बुधवार, 29 सितंबर 2010

छोटा परदा, धारावाहिक, दृश्य-संवाद और भाषा

छोटे परदे में तमाम चैनलों में धारावाहिकों का एक तरह से बाज़ार सा खुल गया है। आप चैनल बदलते जाओ, दुकानें सी लगी दिखायी देने लगती हैं। क्षण भर को चैनल स्थिर करके ठहरकर जायज़ा लेने लगो तो विचित्र किस्म का अनुभव होता है। कोई न कोई दृश्य, जाहिर है चल रहा होता है, कलाकार अपनी-अपनी क्षमताभर आजमाइश देते हुए तथाकथित मजबूत दृश्यों के प्रमाण दीखते हैं। पाश्र्वसंगीत का अपना कनफोड़ूपन है जो पल भर बर्दाश्त कर पाना मुश्किल हो जाता है क्योंकि सारी ध्वनियाँ कृत्रिम और तीव्र हैं, जिनमें वातावरण से जुडऩे की कोई संवेदना या शऊर समझ में नहीं आता।

पोस्ट प्रोडक्शन का काम धारावाहिकों में लगभग बिना सोचे, समझे, बिना किसी संजीदा आदमी को सौंपे पूरा सा कर लिया जाता है क्योंकि रोजमर्रा की इन कडिय़ों को बनाने से लेकर चैनल में जमा करवाने, बल्कि जमा करवाने के पहले स्वीकृत कराने तक की स्थिति में सबसे तंगहाली वक्त की होती है। दिन-रात जागते-ऊँघते किए गये काम को इत्मीनान से एक बार देख लेने का ही वक्त किसी के पास नहीं होता। निर्देशक, निर्माता एक ही सेट, लोकेशन और कलाकार से एक दाम के बदले निचोड़वृत्ति से काम निकलवाने में ही लगे रहते हैं। पिछला क्या बनाकर दे दिया, उसका क्या प्रभाव-दुष्प्रभाव है, इसके बारे में सोचने का वक्त या संवेदना उनके पास नहीं है।

ऐसे में दर्शकों के सामने जो उड़ेल दिया गया, पता नहीं कैसे उसकी टीआरपी बढऩे लगती है, पता नहीं कब जाकर दर्शक चेतता है और फिर उसकी टीआरपी को घटाकर चिन्ताजनक स्थिति में लाता है, यह सब विचित्र सा खेल है। हम सब, हमारे परिवार इस खेल के प्रत्यक्षदर्शी रोज ही होते हैं। अपसंस्कृति फैलाते इन चैनलों और उनके धारावाहिक वास्तव में एक तरह का आतिशबाजियों का बाजार ही है। आपके लिए चकाचौंध फैलाती रोशनी है, फटाके हैं फुट, फिट से लेकर धड़ाम तक की आवाज देने वाले, जो गन्दा धुँआ आपका दम घोंटने के लिए निकलकर आपके कमरे को घुटन और दुर्गन्ध से भर दे रहा है, उससे बाहर आने का मन किसी का करता ही नहीं। इन धारावाहिकों के दृश्य, संवाद और भाषा की तो बलिहारी है।

खासतौर पर उत्तरपूर्वी बोली-बानी और परिवेश के धारावाहिकों में कलाकार जो संवाद बोलता है उसका बनावटीपन अजीब ही है। स्तरीयता की बात क्या कहें, देहाती बोली में यदि उर्दू शब्द आये तो कलाकार बखूबी नुक्ता भी लगाता है। क्षेत्रीय परिवेश के धारावाहिकों के कुछ नौटंकिया खलपात्र भी विचित्र सी आँखें बना-घुमाकर संवाद बोलते दिखायी देते हैं। हम है, तो बस कॉपी आँख मूँदकर जाँच रहे हैं, या जाँच भी नहीं रहे, पन्ने पलटते जा रहे हैं, नम्बर बढ़ते जा रहे हैं। पता नहीं कब तक अपना दम घोंटते रहेंगे, कब खिडक़ी खोलेंगे, कि धुँआ बाहर निकले।

2 टिप्‍पणियां:

बंटी चोर ने कहा…

टी वी की भाषा .....
आप की रचना चोरी हो गयी है ..... यकीन नहीं तो यहाँ देख ले
http://chorikablog.blogspot.com/2010/09/blog-post_3502.html

सुनील मिश्र ने कहा…

बंटी जी, इस कृत्य के लिए आपका आभारी हूँ।