शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

मेरे प्रभु गणपति

चरणों में नेह छुआ
वंदन करूँ जगतपति
आए फिर अबकी बार
मेरे प्रभु गणपति

सकल संसार में प्राणप्रिय
सबके तुम भाग्य विधाता
गुणी तुम अद्भुत विलक्षण
जगत पालक परम ज्ञाता

अस्मिता के तुम ही श्री हो
प्राण बसे तुम्हीं जन-जन के
तुम्हीं से जगत का सर्वमंगल
तुम्हीं स्थपति हो हर मन के

श्रद्धा के मोदक चढ़ा
संवारूँ लूँ अपनी नियति
सब पाप करना क्षमा
मेरे प्रभु गणपति

7 टिप्‍पणियां:

Satish Chand Gupta ने कहा…

मैरे ब्लॉग पर आएँ आपका स्वागत है
सतीश चंद

Satish Chand Gupta ने कहा…

मैरे ब्लॉग पर आएँ आपका स्वागत है
सतीश चंद

सुनील मिश्र ने कहा…

धन्यवाद सतीश जी.

सुनील मिश्र ने कहा…

धन्यवाद सतीश जी.

ललित शर्मा ने कहा…


सुनील जी आज तो आपकी दो पोस्ट वार्ता पर चर्चा में है।
बेहतरीन लेखन के लिए बधाई और शुभकामनाएं

संडे का फ़ंडा-गोल गोल अंडा

ब्लॉग4वार्ता पर पधारें-स्वागत है।

सुनील मिश्र ने कहा…

ज़रूर आऊंगा सतीश जी.

सुनील मिश्र ने कहा…

ललित जी, ऐसे ही आत्मीयता देते रहिएगा, आभारी हूँ.