बुधवार, 15 सितंबर 2010

एक बड़ी-घनी मूँछ वाले को देखकर

मैं बड़े ध्यान से देखता रहा तुम्हारा चेहरा
जाने क्यों तुम मुझे अक्खड़ दिखाई दिए

मैंने सोचा शायद चेहरे का ये दोष नहीं
दरअसल तुम मुझे बड़े मुच्छड़ दिखाई दिए

मैं फ़िदा हूँ उस जतन पर खूब सहेजी मूँछें
शेष पहनावे से तो बड़े फक्कड़ दिखाई दिए

तुम्हारी नज़र बचाकर जब नज़दीक आया
मूँछों में मुझे खिजाबी झक्कड़ दिखाई दिए

किस कदर मशगूल तुम ऊंची-नीची फेंकने में
आदमी कम मुझे लाल-बुझक्कड़ दिखाई दिये

15 टिप्‍पणियां:

हमारीवाणी.कॉम ने कहा…

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मो सम कौन ? ने कहा…

हा हा हा, दूर के ढोल सुहावने ही होते हैं, इसलिये ’keep distance'

ललित शर्मा ने कहा…

भाई सुनील कुमार जी,
हमें तो अभी खिजाब की जरुरत नहीं पड़ी है।
नजदीक और दूर से समान ही हैं।
हा हा हा हा

बहुत बढिया

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

अलाउद्दीन के शासनकाल में सस्‍ता भारत-१, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

सुनील मिश्र ने कहा…

आपका धन्यवाद "हमारी वाणी"

सुनील मिश्र ने कहा…

धन्यवाद "मो सम कौन" जी

सुनील मिश्र ने कहा…

अरे ललित जी, आपकी इनायत रहे, आभार.

सुनील मिश्र ने कहा…

धन्यवाद राजभाषा हिंदी जी

शिवम् मिश्रा ने कहा…


बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

मूंछों पर अच्‍छा लिखा है मिश्र जी, ब्‍लॉग जगत में मूंछ वाले के नाम से प्रसिद्ध ललित जी नें अपना स्‍पष्‍टीकरण छाप दिया है बाकी मूंछ वाले सावधान .... :) :)

सुनील मिश्र ने कहा…

आपकी शुभकामनाओं के लिए आभारी हूँ शिवम् जी.

सुनील मिश्र ने कहा…

वाह संजीव जी, मज़ा आ गया, शुक्रिया आपका.

रानीविशाल ने कहा…

हा हा हा तो मुछों वालों को अलग नज़र से देखा है आपने .....लेकिन हम तो एक बड़ी बड़ी मुछों वाले (हाजी अपने ललित भाईसाब ) को जानते है वो तो बड़े मस्त मोला इंसान है !
यहाँ भी पधारें ...
विरक्ति पथ

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

क्या बात है मिश्रजी वगैर मूंछ वाले भी उम्दा रचना लिखते हैं .... बढ़िया रचना .... आभार

Udan Tashtari ने कहा…

मैंने सोचा शायद चेहरे का ये दोष नहीं
दरअसल तुम मुझे बड़े मुच्छड़ दिखाई दिए


हा हा!! मजेदार!