शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

रंगास्वामी वेडार : दक्षिण भारत के सुप्रसिद्ध टेराकोटा शिल्पी


रंगास्वामी वेडार, दक्षिण भारत के सुप्रसिद्ध टेराकोटा शिल्पी हैं। उनका जन्म तमिलनाडु राज्य में मलईउर ग्राम, तालुका आलंगुड़ी जिला पुदुक्कोटई में पारम्परिक कुम्हार परिवार में हुआ। तमिलनाडु के अंचलों में, स्थानीय भाषा में मिट्टी के पारम्परिक कामों से जुड़े लोगों को वेडार कहा जाता है। रंगास्वामी वेडार को छोटी उम्र से ही परिवार के कार्यों में गहरी रुचि और रूझान रहा है लेकिन पारम्परिक कार्य के साथ-साथ उन्होंने अपनी सर्जना को कला से जोड़कर अपनी एक अलग पहचान बनायी और इस माध्यम के वरिष्ठ कलाकारों का ध्यान आकृष्ट किया।

रंगास्वामी वेडार ने मुख्यतया घरेलू उपयोग के मिट्टी के बरतन, कोठी तथा अन्य दैनन्दिन उपयोग की वस्तुओं के साथ-साथ अय्यनार देवालयों में मिट्टी की बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ बनाने के काम को अपने शिल्प ज्ञान और नवाचार के माध्यम से प्रतिष्ठित किया है। वेडार को पारम्परिक मिट्टी शिल्प में अपने हुनर के प्रदर्शन के लिए अनेक कार्यशालाओं और प्रदर्शनियों में सहभागिता के लिए निमंत्रित किया गया है। ऐसे अवसरों पर उन्होंने अपनी कला से प्रेक्षकों और जानकारों को बहुत प्रभावित किया है। लगभग पच्चीस वर्ष पूर्व वेडार ने भोपाल स्थित राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में रहकर अय्यनार देवालय के प्रादर्शन निमा्रण हेतु मिट्टी की विशालकाय मूर्तियों का निर्माण किया था। तब से लेकर अब तक वे ऐसे अनेक शिविरों में सक्रिय सहभागिता दर्शा चुके हैं।

रंगास्वामी वेडार की अपनी कला और शिल्प के साथ उपस्थिति अनेक समारोहों का साक्ष्य भी बनी है जिसमें संस्कृति विभाग का प्रतिष्ठित आयोजन लोकरंग सहित संस्कृति संस्थान और शिल्प संग्रहालय, दिल्ली और अन्य अनेक उत्सव शामिल हैं। आप अपनी कलाकृतियों का प्रदर्शन जापान, ताइवान आदि देशों में भी कर चुके हैं। उनके द्वारा गढ़े गये मिट्टी शिल्पों में देखने वाले को उनके सजीव और प्राणवान होने का अहसास होता है, यह कौतुहल उनके सृजन का एक प्रमुख आयाम है।

स्वभाव से एकदम भोले और अतिविनम्र रंगास्वामी वेडार कुछ दिन पहले ही मध्यप्रदेश सरकार का तुलसी सम्मान ग्रहण करने भोपाल आए थे। संस्कृति मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने उन्हें एक गरिमामयी समारोह में दो लाख रुपये की राशि और सम्मान पट्टिका भेंट करके सम्मान से विभूषित किया। अलंकरण समारोह के अवसर पर उनके शिल्प भी प्रदर्शित किए गए थे। प्रदर्शित तीन शिल्पों में से एक शिल्प तो रंगास्वामी ने भोपाल में ही नव-निर्मित जनजातीय संग्रहालय में दो दिन रहकर बना डाला था।

2 टिप्‍पणियां:

जाटदेवता संदीप पवाँर ने कहा…

गजब जानकारी, मेरे लिये बहुत काम की है।

सुनील मिश्र ने कहा…

आपका हार्दिक आभारी हूँ, संदीप जी। मुझे अपना लिखा सार्थक लगा।