शुक्रवार, 11 मई 2012

इश्कजादे : प्रभावी कई स्तरों पर मगर एक बड़ी खामी के साथ


फिल्म निर्माण के बड़े घरानों में दूसरी पीढ़ी, स्वयं अपनी समृद्ध विरासत को दक्षता के साथ आगे चलाने के बजाय अवसर अपेक्षित प्रतिभाशाली युवा पीढ़ी को पहचान कर अपने बैनर पर काम करने का मौका दे रही है। दृष्टि, विचार और साहस से भरे नये फिल्मकार ऐसे प्लेटफॉर्म का बखूबी उपयोग कर रहे हैं। फिल्म की सफलता से निर्माण घराने को खूब फायदा होता है और निर्देशक को भी अपने पैर जमाने में बड़ी सहायता हो जाती है। इस समय यशराज फिल्म्स और धर्मा प्रोडक्शन्स में यह खूब हो रहा है बल्कि यशराज में और ज्यादा। 

हबीब फैजल की फिल्म इशकजादे इसी तरह की फिल्म है जो इस हफ्ते रिलीज हुई है। हबीब फैजल ने इसके पहले ऋषि कपूर और नीतू सिंह के साथ एक अच्छी फिल्म दो दूनी चार बनायी थी जो बड़े दिनों बाद रिलीज हो पायी थी। इशकजादे के जरिए वे आदित्य चोपड़ा के सम्पर्क में आये। इस फिल्म की कहानी और पटकथा में हबीब से ऊपर आदित्य चोपड़ा का नाम है। इशकजादे देखकर यही अन्दाजा होता है कि तार्किकता के धरातल पर यह एक अधूरी फिल्म है। कहानी जिस परिवेश के अनुरूप गढ़ी गयी है, उस तरह से उसे पूरा फिल्माया भी गया है मगर तीन चौथाई बेहतर होने के बाद यह अन्त में लगभग दिशाहीन सी हो जाती है।

उत्तरप्रदेश के हरदोई जिले में इसका फिल्मांकन हुआ है। कुछ दिन पहले ही उत्तरप्रदेश में चुनाव हुए हैं और सरकार बनी है। इशकजादे की कहानी मे नायक का दादा और नायिका का पिता चुनाव मैदान में एक-दूसरे के खिलाफ हैं। फिल्म का आरम्भ नायक-नायिका के बचपन के एक दृश्य से होता है जिसमें स्कूल जाते हुए दोनों में तू-तू, मैं-मैं हो रही है और एक-दूसरे के माता-पिता को दोनों ही भला-बुरा कह रहे हैं। स्थापित करने की कोशिश यह है कि बचपन से ही नफरत है। चौहान और कुरैशी विधायक का चुनाव लड़ रहे हैं। चौहान का बिगड़ैल पोता अपने दादा को जिताना चाहता है। कुरेशी का परिवार भी अपनी दमखम लगा रहा है। इधर युवा हुए नायक-नायिका में वही बचपन वाले हुज्जत भरे आपसी रिश्ते हैं। नायिका, नायक को थप्पड़ मारकर कॉलेज में उसकी बेइज्जती कर देती है जिसके जवाब में नायक अगले दृश्यों में उसको मोहब्बत का यकीन कराता है, दोनों शादी कर लेते हैं लेकिन शादी के बाद अन्तरंग सम्बन्ध स्थापित करके नायक कुटिल हँसी हँसता हुआ बायीं दिशा में चला जाता है, यह कहते हुए कि उसने अपना बदला ले लिया। 

कहानी यहाँ से अपनी दिशा खोती है। एक तरफ नायक इस घटना के एमएमएस पूरे शहर के मोबाइलों में भेज देता है। चुनाव होते हैं और नायक के दादा की विजय हो जाती है। श्रेय नायक को मिलता है। नायक को प्रायश्चित नहीं है। नायिका तेज-तर्रार है, वह गोली मारकर बदला लेना चाहती है। दोनों के परिवार और अविभावक एक-दूसरे का प्रभुत्व स्वीकारने को तैयार नहीं है। नायक की विधवा माँ हिम्मत दिखाती है, अपने बेटे को सही रास्ता दिखाने की कोशिश करती है मगर ऐसी ही एक जद्दोजहद में नायक का दादा, नायक की माँ को गोली मार देता है। मरती हुई माँ नायक से गल्ती सुधारने को कहती है। माँ की मृत्यु और अन्तिम इच्छा से नायक की आँखें खुलती हैं। वह और नायिका विरोधाभासी परिस्थितियों में एक तो हो जाते हैं मगर अब नायक का दादा और नायिका के पिता दोनों आपस में मिल गये हैं और अपने राजनैतिक भविष्य की फिक्र करते हुए यह फैसला करते हैं कि परमा और जोया दोनों को मार दिया जाये। फिल्म का अन्त यह है कि अपने ही दुश्मनों से घिरे परमा और जोया आपस में एक-दूसरे को गोली मारकर जीवन का अन्त कर लेते हैं। 


 इशकजादे, मेरे ख्याल से सही नाम इश्कजादे होना चाहिए, बहरहाल हिन्दी के साथ हिन्दी सिनेमा में और भी बड़ी-बड़ी गुस्ताखियाँ होती हैं, अच्छी स्क्रिप्ट और संवादों के साथ अपने पूरे वातावरण से मेल खाती एक बहुत वास्तविक सी फिल्म है। उत्तरपूर्व का एक स्थान, बालुई जमीन से उड़ती गरम धूल और शारीरिक और मानसिक अराजकता में डूबी बाहुबलियों की दुनिया। देशी कट्टे, पिस्तौल और बन्दूक का इस्तेमाल पटाखे की तरह हो रहा है। देश को ऊँचाई पर ले जाने का स्वप्र देखने वाले तथाकथित जन-प्रतिनिधि और उनकी सोच, घरों की प्रताडि़त होती स्त्रियाँ। निर्देशक फिल्म को यथार्थ के काफी नजदीक ले जाकर बनाता है। गन्दी सडक़ों और गलियों में जान बचाती और जान लेने को आतुर बदहवास दौड़, सब कुछ बड़ी सच्चाई के साथ हम फिल्म में देखते हैं। 

