मंगलवार, 21 सितंबर 2010

दादामुनि की जन्मशताब्दी का साल

अच्छा और दुर्लभ सिनेमा खरीदकर पास रखने और देखने के शगल के वशीभूत ही इन्दौर के एक बड़े शॉपिंग मॉल में जाना हुआ। डीवीडी और सी.डी. की अच्छी दुकानें हम जैसों के लिए किसी अड्डे से कम नहीं होतीं जहाँ जाकर सिनेमा के दीवाने अपनी रुचि-अभिरुचि के लिए झपटने, झपट्टा मारने और लुट जाने के लिए भी तैयार रहते हैं, बशर्ते मनचीता सिनेमा मिल जाए। तो ऐसे ही एक मौके पर जाना हुआ, वहाँ एक ऐसा ढेर भी था, जहाँ पन्द्रह-पन्द्रह रुपए में सी.डी. बिकने के लिए ढेर पड़ी थीं। उन्हीं ढेर में दादामुनि अशोक कुमार की दो दुर्लभ फिल्में मिलीं, एक सत्येन बोस की बन्दिश और दूसरी फिल्म थी राखान (सी.डी. में आर.ए.के.एच.ए.एन. एक साथ ही लिखा है) की कल्पना।

बन्दिश फिल्म में मीना कुमारी, बिपिन गुप्ता, नजीर हुसैन, सज्जन, शम्मी और मेहमूद थे। यह फिल्म 1955 की थी। बन्दिश एक ऐसी बच्ची की कहानी है जो अपने पिता की तलाश में है। वह अशोक कुमार को अपना पिता मानने लगती है मगर अशोक कुमार जिन्दगी की एक दूसरी आफत में है। यह एक दिलचस्प मगर संवेदनशील हास्य फिल्म है। कल्पना में पद्मिनी, रागिनी, अचला सचदेव और सुन्दर थे। यह फिल्म 1960 में बनी थी। कल्पना के निर्माता स्वयं अशोक कुमार थे। कल्पना, दुनिया में अपनी सजगता और संजीदगी के साथ हैसियत और रसूख अर्जित करने के ख्वाब वाली फिल्म थी। दोनों ही फिल्में हेमन्त कुमार और ओ.पी. नैयर जैसे बड़े संगीतकारों के संगीत से सजी।

अशोक कुमार की इन दुर्लभ फिल्मों को खरीदकर इसलिए भी देखना अच्छा लगा क्योंकि यह उनकी जन्मशताब्दी का साल होगा। यह विचित्र ईश्वरीय विडम्बना ही कही जाएगी कि 13 अक्टूबर की जो तारीख उनके जन्मदिन की है, उसी दिन उनके छोटे भाई किशोर कुमार का निधन हुआ था। सत्तासी का वह साल था जब छिहत्तर साल के दादामुनि का यह सदमा झेलना पड़ा था। जीवनभर यह दुख उनको सालता रहा।

आने वाली 13 अक्टूबर से उनकी जन्मशताब्दी आरम्भ होगी जो एक साल तक चलेगी। भारतीय सिनेमा में अशोक कुमार की यशस्वी उपस्थिति एक शताब्दी बराबर है। 1911 में उनका जन्म हुआ। बेइन्तहाई आकर्षक, सम्मोहक छबि, मादक मुस्कान और आवाज़ तथा अपनी खिलखिलाहट से मोहित कर देने वाले अशोक कुमार बहुत लम्बे समय तक काम किया। यह महानायक अपने आपमें विलक्षण रहा है। चरित्र अभिनेता के रूप में भी उनकी उपस्थिति बड़ी यशस्वी मानी जाती है।

अशोक कुमार का जिक्र यों बहुत थोड़े में किया जाना मुमकिन नहीं है। जब उनकी शताब्दी आरम्भ होगी तब वक्त-वक्त पर उन पर अनेक आयामों के साथ चर्चा करेंगे। वे स्वयं तो रांची में जन्मे थे मगर उनके माता-पिता मध्यप्रदेश में खण्डवा आकर बस गये थे। छोटे भाई किशोर कुमार का जन्म खण्डवा में ही हुआ।

1 टिप्पणी:

ललित शर्मा ने कहा…

Dada muni to sada javan hi rahe...
Unki purani se purani evm nayi filmo me chehara mohara ek jaisa hi hai.

Unko hamara naman..........