शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2010

बिग बॉस के कुनबे में रोटियों का झगड़ा

बिग बॉस में इस बार एक कमाल खूब हुआ है, बहुत सारे एक ही प्रवृत्ति के लोग चुन-चुनकर लिए गये हैं। इनका काम एक ही तरह के मसलों पर एक राय होना है। दिलचस्प यह है कि मसले बड़े तुच्छ से हैं। कई बार हम बहुत सी चीजों के प्रति सहमत नहीं होते, कई बार एक साथ एक राय होना भी मुमकिन नहीं होता। विचार और धाराएँ अलग होती हैं।

प्रवृत्तियाँ भी अलग होती हैं मगर लोक लाज में, जमाने को दिखाने में कुछ भलमनसाहत नकलीपन में ओढक़र अपने को उघडऩे से बचाया जाता है मगर अब चैनलों ने या तो बहुतों के नकाब उतार लिए हैं या उनके भीतर-बाहर की दीवार को पारदर्शी कर दिया है। बिग बॉस में इस बार एक ही तरह की चीज बड़ी समदर्शी होकर नजर आयी है, अफसोस है कि मसला सामने भी आया तो क्या आया, रोटियों का।

जब बिग बॉस की शुरूआत हुई थी तो दर्शकों की अपार जिज्ञासा इसी बात को लेकर थी कि तीन माह एक साथ बिताने वाला भीतर का कुनबा कैसा होता है। एक-एक करके जिस तरह के लोग आते गये, भीतर जाते हुए, कुल मिलाकर आकलन उत्साहजनक नहीं रहा। जैसे-जैसे एक-एक करके लोग अन्दर जाते गये, मुँह बनना और षडयंत्र होना शुरू होते गये।

हालाँकि अब इस बात को लेकर बड़े भ्रम और असमंजस होने लगे हैं कि दिखायी देने वाला यथार्थ वास्तव में अधिरोपित और दिखावटी है या सच्चा? इसका जवाब किसी के पास नहीं है। यह पता नहीं चलता कि सौहार्द्र असली है या वैमनस्य। पल-पल में मर्यादा कैरेक्टर को झटककर दूर खड़ी हो जाती है और अशिष्टता अनावृत्त हो जाती है।

सबसे विकट मसला रोटियों का है। शुरूआत के ही एपिसोडों में से जो वकील साहब बाहर हुए उनके बारे में भीतर के एक-दो लोगों की बड़ी मासूम आपत्तियाँ थीं। एक तो खैर खर्राटों को लेकर थी मगर दूसरी थी रोटी अधिक खाने को लेकर। बाहर होने के बाद वकील साहब सफाइयाँ देते रहे कि वे बेचारे दरअसल खाते कितनी रोटियाँ थे। बाद में जब खली भीतर गये तो उनके जाते ही सबको, सबसे बड़ी आपत्ति उनकी खुराक को लेकर हुई। रोटियों को लेकर खासकर। इस मसले पर सब उनके विरुद्ध थे।

गनीमत है, बिग बॉस ने उनके लिए खाने का अलग इन्तजाम कर दिया वरना उनकी रोटी को लेकर भी धिक्कार पता नहीं क्या रूप ले लेता। गुरुवार को एक झगड़ा जिस घटिया स्तर तक जा पहुँचा उसके पीछे भी मसला रोटी का था, इरादतन बासी रोटी खाने को देने का। कुल मिलाकर यह कि रोटी, बिग बॉस में अब झगड़े की सबसे बड़ी जड़ है।

इधर नजीर अकबराबादी की रचना याद आती है, जब आदमी के पेट में आती हैं रोटियाँ, फूली नहीं बदन में समाती हैं रोटियाँ...........।

6 टिप्‍पणियां:

Arvind Mishra ने कहा…

बिग बॉस में अब ब्लॉगर भेजे जायं

Navin C. Chaturvedi ने कहा…

सुशील जी बात बिग बॉस की हो या राखी सावंत के तथाकथित इंसाफ़ वाले शो की, सब जगह बड़ा ही उल्टा पुल्टा दिख रहा है| और मज़े की बात ये कि हम उसे फिर भी देखना चाह रहे हैं!!!!!!!!!!!!!!!
आपसे निवेदन है ओबिओ के महा इवेंट में मित्र मंडली सहित पधार कर आयोजन की शोभा बढ़ाएँ तथा लोगों को अपने सशक्त व्यंग्यात्मक लहजे से रु-ब-रु होने का मौका दें|

सुनील मिश्र ने कहा…

अच्छी सलाह अरविन्द जी.

सुनील मिश्र ने कहा…

नवीन जी, हमारा नाम तो सुनील है...........

खैर, आपका सुझाव बड़ा महत्त्व का है, आभारी हूँ.

Navin C. Chaturvedi ने कहा…

typing mistake! sorry sunil ji.

ललित शर्मा ने कहा…

सुनील जी,ब्लॉगर्स बिग बॉस की तैयारी यहाँ
चल रही है