नायक के रूप में हमारे सामने बड़े अरसे बाद एक टफ सा चेहरा है अर्जुन कपूर के रूप में। अच्छा है कि देखने में वो न तो बोनी कपूर और न ही अनिल कपूर की छाया देता है, वह एक मौलिक छबि लगती है। अर्जुन ने अच्छा काम किया है, खासतौर से बहुत गम्भीर होकर हँसने की उसकी अदा कमाल है। परमा के किरदार को वो पूरी तरह माहौलसम्मत अराजकता के साथ निभाता है। मरती हुई माँ के गल्ती सुधारने वाले शब्द ही उसका जीवन बदलते हैं। वहाँ से नायक की एक अलग ढंग की प्रतिभा देखने में आती है। नायिका परिणीति चोपड़ा की अपने किरदार में उपस्थिति ज्यादा मुखर और आत्मविश्वास से भरी हुई है। वह सुन्दर तो है ही साथ ही संवादों पर भी उसका गजब का नियंत्रण है। नायक से उसके रिश्ते परदे पर दर्शकों को लगातार गुदगुदाते हैं। नायक के दादा की भूमिका लखनऊ और देश के जाने-माने रंगकर्मी अनिल रस्तोगी ने निभायी है। वे एक ऐसे किरदार को जीते हैं जो अपने कुटुम्ब-परिवार का मुखिया होने के बावजूद अपने राजनैतिक रसूख और भविष्य की फिक्र में सब कुछ दाँव पर लगा देना चाहता है, फिल्म के अन्त में उसका कुरैशी के साथ मिलकर परस्पर स्वार्थ का विषय छेडक़र नायक-नायिका को मरवा देने का प्रस्ताव, फैसला और उसके उपक्रम हैरतअंगेज हैं। वे अपनी भूमिका को बखूब निभाते हैं, इसलिए भी कि लम्बी रंग-सक्रियता और उपस्थिति में उन्होंने सारे वातावरण को नजदीक से देखा परखा है।

चलते-चलते एक बड़ी खामी का जिक्र यहाँ किया जाना जरूरी है और वह यह है कि इस पूरी फिल्म में जहाँ चुनाव, हिंसा, अराजकता, खून-खराबा, मारधाड़, गोलियों की धाँय-धाँय शुरू से लगभग अन्त तक चल रही है, पुलिस का एक सिपाही भी दृश्य में नहीं है। पुलिस फोर्स, बड़े अधिकारी, कानून के नुमाइन्दे देखने-दिखाने तक को नहीं हैं। समझ में नहीं आता, यह चुनाव जैसी गतिविधि किसी स्थान पर उन परिस्थितियों में हो रही है जहाँ सब एक-दूसरे के खून के प्यासे हों, वहाँ पुलिस है ही नहीं। इसी तरह इस फिल्म का अन्त भी अव्यवहारिक है क्योंकि नायक-नायिका दोनों ही बहादुर और साहसी हैं, वे दूर से आते बदमाशों के को देखते हुए जिस तरह एक-दूसरे को गोली मारकर अपना जीवन खत्म कर लेने के लिक उकसाते हैं, वह गले नहीं उतरता।

बुधवार, 9 मई 2012

आमिर खान होने का अर्थ


आमिर खान की शख्सियत ही आकर्षित नहीं करती बल्कि समग्रता में वे अपने उन सारे आयामों में आकर्षित करते हैं जो उनसे विस्तार पाते हैं। आगे चलकर वे सत्यमेव जयते से बढक़र न जाने कौन सा काम करेंगे कि लोग फिर उनके किए पर चकित या हतप्रभ से रह जायेंगे, मगर अपने आपमें मौलिकता और पुरुषार्थ की अपार सम्भावनाएँ लेकर यह आदमी सचमुच कमाल करता है। विभोर होकर, अनुराग से भरकर हम कभी किसी का माथा चूम लेते हैं, कभी किसी का हाथ चूम लेते हैं, कभी किसी का गाल चूम लेते हैं लेकिन आमिर खान के प्रति जो भाव जागते हैं उसमें उनके लिए दिल से भरपूर दुआ निकलती है। मन कहता है कि नैतिकता और सु-समाज का स्वप्र देखने वाले इस इन्सान का रास्ता निष्कंटक किया जाये।

रास्ता निष्कंटक करने की बात इसलिए भी आती है क्योंकि हमारे यहाँ काँटे बोने और बिछाने दोनों में दक्षों की संख्या बहुत है। आमिर खान का धारावाहिक सत्यमेव जयते कितनी तरहों से निरर्थक साबित किया जा सकता है, इसका प्रयास इसके प्रसारित और हाथों-हाथ लिए जाते ही शुरू हो गया था। प्रवृत्तियाँ इस बात पर जरा भी ठहरने को तैयार नहीं कि एक सृजनात्मक व्यक्ति लम्बे समय से अपने एक महत्वपूर्ण काम, जाहिर है जिससे जनहित भी जुड़ा है, के प्रति कितना एकाग्र है। किस तरह आमिर खान ने अपनी महात्वाकांक्षी फिल्म तलाश का प्रदर्शन छ: माह आगे बढ़ा दिया और सत्यमेव जयते की परियोजना पर हाँ करने के बाद उसकी पारदर्शिता, सार्थकता और सकारात्मकता की फिक्र के साथ उससे जुड़ गये। जाहिर है, यह काम आसान होता तो अब तक कर लिया जाता। 

