने लगे, सर नाम से जाना है? यह तो हमारे यहाँ के एम्पलाई नहीं हैं। इस पर उनका दो टूक उत्तर था, हमने लिख दिया है न? नाम से ही जायेगा, दैट्स आल।

आचार्य नरेन्द्र देव पुस्तकालय में सप्रे संग्रहालय की शुरूआत एक बिरवे के रोपे जाने की तरह थी। श्रीधर जी ने जो काम करने का बीड़ा उठाया था वह अनूठा था। हम सब अपने जीवन में वक्त से बाहर हो जाने वाली चीजों को खारिज ही तो किया करते हैं। घर में बहुत सारा सामान एक वक्त में अनुपयोगी हो जाता है, उसे हम बाहर का रास्ता दिखा दिया करते हैं। बेच देते हैं और बिकने योग्य नहीं रहा तो फेंक देते हैं। ऐसी बहुत सी चीजें हैं जो अनुपयोगी होने में लम्बा वक्त लेती हैं मगर हमारी निगाह उन पर बराबर बनी रहती है। हम पूरी तरह उनके व्यर्थ हो जाने की व्यग्रता से प्रतीक्षा करते हैं। पढ़ने-लिखने की चीजें जिन्हें पठनीय साहित्य कहा जाता है, पहले अर्थात तीस-चालीस साल पहले अखबारों के साथ-साथ विभिन्न पत्रिकाओं के रूप में भी आया करता था। मुखिया के लिए अखबार के साथ-साथ धर्मयुग या साप्ताहिक हिन्दुस्तान अपरिहार्य होता था। महिलाओं के लिए सरिता और मनोरमा की बराबर जगह हुआ करती थी। बच्चों के लिए उतनी ही बराबरी से चम्पक, नन्दन, पराग या चन्दामाला घर में अखबार वाले का लाना उसके मुख्य काम के साथ शामिल हुआ करता था। ये पत्रिकाएँ यदि समय पर न मिलें तो मन व्याकुल होने लगता था, अखबार वाले से पूछा जाता था, अब तक क्यों नहीं आया, कब आयेगा? खैर अब न तो ये प्रकाशन हैं और न ही उतने लोकतांत्रित ढंग से परिवार में साहित्य आता ही है, पर ये सभी साहित्य और अखबार भी एक दिन रद्दी पेपर खरीदने वाले के ठेले पर लदकर हमारे घर से विदा होते थे। बाद में उनका सामान की पुडि़या या लिफाफा बनकर समाप्त हो जाना जैसे उनका हश्र होता। मैं श्रीधर जी की यहाँ पर एक बड़ी सशक्त भूमिका देखता हूँ। श्रीधर जी ने इस धरातल पर अस्तित्वहीन होती धरोहरों को मूल्यवान बनाने, सिद्ध करने में एक बड़ी पहल की। सप्रे संग्रहालय का पूरा नाम है, माधवराव सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान। श्रीधर जी को इस काम की शुरूआत करते हुए भीतर से बड़े कचोट भरे अनुभव हुए हैं। अक्सर पीछे मुड़कर न देखने वाली बात असाधारण जीवट को प्रमाणित करने वाले व्यक्तित्व के साथ जुड़ती है मगर श्रीधर जी ने इस संग्रहालय के माध्यम से एक प्रकार से बीसवीं सदी का पुनरावलोकन करना शुरू किया। निश्चय ही यह काम घर बैठकर नहीं हो सकता था। इसके लिए कश्मीर से कन्याकुमारी तक जाना होता, जो श्रीधर जी गये भी। पहले श्रीधर जी को बताना होता था कि वे क्या करने की कोशिश कर रहे हैं, किस विरासत को संरक्षित करने का संकल्प उन्होंने लिया हुआ है, बाद जब उनके काम की सार्थकता को आँका जाना शुरू हुआ तो सामने से लोगों ने आकर श्रीधर जी से कहा कि आपको दरअसल नहीं पता कि आपने क्या काम करने की कोशिश की, कितना उसमें समय, जीवन और जीवट लगाया और क्या कर दिखाया है! अपनी स्मृतियांे में मुझे जान पड़ता है, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्रियों श्री अर्जुन सिंह, श्री मोतीलाल वोरा, श्री सुन्दरलाल पटवा, श्री दिग्विजय सिंह, श्री बाबूलाल गौर, श्री शिवराज सिंह चैहान तक सभी ने श्रीधर जी के जीवट को प्रोत्साहित किया और समय-समय पर उनके यज्ञ में क्षमताभर योगदान करके उनके सार्थक स्वप्न को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। सप्रे संग्रहालय के स्थापना दिवस समारोहों में ये विभूतियाँ जब-जब आयीं, काम को बढ़ता और समृद्ध होता देखा और श्रीधर जी की भूरि-भूरि प्रशंसा करके गये। 

