गुरुवार, 19 अगस्त 2010

बरखा के अंदेशे

बिखरी जुल्फों की छांव
कब तक रहेगी
मालूम न था
बादल कुछ टुकड़ों में आकर
ठहर क्या गए
वहीं के होकर रह गए

तुम मुस्कुराती हो
अपने सम्मोहन पर
बड़े गुमान से
नदी सी बहती केशराशि को
अपने हाथ में थामकर
साँस रोके देखते रहे
बमुश्किल सह गए

तुम अक्सर ऐसे ही
बांध लिया करती हो
कभी हवाओं को
कभी बादलों को
बरखा के अंदेशे
शिकायती लहजों में
यही बात तुमसे कह गए

2 टिप्‍पणियां:

जयराम “विप्लव” { jayram"viplav" } ने कहा…

नमस्कार ! आपकी यह पोस्ट जनोक्ति.कॉम के स्तम्भ "ब्लॉग हलचल " में शामिल की गयी है | अपनी पोस्ट इस लिंक पर देखें http://www.janokti.com/category/ब्लॉग-हलचल/

यह लेखनी कैसी कि जिसकी बिक गयी है आज स्याही !
यह कलम कैसी कि जो देती दलालों की गवाही !
पद-पैसों का लोभ छोड़ो , कर्तव्यों से गाँठ जोड़ो ,
पत्रकारों, तुम उठो , देश जगाता है तुम्हें !
तूफानों को आज कह दो , खून देकर सत्य लिख दो ,
पत्रकारों , तुम उठो , देश बुलाता है तुम्हें !
" जयराम विप्लव "

हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में राज-समाज और जन की आवाज "जनोक्ति.कॉम "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . अपने राजनैतिक , सामाजिक , आर्थिक , सांस्कृतिक और मीडिया से जुडे आलेख , कविता , कहानियां , व्यंग आदि जनोक्ति पर पोस्ट करने के लिए नीचे दिए गये लिंक पर जाकर रजिस्टर करें . http://www.janokti.com/wp-login.php?action=register,
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Atul Sharma ने कहा…

तुम अक्सर ऐसे ही
बांध लिया करती हो
कभी हवाओं को
कभी बादलों को
बरखा के अंदेशे
शिकायती लहजों में
यही बात तुमसे कह गए

सुंदर अभिव्यक्ति।