मिस्टर परफेक्शनिस्ट के रूप में अपने नाम का पर्याय माने जाने वाले आमिर खान फिल्मों से पैसा पीटने वाले सितारे भर नहीं हैं। लगभग चौबीस वर्ष पहले 1988 में आमिर खान की बतौर नायक पहली फिल्म कयामत से कयामत तक आयी थी। पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा, बेटा हमारा ऐसा काम करेगा, यह उस फिल्म का पहला ही गाना था। इस गाने को फिल्म में याद करता हूँ तो आमिर के पापा बने दलीप ताहिल का चेहरा याद आता है जो कॉलेज के समारोह में अपने बेटे को वह गाना गाते हुए दूर से देखते हैं और अपनी भीगी आँखें उंगलियों से पोंछते हैं। हिन्दी सिनेमा में सक्रियता का यह आमिर का पच्चीसवाँ साल है और सचमुच उन्होंने बड़ा नाम किया है। उनकी फिल्में जो चुनिन्दा ही रहीं क्योंकि वे हमेशा सबसे अलग रहे। फिल्म की स्क्रिप्ट से सन्तुष्ट होकर ही हाँ की और इसी का परिणाम है, थ्री ईडियट्स तक आमिर खान का अर्थात्। 

आमिर खान ने निरन्तर काम करते हुए इमेज और उम्र की निरर्थक फिक्र से अलग हटकर काम किया। वे हम हैं राही प्यार के में शरारती बच्चों के मामा भी बने, अकेले हम अकेले तुम में बड़े होते बच्चे के पिता का बड़ा गम्भीर किरदार निभाया, अन्दाज अपना अपना को सलमान खान के साथ एक अलग रंग दिया। सरफरोश में एक पुलिस ऑफीसर की भूमिका को अलग ढंग से प्रस्तुत किया। गुलाम का जाँबाज और दुस्साहसी नायक हो या रंगीला का टपोरी, राजा हिन्दुस्तानी का स्वाभिमानी युवा हो या लगान टीम लीडर। गजनी का प्रतिशोधी और थ्री ईडियट्स का रेंछो आमिर विविधताओं में विलक्षण है। सिनेमा में आमिर खान की सक्रियता ने उनके आत्मविश्वास को लगातार समृद्ध करने का काम किया। सफलताओं ने आमिर खान की दृष्टि और आशावाद को विस्तार दिया। आमिर का हर उपक्रम उनको सुर्खियों में लाता है। उनकी चुप्पी या अन्तराल और अवकाश में भी सुर्खियों के तत्व बड़े दिलचस्प तरीके से देखे जाते हैं। आमिर खान अपने भतीजे का कैरियर भी बनाने के लिए जुटते हैं वहीं पीपली लाइव जैसी फिल्म के पीछे खड़े होकर उसे रातोंरात चर्चित बना देते हैं। पीपली लाइव के नायक नत्था अर्थात ओंकारदास माणिकपुरी ने एक बार अपने टूटे-फूटे लहजे में बताया था, हमसे आमिर खान साहब बोले, भाई तुमने तो हमारा रोल ले लिया, नत्था की भूमिका पहले हम करने वाले थे, जब तुमको देखा तो हमें लगा कि हमसे बेहतर तो तुम कर सकते हो, इसलिए फिर हमने छोड़ दिया। हबीब तनवीर के ग्रुप में तीसरी पंक्ति में रोल करने वाला ओंकारदास अब आमिर की बात कहते हुए जिस तरह प्रफु ल्लित दिखायी देता है, वह कमाल ही है। 

सत्यमेव जयते की टेलीविजन पर शुरूआत 6 मई के रविवार से नहीं हुई है। दअरसल इसका पूर्वरंग तो बड़े पहले से चल रहा था। टुकड़ों-टुकड़ों में, नजदीक आते दिनों की प्रत्याशा में इसको लेकर बहुत सारी जिज्ञासाएँ खड़ी की जा रही थीं जो कि जाहिर है, एक अलग हटकर, महत्वपूर्ण  शुरूआत के लिए मायने भी रखती थीं। टेलीविजन के विभिन्न चैनलों में पत्रकार आमिर खान से बात कर रहे थे। महसूस किया कि अनेक लोगों के पास आमिर खान से करने के लिए गम्भीर और सार्थक सवाल नहीं होते थे। ज्यादातर लोग इस तरह के प्रश्र किया करते जिनमें घूम-फिरकर यही सवाल होता कि आपके शो की अमिताभ बच्चन, शाहरुख, सलमान के शो से तुलना की जायेगी, आपको क्या लगता है, और भी इसी तरह के बेमतलब के प्रश्र लेकिन आमिर खान इस तरह के बेमानी सवालों के जवाब भी शिष्टतापूर्वक दिया करते थे। अपनी बातचीत में वे लगभग अतिविनम्रता के साथ इस बात को रेखांकित किया करते थे कि मैं मानता हूँ तुलना होगी या की जायेगी मगर अपना यह कार्य मैंने ऐसी धारणाओं को सोचकर नहीं किया है। मेरा कार्य सामाजिक सरोकारों का एक अलग तरह का बिम्ब प्रस्तुत करने की कोशिश है, मैं ज्वलन्त और सार्थक प्रश्रों के साथ अधिक से अधिक लोगों के पास पहुँचने की कोशिश कर रहा हूँ। 