माधवराव सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान की यात्रा बड़ी लम्बी है, आचार्य नरेन्द्र देव पुस्तकालय के छोटे से कमरे और हाॅल से काम शुरू होता है। उस समय यह सपना ही होता है कि कभी संग्रहालय का अपना भवन होगा। एक दिन वह भी आता है जब संग्रहालय के भवन के लिए कोलार मार्ग पर जमीन मिलती है और भूमि पूजन होता है। एक दिन वह भी होता है जब भवन बनकर तैयार होने को है और आचार्य नरेन्द्र देव पुस्तकालय से सामान यहाँ आना शुरू हो गया है। एक दिन वह भी जब यह विधिवत संस्थान नये भवन में स्थापित हो जाता है। मुझे याद है, जब आचार्य नरेन्द्र देव पुस्तकालय भवन में संग्रहालय हुआ करता था, एक दिन श्रीधर जी ने मुझसे कहा था कि कोई अच्छा शिल्पकार देखो, हमें संग्रहालय के लिए नारद जी और सप्रे जी की प्रतिमा बनवानी है। श्रीधर जी कहते रहे हैं कि नारद जी आदिपत्रकार थे जो जिनसे देवी-देवता समाचार पूछा करते थे और सुनाने का अनुरोध किया करते थे। अब इसमें पहला काम तो यही था कि नारद जी की तस्वीर कहाँ मिले? तलाश उन सब जगहों पर की गयी जहाँ पूजा-पाठ का सामान और भगवान की तस्वीरें मिला करती थीं। नारद जी की उपस्थिति प्रायः देवी-देवताओं के भव्य दरबार वाले चित्रों में कहीं एक तरफ वीणा लिए होती थी मगर ऐसा फोटो दुर्लभ था। आखिर एक बार तीन-चार ऐसे फोटो इकट्ठा कर पाये जिनमें नारद जी दीख रहे थे। श्रीधर जी को एक छबि पसन्द आयी और फिर उन्होंने सप्रे जी का भी एक फोटो दिया। ये दोनों प्रतिमाएँ हमने एक कुशल मूर्ति शिल्पी दुलालचन्द्र मन्ना से बनवायीं। मूर्तियाँ बनने में लगभग बीस दिन का समय लगा था। मुझे याद है, स्कूटर पर श्रीधर जी के साथ हर दो-चार दिन में बनती हुई मूर्ति देखने जाना होता था। जब वे मूर्तियाँ बनकर तैयार हुईं तो स्कूटर में ही पीछे बैठकर हाथ में उठाये हम संग्रहालय भवन पहुँचे थे। श्रीधर जी की खुशी का ठिकाना नहीं था। वे मूर्तियाँ आज भी अपने समय की धरोहर हैं, संग्रहालय में श्रीधर जी के पास।

नये भवन में माधवराव सप्रे संग्रहालय ने वास्तव में अपने विराटपन को पाया है। एक सपना जो नरेन्द्र देव पुस्तकालय भवन में, एक बिरवे के रूप में रोपा गया था, वह विशाल वृक्ष बनकर अपनी गरिमा को अपने स्थायी स्थान में प्राप्त कर रहा है। यह वृक्ष इतना घना हो गया है कि इसकी छाया में हम अपने रचनात्मक वक्त के साथ स्मृतियों में जा सकते हैं, उन घटनाओं के एक तरह से पुनर्साक्षी हो सकते हैं जिनके बारे में हमने केवल सुना है। मेरी जानकारी में वे गणितीय आँकड़े नहीं हैं जिनका उल्लेख सप्रे संग्रहालय का बखान करते हुए शायद जरूरी होता है, मैं इतना विश्वास जरूर रखता हूँ, करता हूँ कि पठनीय विरासत की कोई भी ऐसी सामग्री जिसका आप आँख मूँदकर स्मरण भर करो, संग्रहालय में किसी एक अच्छे स्थान पर मुकम्मल सन्दर्भ के साथ आपको करीने से रखी मिलेगी। किसी भी चीज की जान से ज्यादा हिफाजत करने को हमारी नानी, दूध-पूत की तरफ देखभाल करने वाली कहावत से जोड़ती थीं। श्रीधर जी इस संग्रहालय की हर एक चीज की सचमुच दूध-पूत की तरह हिफाजत करते हैं। इस संग्रहालय ने श्रीधर जी को अपने में इतना रमा लिया कि उन्होंने पत्रकारिता में अपनी प्रखर दृष्टि, प्रभाव, सक्रियता और साहस से कम समय में ही अर्जित उपलब्धियों के शीर्ष से भी एक सन्त की तरह निर्लिप्त होकर दिखा दिया। उस समय वे कहने लगे थे कि हमने जो काम शुरू किया है, सही मायने में हमारी जरूरत और जगह उसी काम को निष्ठापूर्वक आगे बढ़ाने में है। श्रीधर जी वास्तव में इस संग्रहालय के एक तरह से पर्याय हो गये हैं। उनकी साँसें वहीं बसती हैं, यही संग्रहालय श्रीधर जी को जीवन में आये युवा विवाहित और प्रतिभाशाली बेटे के बिछोह जैसे असहनीय और कठिन तथा त्रासद दुखों को भी सहने की शक्ति दे रहा है। 

