गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

गा-बजाकर हाथ छोड़ देने का दिन

साल का आखिरी दिन इस औपचारिक जगत में हजारों मैसेज वाले किफायती वाउचर के भरपूर उपयोग का दिन होता है। सकल आधुनिकता जाते हुए साल को सलाम करते हुए नये साल के आगमन वाले एस एम एस भेजने और पढऩे में लग जाती है। वृत्ति-प्रवृत्ति के अनुकूल आप्त वाक्य हमें पढऩे को मिलते हैं। कोई शाश्वत समय की बात कहता है तो कोई पश्चिम से प्रेरित बयार में डूबी हुई। घटिया और अश£ील चुटकुलों के प्रेमीजन इस विषय में गहरे शोध के बाद जो कुछ हासिल करते हैं, यहाँ-वहाँ भेजने में जुट जाते हैं।

टेलीविजन के चैनलों में जाते हुए साल को हंगामाखेज बनाने और आते हुए साल का आगाज खासे हुड़दंग के साथ करने की तैयारियों में बहुत पहले से दिमाग खपाया जाता है। तथाकथित क्रिएटिव हेड, इस पर बहुत मेहनत करते हैं। बहुत से आइडिया ढूँढ़ते-हासिल करते हैं, बहुत सा खारिज करते हैं और अन्त में जिससे सहमत हुए उसे पेश कर देते हैं। राष्ट्रीय से लेकर प्रादेशिक दूरदर्शन भी अपनी सदाघोषित गिरी माली हालत और दिवालिएपन के बीच जैसा-तैसा मनोरंजन जुटाने की कोशिश करता है। दूरदर्शन के कार्यक्रम इस तरह के होते हैं कि बनाने वाला इस अन्दाज में बनाता है कि कोई न देखे तो अच्छा हो। वैसे भी बहुत कम लोग ही देखते हैं क्योंकि बहुत सारे रंगीन चैनल दर्शक के हाथ में सधे रिमोट को सीधा साधकर रखते हैं। इन चैनलों में फूहड़तापूर्वक खूब सारा हँसने के तमाम मौसम मौजूद रहते हैं। बच्चे कलाकार पुरखों की भूमिका निबाहते हैं और बड़े-बुजुर्ग बाल-सुलभ उपस्थिति में होते हैं।

हमारे चैनलों में हास्य के कार्यक्रमों में आदमियों के साड़ी, सलवार-सूट और घाघरा पहनकर आने और स्त्रैण आवाज में बोलने की खूब परिपाटी चल पड़ी है। जोर-जोर से हँसने को बैठाये गये लोग उन कलाकारों की फब्तियों पर ऐसे हँसते हैं जैसे तमाम गुदगुदी कर दी गयी हो। मनोरंजन के नाम पर भले यह सब आँख बन्दकर करम ठोंक लेने वाला मनोरंजन हो मगर कलेजे पर पत्थर रखकर खूब देखते हैं सब। फिल्मों का हास्य तो पहले ही कब का स्तरहीन हो गया। बोलने, चलने-फिरने, दीखने की तमाम शारीरिक व्याधियाँ, कलाकारों ने हास्य के लिए हासिल कर ली हैं। हास्य, कॉमेडी है और मनोरंजन, इन्टरटेन्मेंट। नयी परिभाषाओं में सब धक रहा है। दर्शक वही है जो अनेक बार हैजा फैला देने वाली सडक़छाप गन्दगी भरी पानी पूरी भी चटखारे लेकर खा लिया करता है, भले अगले दिन उसका बड़ा खामियाजा भुगते। सिनेमा भी आज इसी तरह देखा जाता है और टेलीविजन भी।

हम सब, सब किस्म के मनोरंजन का हिस्सा बन जाते हैं, बिना जाने-बूझे और जानबूझ कर भी। माजरा कुल मिलाकर दिलचस्प है, हमारा बाहर, हमारा भीतर सब व्यतीत होते समय में बहुत अप्रासंगिक सा भी लगता है, कई बार। साल भी हम ऐसे ही व्यतीत कर दिया करते हैं, साल का आखिरी दिन भी हमारे लिए उसकी संगत में गा-बजाकर हाथ छोड़ देने का दिन ही होता है।

2 टिप्‍पणियां:

जी.के. अवधिया ने कहा…

नव वर्ष 2011 की हार्दिक शुभकामनायें!

पल पल करके दिन बीता दिन दिन करके साल।
नया साल लाए खुशी सबको करे निहाल॥

S.M.HABIB ने कहा…

सत्यगर्भित सार्थक चिंतन....
नववर्ष की मंगलकामनाएं.