हमारे यहाँ मीडिया में अब तेजी से वैसी पीढ़ी की उपस्थिति और आमद रेखांकित हो रही है प्रतिभा और गरिमा की वाकई उस तरह की परख नहीं करती, जैसी करनी चाहिए। आमिर खान या अमिताभ बच्चन या दिलीप कुमार किसी के प्रश्रों का उत्तर देने के लिए उपलब्ध होते हैं, यह आसान बात नहीं है। हो सकता है, जो अच्छे सवाल कर सकता है, वह ऐसा खुशकिस्मत न होता हो, अतएव उस महत्व को समझा जाना चाहिए और उसकी कद्र की जानी चाहिए। जीनियस कलाकारों से बहुत अच्छे उत्तर मिल सकते हैं, मगर उसके लिए व्यक्तित्व और योगदान के आकलन की गम्भीर दृष्टि भी जरूरी है। हालाँकि अन्तत: वह लोकतांत्रिक स्थिति जिसमें फिर सीधे कलाकार अपने प्रशंसक के सामने होता है, ही आदर्श होती है। सत्यमेव जयते से हमारी दृष्टि और खुल रही है। यथार्थ हमको उन सचाइयों से भी अवगत कराता है, जिनको जानकर भी हम अनजान होते हैं। कचरे के पात्र से जूठन खाते गरीब बच्चों को हम भले रोज देखते हों मगर जब हम ऐसे दृश्य बन्ध किसी कहानी में पढ़ते हैं, धारावाहिक या सिनेमा में देखते हैं तब ही हमारी आँखों में आँसू आते हैं। आमिर खान को फिर एक सार्थक सृजनशीलता का आदर्श उदाहरण उपस्थित करने का श्रेय है। यही आमिर खान होने का अर्थ भी है।

बुधवार, 2 मई 2012

सिनेमा सदी में एक महत्वपूर्ण किताब


बीसवीं शताब्दी की महान कला सिनेमा को लेकर सभी के मन में हमेशा ही कौतुहल रहा है। हमें पूरी तरह शायद पता न हो मगर यह एक बड़ी सुखद घटना है कि 2013 का साल हमारे देश में सिनेमा की शताब्दी का साल है अर्थात भारत में सिनेमा की उम्र सौवें वर्ष में प्रवेश कर गयी है। 21 अप्रैल 1913 को मुम्बई के ओलम्पिया सिनेमा में भारतीय सिनेमा के जनक दादा साहब फाल्के ने चुनिंदा मेहमानों के लिए बड़े जतन से बनायी अपनी पहली फिल्म राजा हरिश्चन्द्र का प्रदर्शन किया था। यह फिल्म वहाँ तेरह दिन तक चली थी और इतिहास रचा था, इतिहास इस तरह रचा था कि जनता परदे पर जीती-जागती मानवाकृतियाँ देखकर अचम्भित रह गयी थी। यह चमत्कार ही सिनेमा के जन्म की कहानी है। भारत में सिनेमा की शताब्दी की शुरूआत 3 मई से मानी जाती है क्योंकि इसी दिन यह फिल्म कोरोनेशन थिएटर में लगायी गयी जो तेईस दिन तक चली। यह एक रिकॉर्ड था। 

सिनेमा की यात्रा बड़ी लम्बी है। अब तक हम सभी इस मान्यता से काफी बाहर आ चुके हैं कि सिनेमा सिर्फ उतने ही लोगों का सृजन है जो परदे पर नजर आते हैं। वाकई सिनेमा सिर्फ एक कहानी और भूमिकाएँ करने वाले हीरो-हीरोइन, खलनायक, चरित्र अभिनेता, एक्स्ट्रा, गीत-संगीत के ही मेलजोल या उन सबको एक परिकल्पना में अवस्थित कर देने का परिणाम नहीं है। वास्तव में सिनेमा एक साथ सैकड़ों हजारों प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष लोगों के अथक सृजनात्मक योगदान का नतीजा है।

यह अत्यन्त सुखद है कि सिनेमा की शताब्दी की बेला में हिन्दी में एक महत्वपूर्ण किताब इन्दौर से प्रकाशित हुई है। बीते कल के सितारे नाम की इस पुस्तक के लेखक हैं, वरिष्ठ सिने-विश्लेषक श्रीराम ताम्रकर। श्रीराम ताम्रकर की प्रतिष्ठा समकालीन फिल्म पत्रकारिता के क्षेत्र में एक ऐसे अलग मगर विलक्षण साधक के रूप में है जिन्होंने ताजिन्दगी सिनेमा पर काम किया, सिनेमा को जिया और कंठस्थ किया। वे अपनी बातचीत में अक्सर एक्सटम्पोर शब्द का प्रयोग करते हैं, वाकई सिनेमा के मामले में जानकारियाँ, उन्हें बताना, उन पर बात करना और समझाना, ऐसा है कि आपके पास सुनने, समझने की सुरुचि और समय है तो उनका सान्निध्य कमाल है। ऐसे श्रीराम ताम्रकर जो पिछले तीन दशकों में महत्वपूर्ण संग्रहणीय सिनेमा विशेषांकों परदे की परियाँ, सरगम का सफल, नायक-महानायक, दूरदर्शन-सिनेमा, फिल्म और फिल्म, भारत में सिनेमा, विश्व सिनेमा के संचयन और सम्पादन से देश भर में जाने गये हैं, जिन्होंने फिल्म पत्रकारिता का पाठ पिछले तीस सालों में तीन युवा पीढिय़ों को पढ़ाया और पारंगत किया, उन्होंने बीते कल के सितारे किताब लिखकर एक अनूठा काम किया है।