मैं अपने आपको भाग्यवान मानता हूँ कि रचनात्मक कर्म में अपनी जगह बनाते हुए, सचेत होते हुए मुझे श्रीधर जी का सान्निध्य और स्नेह मिला। हमने उनकी खूब डाँट भी खायी है मगर वे अत्यन्त साफ दिल मनुष्य हैं जो मन में कलुष नहीं रखते। उनकी साफगोई और बेलाग होने की सख्ती बहुतेरों को हो सकता है उनसे दूर भी करती हो, मगर यह इन्सान सचमुच एक कच्चा नारियल है, दिल का बड़ा उजला, स्वच्छ और दूधिया। यह बात वही जान सकता है जो उनके उस अन्तःस्थल तक जाकर उनकी पहचान कर सके। मैं सौभाग्यशाली हूँ कि मुझे सप्रे संग्रहालय ने 2009 के यशवन्त अरगरे सम्मान से सम्मानित किया। अपने जीवन में सप्रे संग्रहालय और श्रीधर जी के सान्निध्य को अनमोल मानता हूँ। श्रीधर जी को पद्मश्री मिलना सामाजिक कृतज्ञता का सार्थक पर्याय है। उनका यश सतत समृद्ध हो, यही कामना है।
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सोमवार, 5 मार्च 2012

पान सिंह तोमर : चम्बल के बीहड़ में फिर एक विडम्बना


एक बार फिर आँखों के सामने चम्बल के बीहड़ ताज़ा हो गये। बरसों पहले जब शेखर कपूर की बैण्डिट क्वीन देखने का मौका मिला था, तब चम्बल के बीहड़ अपने पूरे यथार्थ के साथ दिखायी दिए थे और अब इस बार जब तिग्मांशु धूलिया की फिल्म पान सिंह तोमर देखी। पान सिंह तोमर फिल्म का इन्तजार लम्बे समय से था क्योंकि निर्देशक ने इस वक्त पर बनाकर पूरा कर दिया था। शायद तीन बरस पहले जब इस फिल्म के नायक इरफान से उनकी तब के समय की फिल्म बिल्लू को लेकर बातचीत कर रहा था, तब उन्होंने बताया था कि वे एक महत्वपूर्ण फिल्म के सिलसिले में मध्यप्रदेश-राजस्थान सीमा के निकट लोकेशन के नजदीक धौलपुर में लम्बे समय रहकर काम पूरा करने वाले हैं। यह वही फिल्म थी। इरफान ने इस फिल्म के विषय को लेकर थोड़ा बताया था, तभी से फिल्म को लेकर जो एक दिलचस्पी जगी थी वो अब जाकर दो दिन पहले पूरी हुई जब दिल्ली में इसे देखने का मौका आया।

ऐसी अनेक जि़न्दगानियाँ हैं जिनके सपनों के साथ समाज में अच्छा सलूक नहीं हुआ। प्रतिरोधी प्रवृत्तियों ने सकारात्मक जीवन और विचार को जब-जब चोट पहुँचाने और त्रास देने का काम किया तब-तब एक न एक बड़ा प्रतिवाद हुआ। वह ऐसे भयावह रूप में सामने आया, जिसने आखिरकार सब कुछ नष्ट करके रख दिया। ऐसा बहुत बार होता है जब समाज के खलनायकों से अपना प्रतिशोध लेते हुए वो नायक भी मर जाता है, जो निर्दोष होता है। यहाँ पर खड़ा होने वाला सन्नाटा बहुत सारे सवाल करता है जिसके उत्तर हमेशा नीचे देखते सिर ही हुआ करते हैं। इन्साफ जैसे लम्बी अनुपस्थिति की चीज़ हो गया है।

