गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

हास्य नाटक छुट्टी अर्थात एक झूठ और हजार मुसीबतें


इधर हिन्दी में मनोरंजक और दिलचस्प हास्य नाटकों का एक नया मौलिक शास्त्र विकसित हुआ है। इसके लिए कथानक छोटे-छोटे घटनाक्रमों अथवा मानवीय स्वभाव की विभिन्न रंगतों से लिए जाते हंै। अपने भोपाल में आज शहीद भवन में अभिनेत्री, निर्देशक नीति श्रीवास्तव के नाटक छुट्टी को देखना ऐसे ही अनुभवों से गुजरना हुआ है। यहाँ पर पहले ही दो बातें कह देने की इच्छा होती है, एक यह कि शहीद भवन सभागार सांस्कृतिक चहल-पहल का अब एक अच्छा केन्द्र बनता जा रहा है, दूसरी बात सुलझे हुए और ऊर्जावान रंगकर्मियों की पीढ़ी जिस प्रकार की सक्रियता से जानी जाती है, उसका योगदान आज के चलन और सुरुचि के नाटक गढऩे के साथ ही अपनी भी एक जगह को रेखांकित करने के लिए जाना जायेगा।

छुट्टी नाटक एक छोटे से झूठ और उससे उत्पन्न परिस्थितियों से उपजा है। पति-पत्नी के बीच नोंकझोंक हुई है, पत्नी रूठकर मायके चली गयी है। पति इन कुछ दिनों को अपने मित्रों के साथ मौज-मस्ती में व्यतीत करना चाहता है लिहाजा अपने बॉस से झूठ बोल देता है कि छुट्टी चाहिए क्योंकि पत्नी बीमार है और वे दो से तीन होने वाले हैं अर्थात परिवार में तीसरे की आमद होने को है। बॉस से फोन पर जिस तरह से घटना बयान की जाती है, बॉस कहता है कि वो शाम को घर आ रहा है, बीमार पत्नी को देखने। यहाँ पर अब सारी जुगत इस बात की है कि बॉस जब घर पर आये तो उसे बीमार पत्नी से कैसे मिलवाया जाये क्योंकि पत्नी तो मायके गयी हुई है। 

राज, अपनी नौकरानी से मनुहार करता है, दोस्त से कहता है जो अपनी प्रेमिका को इस बात के लिए राजी करने की कोशिश करता है, फैशन शो आयोजित करने वाले दोस्त से बात करता है कि ऐसा इन्तजाम हो जाये कि कोई दो घण्टे के लिए पत्नी बन जाये। घर में अचानक अपना सामान बेचने आ गयी सेल्स गर्ल से भी अपील की जाती है। बहरहाल किस्सा यह बनता है कि बमुश्किल सेल्स गर्ल इस बात के लिए तैयार हो जाती है मगर बाद में वे तीन-चार युवतियाँ भी एक-एक करके राज के घर दो घण्टे की भूमिका करने आ जाती हैं। दिलचस्प यह होता है कि उसी वक्त रूठी बीवी भी लौट आती है।

छुट्टी, स्वभावगत खामियों को उजागर करते हुए ऐसी प्रवृत्ति वाले इन्सान की मुसीबतों को रोचक ढंग से रेखांकित करता है। संजय श्रीवास्तव ने यह नाटक लिखा है और राज की भूमिका भी निभायी है। वे मुसीबतजदा पति के रूप में बहुत अच्छे ढंग से अपने काम को निबाहते हैं। सेल्स गर्ल बनी महुआ चटर्जी, बॉस बने शिलादित्य, सकू बाई बनी रोजी सतपथी और राज के दोस्त के रूप में उज्जवल सिन्हा नाटक को बांधे रखते हैं। नाटक में फिल्मों के लोकप्रिय और अब के गानों की धुनों का इस्तेमाल राज और प्रियंका तथा सकू बाई की शख्सियत को मंच पर स्थापित करने के लिए बखूबी किया गया है। 

नीति इस नाटक की निर्देशक हैं जो स्वयं अच्छी कलाकार हैं, कई नाटकों में उन्होंने श्रेष्ठ भूमिकाएँ निभायी हैं, मगर यहाँ वे एक परिकल्पनाकार के रूप में इस मौलिक नाटक की सर्जक बनकर सामने आती हैं। आखिर में वे मंच पर आकर कहती भी हैं कि यह एक हल्की-फुल्की परिकल्पना और ड्राइंगरूम कॉमेडी की तरह दर्शकों को मनोरंजन प्रदान करने के उद्देश्य रचा गया है। दर्शक परिस्थितियों और संवादों का खूब आनंद उठाते हैं और कहकहे, ठहाके गूँजते रहते हैं, कुल मिलाकर एक अच्छा नाटक।

4 टिप्‍पणियां:

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

नाटक के मुख्य पुरुष पात्र का अभिनय मजेदार रहा होगा, क्योंकि भूमिका निभाते समय घटना जीवंत हो जाती है और ऐसी परिस्थिति में फंसा हुआ आदमी बेचारा बना दिखता है. आपकी समीक्षा से ही नाटक का दृश्य उपस्थित हो गया और हास्य-रोमांच का अनुभव हुआ. आभार.

सुनील मिश्र ने कहा…

jenny jee, natak wakai dilchap aur anand dene wala tha. hall men darshak bhee bharpoor khush hote hue. ek mahila nirdeshak ka kam tha, bade aatmvishwas se unhone kiya. abharee hoon aapne saraha.

kase kahun?by kavita verma ने कहा…

poore natak ki sameeksha natak dekhane jaisa aanad de gayee...sundar..

सुनील मिश्र ने कहा…

abharee hoon kavita jee, aapko behtar lagaa. bahut-bahut shukria.