बीते कल के सितारे किताब ऐसे वक्त में अत्यन्त मूल्यवान और संग्रहणीय है जब हमारे यहाँ हिन्दी सिनेमा पर हिन्दी में ही अच्छी, शोधपरक-सुरुचिपूर्ण किताबों का प्रकाशन नहीं होता। तीस साल पहले मनमोहन चड्ढा ने हिन्दी सिनेमा का इतिहास नाम की एक बहुमूल्य किताब लिखी थी। हिन्दी सिनेमा का सारा कारोबार, बातचीत-व्यवहार अंग्रेजी में होता है। आज की कलाकार पीढ़ी को हिन्दी में बात करना सबसे ज्यादा तकलीफदेह लगता है, ऐसे भाषायी संक्रमण में बीते कल के सितारे का प्रकाशन एक सुखद रचनात्मक घटना है। दो सौ बीस पृष्ठों की इस किताब में एक सौ तेईस कलाकारों का उनके योगदान के साथ इस तरह स्मरण किया गया है कि कोई भी पाठक इसे पढ़ते हुए हिन्दी सिनेमा को शताब्दी के यश तक पहुँचाने में अपना अनमोल अवदान करने वाले कलाकारों को जान सकें। इस किताब की खासियत यह है कि इसमें नायक-नायिका, चरित्र अभिनेता, हास्य कलाकार, सशक्त पाश्र्व उपस्थिति वाले कलाकारों पर एक तरह से बड़े ही सुरुचिपूर्ण पाठ लिखे गये हैं। श्रीराम ताम्रकर का लेखन सुबोध और सम्प्रेषणीय है। एक साथ इतने सारे कलाकारों के बारे में जान पाना अपने आपमें रोमांचक अनुभव की तरह है और वह तब होता है जब हम इस किताब को पढ़ते हुए समापन तक जाते हैं।

बीते कल के सितारे में प्रमुख रूप से अशोक कुमार, अजीत, बलराज साहनी, बाबूराव पेंटर, बेगम पारा, भगवान दादा, भालजी पेंढारकर, भारत भूषण, दादा साहब फाल्के, दुर्गा खोटे, देविका रानी, डेविड, गजानन जागीरदार, गोप, गौहर मामाजी वाला, हिमांशु राय, हरिकृष्ण प्रेमी, जद्दन बाई, जुबैदा, जानकी दास, जोहरा सहगल, कन्हैयालाल, कामिनी कौशल, कानन देवी, किदार शर्मा, कुक्कू, कुन्दनलाल सहगल, के. एन. सिंह, ख्वाजा अहमद अब्बास, ललिता पवार, मधुबाला, मास्टर निसार, मीना कपूर, मुबारक बेगम, मुमताज अली, निम्मी, मेहबूब खान, मोतीलाल, नरगिस, नलिनी जयवन्त, नाडिया, नितिन बोस, नूरजहाँ, ओमप्रकाश, पन्नालाल घोष, प्रदीप, प्रमथेश चन्द्र बरुआ, पृथ्वीराज कपूर, सितारा देवी, सुरैया, सुुचित्रा सेन, सुरेन्द्र, सोहराब मोदी, श्याम, शशिकला, शशधर मुखर्जी, शाहू मोडक, शान्ता आप्टे, शोभना समर्थ, शेख मुख्तार, त्रिलोक कपूर, उदय शंकर, वनमाला, विजय भट्ट, विष्णुपंत पगनीस, याकूब इत्यादि कलाकार शामिल हैं। यह उल्लेखनीय है कि इनमें से सर्वाधिक कलाकार अब इस दुनिया में नहीं हैं मगर जो कुछ कलाकार जैसे निम्मी, जोहरा सहगल, सितारा देवी, सुचित्रा सेन, शशिकला आदि जो शताब्दी की इस बेला में हमारे बीच हैं, गौरवशाली उपस्थिति की तरह हैं।

बीते कल के सितारे पुस्तक के लिए लेखक ने दुर्लभ फोटो भी जुटाये हैं जो उनके बरसों के संग्रह का नतीजा है। श्रीराम ताम्रकर ने इस किताब को अपने व्यक्तित्व के अनुरूप ही विनम्रता के साथ प्रस्तुत किया है। हमारे यहाँ प्रकाशनों के वितरण का तंत्र उतना सुगम नहीं है जितनी अपेक्षा की जाती है। यह किताब अपनी रफ्तार से किताबों की दुकान तक पहुँचेगी। लेखक की आकाँक्षा यही रहती है कि ऐसे महत्वपूर्ण काम को देश तक पहुँचाया जाये। पाँच सौ रुपए मूल्य की इस पुस्तक को प्राप्त करके पढऩे के उत्सुक जिज्ञासु पाठक श्रीराम ताम्रकर से सम्पर्क कर सकते हैं। उनका पता - 2 संवाद नगर, इन्दौर - 1 है। किताब के बारे में उनसे प्रतिदिन सुबह 8 से 10 एवं शाम 4 से 6 बजे के बीच उनके फोन नम्बर 0731-2401744 पर बात भी की जा सकती है।

मंगलवार, 1 मई 2012

प्रियदर्शन की अति-तेज़

हिन्दी सिनेमा में बाजार के खतरे जितने ज्यादा बढ़ गये हैं उतना ही ज्यादा असुरक्षित हो गये हैं हमारे फिल्मकार। जितनी बड़ी पूँजी फिल्म बनाने में लगती है, उतना हासिल कर पाना अब आसान नहीं रहा। निर्माण घराने सिमट गये हैं। एक फिल्म बनाने के लिए एक साथ कई संसाधनों पर अवलम्बित रहना पड़ता है। इसके बावजूद नीरस विषय, खराब पटकथा, थके हुए कलाकार और फिल्मकार मिलकर जिस तरह की फिल्में बनाते हैं उनका विफल होना लाजमी है। इन्हीं सारे यथार्थों के बीच प्रियदर्शन की फिल्म तेज देखने का अपना अनुभव रहा है। प्रियदर्शन चूँकि एक महत्वपूर्ण निर्देशक हैं और उनके काम को लेकर अन्ततः यह उम्मीद बची रहती है कि पूरी तरह कूड़ा काम नहीं करेंगे, सो तेज देखने का भी मन हो गया, हालाँकि पिछले एक दशक में हेराफेरी से लेकर बिल्लू और राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म कांचीवरम बनाने वाले प्रियदर्शन ने एक साल से ज्यादा समय पूरी तरह इस फिल्म के लिए लगाया। 