पान सिंह तोमर की कहानी इसी नाम के एक बागी का साक्षात्कार करने वाले एक पत्रकार की हेकड़ी से शुरू होती है। जब यह पत्रकार उस बागी के सामने होता है तो इतना भयभीत होता है कि बस पेशाब कर देना ही बाकी रह जाता है। उसी मन:स्थिति में वह अपने सवाल करता है। पान सिंह तोमर आरम्भ के एक-दो मूर्खतापूर्ण सवालों से उसको भगाने लगता है मगर तीसरे सवाल से वह फिर अपनी बात करना शुरू करता है। एक बड़े ऊर्जावान युवा की जि़न्दगी में ऊगते हुए सपनों के साथ होने वाली छल की यह दास्ताँ है। यह धावक पहले फौज में भरती होता है मगर वहाँ उसकी खुराक को लेकर उसकी फजीहत की जाती है तो फौज के खिलाड़ी के रूप में वह अपनी बदल करवा लेता है। पान सिंह तोमर की जिन्दगी में फिर दौडऩा और पदक जीतना उसकी दुनिया को बदल देते हैं।


 उसके परिवार में माँ है, पत्नी है, बेटा है जो मुरैना के पास एक गाँव में रहते हैं। वह जब नौकरी पूरी करके लौटता है तो उसे पता चलता है कि उसके खेत, चचेरे भाई ने हथिया लिए हैं। वह माँगने जाता है तो बेइज्जत होता है, गाली खाता है और मार भी खाने की स्थितियाँ बनती हैं। अपने सारे मैडल और सर्टिफिकेट लेकर दरोगा के पास जाता है तो वह यह सब बाहर फेंक देता है और बेइज्जती भी करता है। यहीं से पान सिंह तोमर के बागी होने की कहानी शुरू होती है। लड़ाई लम्बे समय परिवार के साथ ही है, चचेरा भाई मारकाट करवा रहा है, खून बहा रहा है, बदले में पान सिंह तोमर भी वही कर रहा है। बदले के उत्तर में बदला जैसे अन्तहीन समाधान है।

इस फिल्म के रूप में हमारे सामने जैसे यथार्थ घटित होता है। बेईमान पुलिस चचेरे भाई के पक्ष में है और उसके घर में छावनी बनाकर सुरक्षा कर रही है लेकिन पान सिंह तोमर हमला करके उस पुलिस अधिकारी के भी कपड़े उतरवा देता है जिसने उसका मैडल और सर्टिफिकेट उसके सामने जमीन पर फेंक दिए थे। यहाँ पर वर्दी से माफी मँगवाने का प्रसंग काफी महत्वपूर्ण है। फिल्म का एक दूसरा पहलू यह है कि एक तटस्थ पुलिस अफसर आकर डाकुओं का समूल सफाया करना शुरू करता है। पान सिंह तोमर अपना बदला पूरा करना चाहता है लेकिन मुखबिरों और धोखेबाजों के बीच अनेक बार उसकी स्थिति बड़ी कठिन हो जाती है। पान सिंह तोमर चूँकि शुरू से ही धावक रहता है, उसके बीहड़ों में भागने के दृश्य बहुत सजीव ढंग से फिल्माए गये हैं। इरफान ने सचमुच पान सिंह तोमर को पूरा ही जी-कर बताया है इस फिल्म में।

विकास और बदलाव की तथाकथित बयार से दूर किसी गाँव और वहाँ के घरों की क्या समस्याएँ हुआ करती हैं, यह हम इस फिल्म मेें देखते हैं। निर्देशक ने बड़ी ही सूझबूझ के साथ एक-एक दृश्य फिल्माये हैं। संजय चौहान की पटकथा में सहभागी रहे तिग्मांशु ने इस फिल्म को रोचक भी बनाया है, प्रस्तुतिकरण के लिहाज से। फौज से अवकाश पर आने वाले पान सिंह के अपनी पत्नी के साथ देहाती रोमांस के रंग बड़े दिलचस्प हैं। खासतौर पर वे प्रसंग जब अन्तरंगता का इच्छुक पान सिंह घर में अपने दोनों छोटे बच्चों को लेमनचूस दिलाने के लिए दूर की दुकान पर जाने के लिए कहता है। ऐसे में सचमुच तीस-चालीस साल पहले अस्तित्व से जा चुके लेमनचूस की याद आती है। बच्चों को लेमनचूस दिलाने के प्रसंग दो-तीन बार हैं। 

