सोमवार, 20 सितंबर 2010

पौधे उम्मीदों के कैसे मुरझाए

अपनी नींदों को अलविदा कह कर
राह में बैठे रहे पलकें बिछाए
आपकी बाट जोहते रहे कब से
वादा करके आप फिर नहीं आए

हम हवाओं को रोके बैठे थे
इंतज़ार था हमें आपके आने का
छीने हुए थे निगाहों के आराम सारे
हमको डर था नहीं ज़माने का

अपनी साँसों को थामे बैठे रहे
आपकी खातिर किसी और से नहीं मुसकाए
खुद ही आकर यहाँ देखिए ज़रा
पौधे उम्मीदों के कैसे मुरझाए

1 टिप्पणी:

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
मराठी कविता के सशक्त हस्ताक्षर कुसुमाग्रज से एक परिचय, राजभाषा हिन्दी पर अरुण राय की प्रस्तुति, पधारें