तेज को बनाने में भी कई लोगों का हाथ लगा है, भरत शाह, इरोज इन्टरनेशनल, वीनस-यूनाइटेड सेवन जैसे प्रत्यक्ष और अनेक अप्रत्यक्ष लोग। इरोज को छोड़ दें तो अन्य निर्माण घरानों से सफलता रूठी हुई है और कुछ साल से चलन से बाहर भी हैं वे लिहाजा चालीस करोड़ की तेज सबने मिलकर बनायी मगर यह फिल्म आशाओं पर खरी नहीं उतरती। यह फिल्म लन्दन में बनी है। एक युवा लन्दन में अपनी पसन्द की लड़की से शादी करके वहाँ व्यावसाय करके बस जाना चाहता है। नागरिकता का सवाल आता है। कानूनी प्रक्रियाएँ पूरी नहीं की गयी हैं लिहाजा उसे भारत जाने का हुक्म होता है। प्रतिशोध और आर्थिक सुरक्षा की मनःस्थितियों में वह एक अपराध रचता है जिसमें उसका एक मित्र और एक युवती शामिल होते हैं। षडयंत्र रचकर ट्रेन में बम लगा दिया जाता है, जिसके तार नहीं जोड़े गये हैं यह खुलासा बाद में होता है।

पूरी फिल्म इसी बदहवासी में रची गयी है। रह-रहकर परदे पर एक सौ दस मील प्रति घण्टे की रफ्तार से ट्रेन चली जा रही है, गति धीमी की गयी तो बम फट जायेगा। रेल महकमा, पुलिस, अपराधी सब एक-दूसरे में गुंथे हुए हैं। भारतीयों को शक की निगाह से देखने का एंगल भी इस फिल्म में मौजूद है क्योंकि पुलिस अधिकारी अनिल कपूर पर लन्दन मूल की पुलिस का एक अधिकारी अविश्वास करता है। अजय देवगन अपराध की ओर प्रवृत्त युवा जिसके साथी जायद खान और समीरा रेड्डी हैं जो एक बड़ी फिरौती यूके सरकार से हासिल करना चाहते हैं। फिल्म में एक-एक करके तीनों अपराधी मारे जाते हैं लेकिन अन्त में दर्शक को तार्किकता के आधार पर यह फिल्म कुछ दे नहीं पाती। कंगना राणावत चार दृश्यों की हीरोइन हैं लेकिन समीरा रेड्डी ने बीस मिनट के पुलिस को छकाने वाले दृश्य में कमाल कर दिया है।

प्रियदर्शन ने वाकई फिल्म की गति तेज रखी है। कुछ समीक्षकों ने इस फिल्म को स्पीड और द बर्निंग ट्रेन से प्रेरित बल्कि कमजोर नकल माना है। यह फिल्म अपने एक्शन दृश्यों और भव्य सिनेमेटोग्राफी के कारण बांधे रखती है। जहाँ तक प्रभाव की बात है, इसे तीन सितारों वाली फिल्म की श्रेणी में रखा जा सकता है क्योंकि तकनीकी पक्ष बहुत प्रबल हैं। अनिल कपूर को बड़े समय बाद एक अच्छी भूमिका मिली है लेकिन अजय देवगन अपने किरदार के प्रति अन्त तक आश्वस्त नहीं दिखे। जायद की भूमिका छोटी है मगर वह दृश्य महत्वपूर्ण है जिसमें अनिल कपूर उनका पीछा करते हैं। गीत-संगीत सामान्य हैं। विशेष रूप से इस फिल्म में प्रियदर्शन ने अपने बचपन के मित्र और मलयाली सिनेमा के महान अभिनेता मोहनलाल को जाया किया है। उनको इतने सामान्य किरदार में शामिल नहीं किया जाना था। एक जीनियस निर्देशक को अपने जीनियस कलाकार मित्र के साथ ऐसी मैत्री नहीं निभानी चाहिए थी.......................

सोमवार, 30 अप्रैल 2012

मुद्दे से पहले भूमिका

मुद्दे पर आने से पहले भूमिका बांधना हमारे यहाँ का स्थायी मानवीय रिवाज है। सीधी बात कोई कहना नहीं चाहता। घूम-फिर कर विषय पर आते हैं। अचानक आपके पास किसी का फोन आता है, पहले शुरूआत यहीं से होती है, और क्या हाल-चाल है, एक अक्सर जुमला होता है, क्या चल रहा है, एक और है, और क्या खबर। आप अपने हाल-चाल बताइये, जो कुछ चल रहा है, नहीं चल रहा है, वो बताइये, कोई खबर हो तो बताइये। फिर सामने वाला कहता है, फोन दरअसल इसलिए किया था.. .. ..फिर वो बात पूरी बताता है, किसलिए किया था, कोई जानकारी, कोई सूचना, कोई मदद या कोई काम। 

आपने सब-कुछ साध दिया तो बात करने वाला खुश, फोन बन्द करते-करते यह भी कहेगा, बहुत दिनों से मिले नहीं यार, व्यस्त रहते हो, हाँ तुम्हारा काम ही ऐसा है, अपने को भी कहाँ वक्त है, लेकिन ऐसा नहीं है, मिला-विला करो, मिलते हैं, कभी। फोन कट जाता है। आप सोचते रह गये। मुद्दे से पहले भूमिका इसी को कहा जाता है। एक प्रसिद्ध चैनल के प्रसिद्ध इन्टरव्यू कार्यक्रम की तरह सीधी बात कोई नहीं करता। हैलो करते ही बहुत कम लोग ऐसे होते हैं, जो सीधी बात करते हैं। आज के समय में जिस क्षण कोई आदमी किसी के लिए महत्व का हो जाता है, उसी क्षण वो उसके सम्पर्क में आता है, वह भी ऐसे तमाम उलाहने, लानते-मलामतें करते हुए। 