पान सिंह तोमर के अपने कोच के साथ रिश्ते भी कम दिलचस्प नहीं हैं। कोच सिख है, जुबाँ पर आधी-अधूरी गाली रहती है। एक दिन आज्ञापालक पान सिंह, कोच से कह देता है, ये माँ की गाली-वाली देकर हमसे बात मत किया करो, मन को लग गयी तो हम गोली भी मार देते हैं, फिर कोच के पैर भी छू लेता है। पान सिंह बरसों बाद रिटायर होने के बाद जब बागी बन चुका होता है, उसी बीच एक मौके, अपने फौज में भरती हो चुके बेटे से मिलने जाता है। वह दृश्य बड़ा प्रभाव देता है, वह सबकी नजर बचाकर बेटे से बात कर रहा है, बेटे पर निहाल हो रहा है, अपनी पत्नी के बारे में पूछ रहा है। लौटते हुए एक बंगले के बाहर तख्ती में अपने कोच का नाम देखता है तो घर के अन्दर चला जाता है। कोच उसे समर्पण करने को कहता है जो उसे मंजूर नहीं। यहाँ पर एक डायलॉग अच्छा है, वह कहता है, सामने से निकल रहा था, नाम देखा तो गाली खाने चला आया।

पूरी फिल्म में पान सिंह तोमर का एक डाकू और बागी को अलग-अलग विश्लेषित करना बहुत महत्वपूर्ण लगता है। अपने जैसे लोगों का बागी कहा जाना उसे नागवार गुजरता है, इसीलिए वह फर्क करके बतलाता है कि बागी और डाकू में क्या फर्क है? फिल्म में पान सिंह तोमर को एक चतुर और सजग बागी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। हर वक्त धोखे को लेकर वह बड़ा सजग रहता है मगर आखिर में उसकी मौत जिस मुठभेड़ में होती है, वह धोखे का ही परिणाम होती है जो उसके सबसे विश्वसनीय साथी द्वारा किया जाता है। 


 फिल्म में अपनी तरह की कसावट है। निर्देशक ने लेखक के साथ एक अच्छी पटकथा पर काम किया है। परिवेश चम्बल का है, वहीं की बोली है, वहीं जीवन के भटकाव, जुल्म और शोषण से उपजी एक त्रासद कथा का एक तरह से पुनर्फिल्मांकन है, क्योंकि यह सच्ची कहानी जो है। इस किरदार का धावक होना सचमुच पूरी फिल्म को एक अलग ही गति देता है। पान सिंह तोमर के रूप में नायक इरफान खान ने अत्यन्त प्रशंसनीय काम किया है। वे इस तरह दीखते हैं कि किरदार होकर रह जाते हैं। दर्शक और समीक्षक लम्बे समय तक उनके इस किरदार को भुला नहीं पायेंगे। एक तरह से उनके कैरियर में यह फिल्म मील का पत्थर है। ग्लैमरस माही गिल की भूमिका पान सिंह तोमर की पत्नी की है। एक भोली ग्रामीण पत्नी के छोटे से किरदार को अच्छा रंग दिया है उन्होंने। राजेन्द्र गुप्ता, कोच बने हैं। तिग्मांशु ने किरदारों प्रभावी बनाने के लिए रंगमंच के श्रेष्ठ कलाकारों को अच्छी भूमिकाएँ दी हैं, इसलिए पूरी फिल्म यथार्थ के बड़े नजदीक लगती है। पान सिंह तोमर, वास्तव में इरफान खान के लिए ही एक बड़ी चुनौती थी, उन्होंने इसे बखूबी अन्जाम भी दिया है। 

पान सिंह तोमर, बीहड़ में भटकाव और दिशाहीनता की एक ऐसी दास्ताँ है जो पिछली सदी में अभिशप्त चम्बल में अपनी ही तरह की जाने कितनी सच्ची कथाएँ और मर्मभेदी वृत्तान्त को समेटे हुए है। जि़न्दगी के ऊबड़-खाबड़ का चम्बल के ऊबड़-खाबड़ से कभी खत्म न होने वाला कदम-ताल हमें एक बारगी फिर उस पुराने समय में ले जाता है। यह फिल्म सिनेमा के उत्कृष्ट के पक्ष में अहम सिनेमाई दस्तावेज है।
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