क्या चल रहा है, यह वास्तव में बड़ा विकट सा प्रश्र है। जितनी भी चलायमान स्थितियाँ हैं या चीजें हैं वे सब की सब चल ही रही होती हैं। अपन खुद भी चल रहे होते हैं, सिक्के की तरह, जब तक चल सकते हैं। घिस-घिसा गये सो बात अलग है, तब चलने की स्थितियाँ नहीं रह जायेंगी लेकिन तब तब चलते ही रहेंगे, जब तक चलने लायक हालात हैं। सिनेमाघरों में फिल्में आजकल जरूर ज्यादा नहीं चलतीं, जल्दी उतर जाती हैं। बनाने वाला फार्मूले के सच तक जा ही नहीं पाता, कि क्यों नहीं चल पा रहीं, बस बनाने में लगा रहता है। क्या चल रहा है, यह ऐसा सवाल हुआ जैसे पूछने वाले का मतलब अधिक से अधिक चलने वाली चीजों और वस्तुओं के बारे में जान लेना हो। 

ऐसा शायद अब कोई नहीं करता कि मात्र हालचाल, कुशलक्षेम, माता-पिता, भाभी-बच्चों के बारे में जानने के लिए ही फोन करे, उतनी ही बात करे और फोन बन्द करे। फिल्म से पहले न्यूजरील और ट्रेलर का महत्व ज्यादा हो गया है। छोटी उम्र की याद है, पास के रंगमहल सिनेमाघर में फिल्म देखने जाते थे। हॉल में बैठने के बाद का पूरा माहौल जैसे याद हो गया था। पहले दो गाने बजते थे, फिर तीसरा गाना आधे से ज्यादा होने पर हॉल की एक-एक करके लाइट बन्द हो जाया करती थी। खुशी के मारे सब सीटी बजाने लगते थे। गाना पूरा होते-होते अंधेरा और फिर मुहासों, दाँत की बीमारियों और तंदुरुस्ती की रक्षा करने वाले साबुन के विज्ञापन की फिल्में। उसके बाद समाचार दर्शन और फिर फिल्म। 

अब हमारा जीवन-व्यवहार भी इसी तरह हो गया है। समय, जद्दोजहद, आत्मलिप्तता और जमाने की दौड़ में पसीना बहाते हुए मेल-मिलाप अपना अस्तित्व खो रहा है। अब हम जरूरत पर ही अपनों-परायों को याद करते हैं। क्या चल रहा है, यह सवाल एक तरह का स्टार्टर जैसा है, भोजन में सूप या वेलकम जूस की तरह।

शनिवार, 28 अप्रैल 2012

मौसम और मस्तक


हमारी मानसिकता पर मौसम का प्रभाव बड़ा मायने रखता है। अक्सर हम मानसिकता को अपने शरीर और उसके आकार-प्रकार से भी आँकते हैं। लोग कहा करते हैं कि दुबले दिखाई देने वाले व्यक्ति को गुस्सा बड़ी जल्दी आता है। अच्छे सेहतमंद और कमोवेश मोटे लोगों को क्रोध नहीं आता या कम आता है या कम से कम उन्हें अपने क्रोध पर काबू रखना तो ज़रूर ही आता है। 

मैं अभिनेता और निर्देशक सतीश कौशिक को विलक्षण क्षमताओं वाला कलाकार मानता हूँ। मैं पहले उनका मुरीद हुआ फिर मित्र भी। ऐसा नहीं कि यह धारणा मित्र-भाव या मुरीद होने के कारण बनी हो, वास्तव में उनका स्वभाव ही उनके करीब लाने की वजह साबित हुआ। उनसे अक्सर बात हुआ करती है, एक बार जब वे “बधाई हो बधाई” नाम की फिल्म बना रहे थे, तब उसमें उन्होने अभिनेता अनिल कपूर को लेकर एक तरह का गल्प-लोक रचा था और कुछ समय के लिए उन्हें ख़ासा मोटा दिखाया था। इस प्रयोग पर बातचीत करते हुए उन्होंने कहा था कि मोटे लोग दिल के बड़े साफ़ होते हैं, उनमें सहनशीलता औरों की अपेक्षा ज़्यादा हुआ करती है। उन्होने यह भी जोड़ा कि ऐसा नहीं है कि मैं मोटा हूँ इसलिए यह बात कह रहा हूँ, मगर मेरा अपना तजुरबा है कि कठिन परिस्थितियाँ, ख़तरे, दुख, तनाव, परेशानियाँ, विफलताएं आने पर भी जाने कहाँ से संयत रहने का मंत्र मिलता है। 

सतीश कौशिक कहते हैं कि मेरा किसी से विवाद नहीं होता। किन्हीं कारणों से विवाद खड़े भी हुए तो अपने आप उनका रास्ता निकल गया। शायद दो साल पहले की बात होगी, उन्होंने एक फिल्म अंजना मुमताज के बेटे रुसलान और साधना सिंह की बेटी को लेकर बनाई। उसमें संगीतकार अनु मालिक को साइन किया। अनु ने तीन गाने सतीश कैशिक को बनाकर दिये, जिनसे वे संतुष्ट न हो सके, इस पर उन्होंने किसी नई संगीतकारों की जोड़ी से वे गाने करवा लिए। अनु मालिक नाराज़। वकील का नोटिस भेज दिया। सतीश कौशिक इस बात से बड़े दुखी हुए। कहने लगे, अनु मेरा इतना पुराना दोस्त है, घर आकर लड़ लेता, नोटिस देने की क्या ज़रूरत आन पड़ी? अब वकील कोर्ट, कचहरी से क्या हासिल होगा? कहने लगे, इतना अच्छा दोस्त है और ऐसा किया। हालांकि सतीश कौशिक ने अनु मालिक को पूरा मानदेय दिया, लेकिन इस व्यवहार से दुखी हुए। बाद में उन्होंने ही पहल करके अनु को मनाया और मुक़दमा वापिस हुआ। 

बहरहाल, हम मौसम की बात कर रहे थे। मौसम और मस्तक का भी एक-दूसरे के परस्पर आवेगों से बड़ा रिश्ता है। इन दिनों भरपूर गर्मी का मौसम चल रहा है। जिस तरह मौसम का पारा चढ़ता-उतरता रहता है वैसे ही आदमी के दिमाग का भी। सुबह से ही सूरज चढ़ने लगता है। मनुष्य का भी कई बार मौसम के साथ ही तापमान बढ़ जाया करता है। गर्मी बर्दाश्त करने की क्षमता हर एक में एक जैसी नहीं होती। बेचैनी में तुरंत पंखा चाहिए होता है, तुरंत कूलर की ज़रूरत पड़ती है, तुरंत एसी चालू करना होता है, अन्यथा मूड पर उसका तुरंत प्रभाव पड़ता है। बात बर्दाश्त के बाहर गई तो फिर किसी के भी लेने के देने पड़ सकते हैं। सरे राह सड़क पर आते-जाते गाड़ी-घोड़े में जल्दबाज़ी और अफरा-तफरी से छोटी-मोटी भिड़ंत, रगड़ खा जाने वाली घटनाएँ तुरंत एक-दूसरे का गिरेबान हासिल करने में मददगार साबित होती हैं। 

ऐसे मंज़र देखकर कई बार लगता है, हर तरह के उधर लौटाने से बचने वाला हर आदमी यहाँ जैसे तत्काल परस्पर चुकता करने में देर नहीं करना चाहता। मौसम का मस्तक पर यहाँ अजब ही प्रभाव देखने में आता है। जीवन में ऐसे बहुत सारे मसले होते हैं, जिनके समाधान का परिवेश मानसिक और वैचारिक शीतलता की अपेक्षा करता है। जीवन बेतकल्लुफ़ी में हम जिये चले जाते हैं, अगर जीवन को पढ़ते हुए, जीते चलें तो एक अच्छी दुनिया गढ़ने में हम सबके साथ हो सकते हैं, वह भी मिलकर............

रविवार, 15 अप्रैल 2012

सतही फिल्म की सफलता का जश्र


इन दिनों देश के सिनेमा प्रेमी हाउसफुल टू फिल्म को देखने के लिए टूटे पड़ रहे हैं। यह ठीक उस समय हो रहा है जब देश में खेल भी चल रहा है। ऐसा खेल जो हर बार फिल्म निर्माताओं को डराकर रखता है। ऐसी हवा बन्द करके रखता है कि जब तब खेल खेला जा रहा होता है तब तक कोई भी निर्माता अपनी फिल्म प्रदर्शित करने का दुस्साहस नहीं करता। वह निर्माता खासतौर पर सावधान रहता है जिसने अपनी फिल्म में भारी पैसा लगा रखा होता है, बड़े सितारे शामिल किए होते हैं। आयटम सांग डालकर रखा होता है अर्थात अपनी निगाह में वह जितनी रंगीन फिल्म बनाता है, उतना ही सतर्क रहता है। 

गर्मी का मौसम फिल्मों के लिए आफत का मौसम होता है। ठण्डे सिनेमाघर में फिल्में देखने के लिए घर से धूप में तो निकलना होता ही है, ऐसे में दर्शक संख्या तो घटी रहती ही है ऊपर से आई पी एल जैसे टूर्नामेंट से रही-सही कसर और पूरी हो जाती है। सिनेमाघरों में परिन्दा भी पर नहीं मारता। कई बार भूले-भटके चन्द दर्शकों के पैसे लौटाकर शो रद्द भी कर दिए जाते हैं। लेकिन इस साल ऐसे माहौल में साजिद खान की फिल्म हाउसफुल टू टिकिट खिडक़ी पर सफल हो गयी है। कल एक मनोरंजन चैनल पर एक फिल्म विश£ेषक लगभग बधाई गाने की तर्ज पर फिल्म की सफलता पर कसीदे काढ़ रहे थे। वे दुनिया भर के आयामों से आकलन करते हुए कमाई का कु ल योग लगा रहे थे। इतनी फिक्र देखकर लग रहा था कि वे निर्माता और निर्देशक के खासे शुभचिन्तक होंगे। बहरहाल उन्होंने पूरा जोड़ लगाकर यह साबित कर ही दिया कि फिल्म की कमाई लागत से काफी आगे तक निकल जायेगी। 

जहाँ तक फिल्म का सवाल है तो प्रश्र यही है कि क्या यही सिनेमा है? हाउसफुल टू ऐसा लगता है हिन्दी सिनेमा की एक ऐसी प्रतिनिधि फिल्म बन गयी है जहाँ सारी श्रेष्ठता, दृष्टि, बुद्धि और विचार अपने अस्तित्व के सबसे भोथरेपन में दिखायी देते हैं। एक प्रबुद्ध और बेबाक फिल्म समीक्षक ने हाउसफुल टू की सैद्धान्तिक ढंग से आलोचना की है और यह प्रमाणित किया है कि किस तरह एक निरर्थक फिल्म इतने सारे बड़े, पुराने और नये, खारिज और उपयोगी सितारों को लेकर गढ़ी जाती है। मनोरंजन जिसे सिनेमा के अंग्रेजीदां इण्टरटेनमेंट कहते हैं, अब इसी स्तर पर आकर जाँचा और परखा जाने लगा है। मनोरंजन फूहड़ता से परिभाषित है। 

सफल सिनेमा का गुण जैसे उसका सतही होना ही हो गया है। जरा हम अपनी चेतना को खंगालें, मनोरंजन की अपनी जरूरत को परखें, दुनिया और समाज से हम क्या इतना निराश और उकताये हैं कि ऐसी फिल्म पर हँस रहे हैं, मुग्ध हो रहे हैं और देखने के लिए टूटे पड़ रहे हैं? ऐसे परीक्षक बनकर क्या कभी आत्मग्लानि नहीं होती जिसमें किसी गँवार को मैरिट के नम्बर देकर फक्र महसूस किया जाता हो...........?